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गोपालकृष्ण गांधी नए धरतीपकड़

बात उन दिनों की है जब सीताराम केसरी के अध्यक्ष बनने के बाद मणिशंकर अय्यर कांग्रेंस छोड़ गए थे व ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेंस में शामिल हो गए। उन्होंने लोकसभा का चुनाव पश्चिम बंगाल से लड़ा और बुरी तरह से हारे। जब मैंने उनसे यह जानना चाहा कि तमिलनाडु से होने के बावजूद भी आपने पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि अगर मैं अपने गृह राज्य से चुनाव लड़कर हारता तो सबको पता चल जाता और मेरी कितनी फजीहत होती। पश्चिम बंगाल चुनाव हारने के बाद भी मेरे राज्य के लोगों को कभी यह पता नहीं चलेगा कि मैंने चुनाव भी लड़ा था। कम-से-कम मेरी फजीहत होने से तो बच गई।

जब मैंने गोपालकृष्ण गांधी के विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने की खबर पहली बार पढ़ी तो मुझे मणिशंकर अय्यर द्वारा कहीं गई वे बातें याद आ गई। जैसा कि तय था कि वे भारी वोटों से चुनाव हार गए। और अब इसे लोकतंत्र की जीत बताते हुए वेंकैया नायडू को बधाई दे रहे हैं। गोपालकृष्ण गांधी बहुत विद्वान इंसान हैं। वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते, उनके बेटे देवदास गांधी के बेटे हैं। देवदास गांधी हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक हुआ करते थे। उनके नाना भारत के दूसरे गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे। वे खुद आईएएस अफसर रह चुके है। इससे पहले वे राजदूत, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल व राष्ट्रपति केआर नारायणन के दफ्तर में संयुक्त सचिव भी रहे थे। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और दूसरी गतिविधियों में लग गए।

मेरी मोटी बुद्धि में छोटी सी यह बात समझ में नहीं आती है कि जब वे अपने भाई राजमोहन गांधी की राजनीतिक दुर्गति देख चुके थे तब भी उन्होंने अपनी दुर्गति करवाने का कदम उठाते हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में लड़ने की सहमति क्यों दी? दरअसल विपक्ष के लिए तो यह चुनाव मुर्गा लड़ाई जैसा था। उसे पता था कि उसका मुर्गा हारेगा मगर उसे तो सूली पर चढ़ाने के लिए एक मोटा मुर्गा चाहिए था। उसका बायलर मुर्गा भाजपा के देसी मुर्गे से हार गया जोकि एक गांव की पृष्ठभूमि से आया था।

तमाम गहन अध्ययन करने वाले और गंभीर किताबों के लेखक गोपालकृष्ण गांधी यह सामान्य ज्ञान जुटा पाने में असफल रहे कि इस देश में गांधी का मतलब तो इंदिरा गांधी के परिवार से है। महात्मा गांधी का नाम व उनका परिवार तो देश की राजनीति से लेब्रेटा, अफगान स्त्री या फिर मोती सॉप सरीखा हो चुका है जिसकी मांग आज न के बराबर है। वह समय बीता युग हो गया जब डालडा का मतलब वनस्पति घी या ठंडा मतलब कोका कोला माना जाता था। अब तो गांधी ब्रांड भी बजाज स्कूटर की तरह पिट चुका है।

राजमोहन गांधी को सबसे पहले वीपी सिंह ने 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़वाया था। यह वो समय था जबकि पूरे देश में गली-गली में शौर है, राजीव गांधी चोर है के नारे लग रहे थे। बोफोर्स खरीद में घोटाले का खुलासा करने वाले वीपी सिंह को राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है या वीपी सिंह की आंधी है, आज का महात्मा गांधी बताया जा रहा था। पूरे देश में इन नारों की गूंज हो रही थी। पर उस आंधी में भी महात्मा गांधी के इस पोते का आश्रम उड़ गया और उसे सिर्फ 69,000 या 17 फीसदी वोट मिले जबकि राजीव गाधी को 2.71 लाख या 68 फीसदी वोट हासिल हुए थे।

उस चुनाव में काका जोगिंदर सिंह धरतीपकड़ भी मैदान में थे जिन्हें 799 वोट हासिल हुए थे। अरविंद केजरीवाल ने तमिलनाडु के राजाजी को वहां बनने वाला मुर्गाछा प पटाखा समझ कर पिछले लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया था मगर वे कबूतर छाप साबित हुए। हालांकि इस चुनाव में आप के सभी सात उम्मीदवार चुनाव हार गए थे मगर उन्होंने महेश गिरी से 1.40 लाख वोटो से हारकर रिकार्ड बनाया। राजमोहन गांधी बाद में केजरीवाल के विरूद्ध बयान देने लगे मगर बापू व राजाजी के इस वंशज को कभी दीवार पर लिखी इबारत नजर नहीं आई।

वीपी सिंह ने भी उन्हें महज दो साल वाली राज्यसभा की सदस्यता दी थी। अमेरिका की यूनीवर्सिटी ऑफ इंलिनायस यूनीवर्सिटी के प्राध्यापक रहे व आईआईटी के स्थाई स्कॉलर इस विद्धान की राजनैतिक समझ तो तेज प्रताप की राजनीतिक समझ के समक्ष भी मात खाने वाली थी।

मेरी समझ में यह बात आज तक नहीं आई कि क्या गांधीजी के इन वंशजों में अपने बाबा की ही तरह मान-सम्मान का अंतर बताने वाला थर्मोस्टेटर गायब है जो कि वे समझ नहीं पाए कि कांग्रेस उन्हें अपना उम्मीदवार बना कर उनसे 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने का बदला ले रही है। महात्मा गांधी भी मान-सम्मान के पचड़ो से काफी दूर थे। तभी उन्होंने कहा था कि अगर कोई एक तमाचा मारे दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो। पता नहीं ऐसी सोच रखने वाले महात्मा गांधी को जब काला होने के कारण दक्षिण अफ्रीका में रेलगांड़ी की फर्स्ट क्लास के डिब्बे से उतारा गया था तो वे क्यों प्लेटफार्म पर धरने पर बैठ गए थे क्योंकि वे तो ऐसे थे जो कि मान-सम्मान की कसौटी से परे थे।

खैर मुझे तो लगता है कि कांग्रेस ने मीरा कुमार को भी राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर उनकी फजीहत इसलिए करवाई ताकि उनके पिता जगजीवनराम द्वारा इंदिरा गांधी को धोखा देने व खुद उनकी बेटी द्वारा पार्टी छोड़ कर जाने का बदला ले सके। दुनिया व देश को पता पड जाए कि वे वोट ले सकने वाली दलित नेता नहीं है। गोपालकृष्ण गांधी के चुनाव लड़ने से उनकी बदनामी ही हुई। खबरें छपने लगी कि उन्होंने मुंबई आतंकी हमले के अभियुक्त याकूब मेनन की फांसी की सजा माफ करने की पैरवी करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को चिट्ठी लिखी थी।

 इस आशय के भी दस्तावेज सामने आए कि उनके नाना सी राजगोपालाचारी ने देश के पहले गवर्नर-जनरल की हैसियत से नाथूराम गोडसे व आप्टे को मिली फांसी की सजा माफ करने की अर्जी यह कहते हुए ठुकरा दी थी कि वे इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते हैं। उन्हें इन दोनों के परिवारजनों की ओर से 5 नवंबर 1949 को क्षमा याचिका सौंपी गई। जिसे उन्होंने 7 नवंबर को महज दो दिन के अंदर वापस कर दिया और वे फांसी पर लटका दिए गए।

जो हो उन्होंने खुद को भारतीय राजनीति का धरतीपकड़ साबित कर दिया है। यूं तो इस समय देश में तमाम धरतीपकड़ है पर असली धरतीपकड़ बरेली में रहने वाले काका जोगिंदर सिंह धरतीपकड़ थे  जो कि देश के विभाजन के बाद बरेली में बस गए थे व वहां उन्होंने कपड़े की दुकान खोल ली थी। उन्होंने अपने जीवन में 350 चुनाव लड़े व जमानतें जब्त करवाई। उन्होंने चार बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा व 1991 में शंकर दयाल शर्मा के खिलाफ चुनाव लड़कर 1135 वोट हासिल किए। उसके बाद राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में न्यूनतम प्रस्तावक व अनुमोदक होने का कानून बना। मगर इस धरतीपकड़ के बारे में क्या कहे जो कि महज खबरों में आने लिए अपनी चोटी काटते फिर रहे हैं।

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