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सरकार को माकूल प्रेस चाहिए!

विवेक सक्सेना
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अक्सर मुझे पत्रकार तो नवग्रह की तरह नजर आते हैं। उनके व नेताओं के बीच वहीं संबंध होते हैं जो कि आम आदमी व नवग्रहों के बीच होते हैं। जब घर में कोई पूजा होती है तो पंडित नौ पान के पत्ते, नौ सुपाड़ियां मंगवा कर नवग्रह स्थापित करता है। उनकी पूजा करता है व पूजा या कथा समाप्त होते ही गणेशजी को छोड़ कर बाकी सारे देवताओं को विदा कर देता है। उन्हें घर में नहीं रखा जाता है। मेरा मानना है कि यही संबंध पत्रकार व नेताओं और पार्टियों के बीच होते हैं। चुनाव के पहले नेता पत्रकारों के आगे पीछे घूमते हैं क्योंकि पता है कि उनकी कवरेज के बिना जीत नहीं सकते  मगर सत्ता में आते ही उन्हें नवग्रहों की तरह विदा कर देते हैं। 

एकाध चंपू पत्रकार गणेशजी बन कर उनके साथ चिपट जाते है। जैसे भाजपा में कंचन गुप्ता और आम पार्टी में आशीष खेतान, आशुतोष सरीखे पत्रकार हैं। जैसे आप पार्टी ने पत्रकारों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करके उनके सचिवालय में ही प्रवेश करने पर रोक लगा दी। वैसा ही नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद पत्रकारों के साथ किया। वे इस देश के एकमात्र ऐसी सरकार के प्रधानमंत्री हैं, जिसमें उनके समेत आम मंत्री तक अपने साथ किसी दौरे पर किसी पत्रकार को नहीं ले जाता है। हाल में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए जो दिशा निर्देश जारी किए गए उनके बारे में मेरा इतना ही कहना है कि यह संभव नहीं है कि स्मृति ईरानी समेत उनकी कैबिनेट का कोई भी सदस्य उनकी इच्छा के बिना कोई इतना अहम कदम उठा ले। यह काम तो बर्र के छत्ते में ईंट मारने जैसा था।

इस बारे में भाषा के संपादक व अपने दोस्त निर्मल पाठक ने बहुत गजब की बात कही कि अगर वास्तव में स्मृति ईरानी ने अपने आप यह कदम उठाया तो उन्होंने ऐसा करके यह साबित कर दिया है कि वे तो मोदी से ज्यादा प्रभावशाली हैं। उन्होंने एक झटके में पूरे विपक्ष व सभी पत्रकारों को अपने खिलाफ एकजुट कर दिया। केंद्र सरकारें और पत्रकारों के बीच टकराव होते आए हैं। इस सरकार का दिल कितना छोटा है व वह पत्रकारों को कितनी अहमियत देती है इसका पता तो बहुत छोटी से घटना से लग जाएगा। 

भारत सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की देश की एकमात्र संस्था प्रेस एसोसिएशन है। जब 1984 में मुझे मान्यता मिली थी तब भी इस संस्था को सरकार ने शास्त्री भवन में अपने दफ्तर के लिए एक कमरा दे रखा था जो कि दशकों से वहां काम कर रहा था। बाद में मैं प्रेस एसोसिएशन का पदाधिकारी बना व उस कमरे में बैठने लगा। तब वहां फोन भी हुआ करता था। कुछ साल पहले सरकार ने शास्त्री भवन के पास ही पत्रकारों के लिए मीडिया सेंटर बनाया व वहां प्रेस एसोसिएशन को एक छोटा सा कमरा दे दिया। प्रेस एसोसिएशन पत्रकारों की एकमात्र संस्था है, जिसके सदस्य भारत सरकार से मान्यता प्राप्त प्रिंट मीडिया के ही सदस्य हो सकते हैं। इस साल कुछ माह पहले अधिकारियों ने प्रेस एसोसिएशन के महासचिव छायाकांत नायक को पांच दिन के अंदर वह कमरा खाली करने का नोटिस जारी कर दिया। 

तब अफसरों ने बताया कि हमें सरकार (मंत्री) के दबाव में यह जगह खाली करवानी पड़ रही है। कुछ पदाधिकारी मंत्री से मिले तो उन्होंने भी दो टूक शब्दों में वह छोटी सी जगह खाली करने को कहा। वे इस जगह के बदले मीडिया सेंटर या शास्त्री भवन में कोई वैकल्पिक जगह देने को तैयार नहीं थी। मामला अदालत में गया, जहां जज ने इस आदेश पर रोक लगाने के साथ ही मंत्रालय से पूछा कि आप लोगों ने कब व कैसे प्रेस एसोसिएशन को यहां दफ्तर खोलने की इजाजत दी थी। मंत्रालय ने कहा कि प्रेस एसोसिएशन तो फर्जी संस्थान है। मंत्रालय इस संबंध में कोई दस्तावेज नहीं दे पाया कि यह दफ्तर कब से व किसके आदेश से वहां चल रहा था। अदालत ने यहां तक कहा कि कुछ चीजें तो परंपरा से चलती है। कानून में कहां लिखा है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के लिए चैंबर होगा। फिर भी उन्हें चैंबर देने की परंपरा है। ऐसे ही मामला प्रेस एसोसिएशन के पत्रकारों का है। सरकार माकूल जवाब नहीं दे पाई और यह मामला आज तक विचाराधीन है। 

सरकार ने दूसरा कदम पिछले दिन फिर खेला। पत्रकारों की सरकारी मान्यता देने का काम सीपीसीए यानी सेंट्रल प्रेस एक्रीडीशन कमेटी करती है। इसके 11 सदस्य सरकार मनोनीत करती है व 12 सदस्य विभिन्न पत्रकार संगठनों से आते हैं। कुल मिला कर इसमें 23 सदस्य होते थे। इनकी संख्या एकाध घटती बढ़ती रहती थी। सरकार ने 2013 में 25 व 2015 में 22 पत्रकारों को उनके विभिन्न संगठनों से मनोनीत किया। उनका कार्यकाल दो साल का होता है। इस साल भी तमाम संगठनों से जो कि इस समिति में प्रतिनिधित्व करते आए थे पत्रकारों के नाम मंगवाए गए। अचानक 20 मार्च को सरकार ने अधिसूचना जारी करके इस समिति के आठ सदस्यों की सूची जारी कर दी। आठ में से पीआईबी प्रमुख को उसका अध्यक्ष बना दिया गया। एक सदस्य प्रेस कौंसिल से व एक न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन से लिया जाएगा। बाकी पांच पत्रकार वे हैं जो कि लगभग घोषित रुप से इस सरकार के पैरोकार होने की हैसियत हासिल कर चुके हैं। इंदिरा गांधी ने प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात कही थी जबकि इस सरकार को प्रतिबद्ध मीडिया की तलाश रहती है।

किसी पत्रकार के लिए प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो की मान्यता हासिल करना उसके विवाह सरीखी दूसरी सबसे अहम बात होती है। उसके जरिए भारत सरकार की मोहर वाला जो परिचय पत्र मिलता है उसे दिखा कर देश के अधिकांश मंत्रालयों में जाने के लिए उसे अलग से पास नहीं बनवाना होता है। हालांकि प्रधानमंत्री दफ्तर व संसद में उसके आधार पर प्रवेश नहीं मिलता है। पर किसी भी जगह पीआईबी कार्ड के आधार पर ही उसके प्रवेश का कार्ड बनाया जाता है। मजेदार बात तो यह कि इस कार्ड को जारी करने वाले गृह मंत्रालय में तो इसे दिखा कर घुसा जा सकता है मगर उसके अधीन आने वाले अर्धसैनिक बलों के दफ्तरों में इसे दिखा कर आप नहीं घुस सकते। इस कार्ड के धारक केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तरह सीजीएचएस की स्वास्थ्य योजना में दवा पाने व अपनी पत्नी समेत रेलवे के फर्स्ट क्लास में आधी दर पर सफर करने के योग्य हो जाते हैं। हालांकि रेलवे ने 60 साल की आयु पूरी कर लेने वाले हर नागरिक को आधी दर पर सफर की सुविधा दे रखी है। 

यह कार्ड जारी करने के पहले पत्रकार की गहरी सुरक्षा जांच होती है व कम से कम इस क्षेत्र में उसे पांच साल का अनुभव होना जरुरी होती है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब पूरे देश में चंद हजार ही मान्यता प्राप्त पत्रकार हों तो बिना मान्यता वाले पत्रकार, जो लिखेंगे उनके खिलाफ सरकार क्या करेगी? यूपीए सरकार के कार्यकाल में राहुल गांधी ने भी अपनी करीबी सांसद मीनाक्षी नटराजन के जरिए लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश करने की कोशिश की थी, जिसके जरिए एक ऐसा विभाग बनाया जाना था जो कि मीडिया की निष्पक्षता तय करता और सरकार के माकूल न होने वाली खबरों को राष्ट्र के लिए खतरा घोषित कर देता। मगर यह बिल नहीं आ सका क्योंकि इसकी चर्चा से सरकार घबरा गई थी।

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