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सचमुच विकास खो गया

मन में गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे को लेकर बहुत ज्यादा उत्सुकता नहीं थी। असल में जब नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को बंपर चुनावी फसल काटते हुए देखा तो उस दिन मैंने सबसे बड़ा फैसला यह किया कि आज के बाद कभी कोई चुनावी आकलन नहीं करूंगा। किसी भी चुनाव में हार-जीत की संभावनाओं पर कभी टिप्पणी नहीं करूंगा। मेरा यह भ्रम भी समाप्त हो गया कि दशको तक रिपोर्टिंग करने के अनुमान के चलते मैं भी जनता की नब्ज टटोलने की समझ या हैसियत रखता हूं। 

मेरी समझ में आज तक यह नहीं आया कि जो लोग नोटबंदी के दौरान बैंको के बाहर लाइन में खड़े पुलिस के डंडे खाते हुए सरकार को कोस रहे थे उन्होंने आखिर क्यों उत्तरप्रदेश में उसी नरेंद्र मोदी की भाजपा को छप्पड़ फाड़ वोट दिया? 

इसलिए जब भी पिछले दिनों कोई गुजरात विधानसभा चुनाव के बारे में मुझसे चर्चा करता तो मैं यह कहकर अपना पीछा छुड़ा लेता था कि न तो मैं इस दौरान गुजरात गया हूं और न ही मुझे वहां की राजनीतिक, सामाजिक या जातिगत समीकरणों की कोई जानकारी है। मेरा तो बस इतना ही मानना था कि जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात विधानसभा चुनावो को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रखा था उसे देखते हुए अगर वहां भाजपा की मौजूदा 119 सीटों में से एक भी सीट कम होती है तो अपन इसे इन दोनों की हार के रूप में देखेंगे। 

सुनने में यह तर्क बेहूदा लग सकता है क्योंकि जिस पार्टी को बहुमत मिला हो उसको हम हारा हुआ माने। अपनी इस सोच की जड़ में अमित शाह का वह दावा रहा कि उनकी पार्टी राज्य में 150 से ज्यादा सीटे जीतेगी। विशेषकर प्रधानमंत्री ने तो जिस तरह से इस चुनाव में खुद अपनी व अपनी सरकार की पूरी ताकत झोंक दी उसे देखते हुए तो यही लग रहा था कि इस चुनाव के नतीजे उनकी भावी राजनीति की दिशा व दशा तय करेंगे। 

हिमाचल प्रदेश में तो पहले से ही सत्ता परिवर्तन की परंपरा चली आ रही थी। अंततः चुनाव परिणाम देखने के बाद मेरा अपना यही मानना है कि इसकी कई तरह से व्याख्याएं की जा सकती है। पहली अहम बात यह है कि परिणाम बताते है कि प्रधानमंत्री व अमित शाह यह साबित कर पाने में नाकाम रहे हैं कि गुजरात पर उनकी पकड़ पूरी तरह से कायम है। गुजरात तो हिंदुत्व की प्रयोगशाला में 22 साल पहले लगाया गया वह पौधा है जो कि समय के साथ-साथ बढ़ता और विकसित होता जा रहा था। वहां भाजपा ने वह कर दिखाया जोकि कभी पश्चिम बंगाल ने वामपंथियों ने लगातार सत्ता में जमे रहकर दिखाया था। जब वहां के लंबे दौरे से लौटे संजय शर्मा से मैंने पूछा कि तुम्हारा क्या आकलन है तो उसने पहले कहा था कि यह एक मात्र देश का ऐसा प्रदेश है जहां कुछ हिंदू बनाम मुसलमान व भारत बनाम पाकिस्तान होता है। 

युवा पीढ़ी चाहे कितनी भी कोशिश क्यों ने कर ले वे नरेंद्र मोदी से कितने भी नाराज क्यों न हो मगर अंततः बुजुर्ग व अधेड़ मतदाता भाजपा के साथ ही जाएंगे। उसकी यह बात सही साबित हुई। अल्पेश, हार्दिक, जिग्नेश व राहुल गांधी की सभाओं में जबरदस्त भीड़ उमड़ी मगर जीत मोदी की ही हुई। इसके बावजूद मैं इसलिए इसे उनकी हार मानता हूं कि जिस नेता ने महज 26 लोकसभा सीटो वाले इसे छोटे से राज्य में अपनी 34 रैलियां की हो। पूरी कैबिनेट ही नहीं, उत्तर प्रदेश समेत तमाम भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों को चुनाव प्रचार में झोंक दिया हो उसके लिए अपनी मौजूदा स्थिति को बचा पाना भी मुश्किल पड़ जाए। अगर नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिलना मोदी की उपलब्धि व उसके इस कदम पर लगे जनता की मुहर माना जाए तो गुजरात के चुनाव नतीजो को किस तरह से लिया जाना चाहिए?

प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष के अपने राज्य में यथास्थिति भी बहाल न रख पाने को क्या कहा जाए? एक मंत्री से जब पूछा गया कि आपकी पार्टी तो 150 सीटे जीतने के दावे कर रही थी मगर आप तो मौजूदा संख्या भी नहीं बचाए रख पाए तो उन्होंने बेशर्मी से कहा कि हमने फर्स्ट डिवीजन हासिल की है जिसमें प्रतिशत मानें नहीं रखती है। गुजरात में लगातार पांचवीं बार सरकार बचाने की उपलब्धि की तुलना में भाजपा के लिए सबसे ज्यादा कष्ट कारक जिग्नेश, अल्पेश का राज्य विधानसभा में पहुंचना व कांग्रेंस की सीटों में मामूली ही सही मगर इजाफा होना साबित होगा। 

गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ ही देश की भावी राजनीति में बहुत अहम परिवर्तन देखने को मिलेंगे। हार्दिक पटेल के साथी अभी भले ही मामूली संख्या में जीते हो मगर भविष्य में उनकी भूमिका हनुमानजी जैसी होना तय है। ये मोदी की अशोक वाटिका को उजाड़ने और वहां तोड़-फोड़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले है। यह नहीं भूलना चाहिए कि लंका पर आक्रमण करने के समय गिलहरी से लेकर बंदरों तक की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। हनुमान की पूंछ को आग लगाना, रावण को इतना महंगा साबित हुआ कि उससे पूरी सोने की लंका ही जलकर खाक हो गई थी। जब हुनमान को पकड़कर ले जाया गया था तब भी उसके दरबारियों ने यह सोचा था कि अब उनका अंत तय है। जब उनकी पूंछ में आग लगाई जा रही थी तो दरबार में मौजूदा उसकी सभा के सदस्य ताली बजाकर हंसते हुए अपनी जीत के मजे ले रहे थे मगर उसके बाद जो कुछ हुआ उसे सब जानते हैं। 

उसी तरह गुजरात चुनाव ने जहां एक ओर वहां बानर सेना को हमेशा के लिए सक्रिय कर दिया है। वहीं कांग्रेंस को भी कुछ जामवंत, सुग्रीव व हनुमान उपलब्ध करवा दिए हैं। जब राम की सेना समुंद्र पार कर लंका की सीमा पर पहुंची थी तब रावण के दरबारी ने भी उनके आने की खबर का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि ‘नर वानर किस लावे माही। मतलब की आदमी और बंदर हमारे सामने किसी गिनती में ही नहीं आते हैं। 

चुनाव का एक प्रतिफल राहुल गांधी का मंदिरों में जाना और उनकी जनेऊधारी तस्वीरों का छपना है। उन्हें शिवभक्त बताने का खुलासा होना तमाम ऐसी चीजे हैं जिनके जरिए अब निकट भविष्य में भाजपा व मोदी के लिए खुद को हिंदुत्व का एकमात्र ठेकेदार होने का दावा करने में दिक्कत आएगी। इस चुनाव ने राहुल गांधी व कांग्रेंस को हिंदुत्व पर मोदी व भाजपा का एकाधिकार तोड़ने का एक सुनहरा मौका दिया है। वे इसका कितना लाभ उठा पाते हैं यह तो समय ही बताएगा। किसी चैनल पर अखिलेश यादव ने बिलकुल सही कहा कि जब तक दूसरे दल मोदी व भाजपा की तरह असली मुद्दो से लोगों का ध्यान हटा पाने की कला नहीं सीख पाएंगे तब तक हम उनसे हारते रहेंगे। 

गुजरात के आंदोलनकारी नौजवान ने विकास पागल हो गया है का नारा दिया था। इस चुनाव का यही अहम मुद्दा होना चाहिए था मगर मोदी व भाजपा ने पूरे प्रचार का रूख ही बदल दिया। औरंगजेब, पाकिस्तान, मुसलमान की ओर प्रचार मोड़ दिया। गुजरात चुनाव में पूर्व सेनाध्यक्ष से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह तक पर आईएसआई के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप लगा डाला। अहमद पटेल को भावी कांग्रेंसी मुख्यमंत्री बताने वाले पोस्टर लगवा डाले। यह सिर्फ साजिश ही नहीं बल्कि उनका अपमान भी था। बाबूभाई आपको तो इन लोगों पर मानहानि का दावा करना चाहिए। जो व्यक्ति केंद्र की सरकार चलाते आया हो उसका कद इतना बौना कर दिया!

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