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गुजरातः थर्ड क्लास थर्ड डिवीजन!

हमारे उत्तर प्रदेश की एक खासियत यह है कि वहां अगर किसी कम शिक्षित व्यक्ति से यह पूछा जाए कि वह कितनी कक्षा पास है तो वह यह नही कहेगा कि वो आठवीं या दसवीं पास है। इसकी जगह वह खुद नवीं फेल या 11 वीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने की बात कहेगा ताकि खुद को एक नंबर आगे रख सके। जब गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आए तो मुझे भी यह पुरानी बात याद आ गई। 

मेरा मानना है कि जीत तो जीत होती है और हारे को हरिनाम का ही सहारा होता है। इसके बावजूद मेरी अपनी थ्योरी यह है कि जीत व हार का एक पैमाना होता है। जैसे कि दिल्ली में अगर आप पार्टी की जीत अप्रत्याशित मानी जाती है तो वही गुजरात में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि वहां पर पार्टी लगातार छठवीं बार सरकार बनाने की हैसियत हासिल कर रिकार्ड बनाने जा रही है। इसी तरह अपना मानना है कि जीत का भी एक पैमाना या क्लास होती है। 

हमारे समय में हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी में ही पास होना बहुत मुश्किल माना जाता था। बिरले छात्र जो किसी विषय में 75 फीसदी या इससे अधिक अंक हासिल कर डिसटिंक्शन हासिल करते थे। हालांकि समय के साथ-साथ इसका महत्व भी घटता जा रहा है। उस समय 33 फीसदी अंक हासिल करने वाले को पास घोषित कर उसका नाम सफल विजेताओं की सूची में शामिल कर दिया जाता था और वह छात्र अगली कक्षा में पहुंच जाता था। 33 से 44 फीसदी अंक हासिल करने वाले छात्र थर्ड क्लास विद्यार्थी कहलाते थे। जबकि 45 से 59 फीसदी अंक हासिल करने वाले सैकेंड क्लास व 60 फीसदी से ज्यादा नंबर हासिल करने वाले फर्स्ट क्लास छात्र कहलाते थे। 

हालांकि हर क्लास के अंदर भी पुनः विभाजन होता था। वहां भी अंक प्रतिशत के हिसाब से हैसियत व मान-सम्मान का वर्गीकरण किया जाता था जैसे कि हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था में होता है। सवर्ण में ब्राह्मण सर्वोच्च होते हैं। उनमें भी अलग-अलग गुट खुद को एक दूसरे से ऊपर मानते हैं। यही हालात क्षत्रिय वैश्य व दलित की श्रेणियों में भी आती है। दलित व पिछड़े भी अलग-अलग श्रेणी में बंटे हुए होते हैं वैसे ही 45 फीसदी हासिल करने वाले छात्र को कम सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। 55 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल करने वाले छात्र गर्व के साथ गुड सैकेंड क्लास हासिल करने वाले कहलाते थे। उसी तरह से 33 से 40 फीसदी नंबर हासिल कर पास होने वालो को थर्ड बटा थर्ड क्लास कहा जाता था। 

इतनी भूमिका इसलिए बांधनी पड़ी है ताकि मैं गुजरात चुनाव नतीजो का तजुर्बा कर सकूं। वहां कांग्रेंस फेल हो गई है। हालांकि फेल होने के बाद भी उसकी हालत उस छात्र जैसी है जोकि कभी लगातार इस विषय में फेल होता आया हो मगर इस बार हिंदी, इतिहास पुस्तककला में पास होने के साथ ही दो अन्य विषयों में फेल हो गया हो। कांग्रेंस व राहुल गांधी की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ये तो वह पार्टी थी जोकि आईसीयू में जा चुकी थी। उसके नेता व एक दिन पहले बने अध्यक्ष को पप्पू कहा व माना जा रहा था। मुझे लगता है कि गुजरात चुनाव नतीजो ने कांग्रेंस की बीमारी की रेटिंग बदल दी है वह अब क्रिटिकल (गंभीर) श्रेणी से हटकर स्वास्थ्य लाभ करने की स्थिति में आ गई है। उसे आईसीयू से निकालकर प्राइवेट रूम में भेज दिया गया है। यह कितनी बड़ी राहत व उपलब्धि होती है इसका अनुभव वही कर सकता है जो खुद इन हालात से गुजरा हो। 

जब कुछ वर्ष पहले मुझे सांस लेने की तकलीफ के कारण आईसीयू में भर्ती करवाया गया था तब जब मैं खुद अपने पैरो पर चलकर वाशरूम तक ब्रश करने पहुंचा तो डाक्टर व खुद मुझको कितनी बड़ी यह उपलब्धि लगी इसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। जो व्यक्ति पूरी जिदंगी दौड़ता भागता रहा हो उसे खुद चंद गज तक नर्स के सहारे अपने कदमों पर चल कर जाना यह सुखद अहसास करवाने वाला था कि अब मैं अपने पैरो पर पुनः खड़ा होने लगा हूं। आज मुझे कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस की भी लग रही है। 

अल्पेश, जिग्नेश व हार्दिक पटेल के सहारे ही सही मगर आज वहां कांग्रेंस अपने पैरो पर खड़ी हो गई है। मोदी की जीत का अश्वमेघ घोड़ा पकड़ पाने में वह जरूर असफल रही हो मगर उसने घोड़े की टांग पर इतना जबरदस्त वार कर दिया है कि वह लंगड़ाते हुए अपनी हार बचा पाया है। गुजरात की 182 विधान सभा सीटों में से भाजपा के पास 115 सीटे थी। इस बार वह सिर्फ 99 सीटे ही हासिल कर पाई। सरकार बनाने के लिए उसे न्यूनतम 92 सीटें जीतना जरूरी थी। इस दृष्टि से अगर देखें तो पता चलता है कि महज 99 सीटो की वजह से वह सरकार बनाने में कामयाब हुई है। अगर वह आठ सीटें हार जाती तो सत्ता के बाहर होती। 

अतः जहां एक और 150 से ज्यादा सीटें हासिल करने का दावा करने वाली भाजपा की इस चुनाव में सीटें कम हो गई हैं वहीं पिछली बार महज 61 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेंस ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 80 सीटें जीती है। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि गुजरात चुनाव ने कांग्रेंस को आईसीयू से निकालकर अब अस्पताल के लॉन में टहलने लायक बना दिया है। जरा कल्पना तो करें कि पप्पू राहुल का मुकाबला देश के प्रधानमंत्री मोदी से था जिन्होंने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। यह तो वैसा ही था मानों आईआईटी के प्रोफेसर के सामने दसवीं के बच्चे को शास्त्रार्थ में मुकाबला करने के लिए उतारा जाए। 

कांग्रेंस को तो वैसे भी दुश्मनों की जरूरत नहीं है। अपने मित्र दिनेश शौकीन ने बहुत अच्छी टिप्पणी की। उनका कहना था कि कांग्रेंस तो ऐसा मंदिर है जहां जब पुजारी यज्ञ की ज्वाला प्रज्वलित करता है तो मणिशंकर अय्यर व कपिल सिब्बल सरीखे असुर उस पर पानी छिड़कने में जुट जाते हैं। 

राजनीतिक आकलन करने में माहिर सागर वाले चौरसिया जी ने काफी पहले मुझसे कहा था कि भाजपा ने नीतिश को अपने साथ लेकर बहुत बड़ी भूल की है क्योंकि इससे जहां एक और नीतिश का अस्तित्व खत्म हो जाएगा वहीं राहुल गांधी उनकी जगह ले लेंगे। वे मोदी के विकल्प के रूप में देखे जाने लगेंगे। अब यह बात सच साबित हो रही है। जातिवाद को नासूर बताने वाली भाजपा ने इतनी बड़ी तादाद में पाटीदारों को क्यों टिकट दिए, इसका उसके पास क्या जवाब है। 2014 के लोकसभा व 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव की तुलना में तो गुजरात की जीत थर्ड क्लास थर्ड डिवीजन ही है।

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