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अब मूंछों की लड़ाई

इस समय गुजरात का सोशल मीडिया वहां चल रहे दो नारों के कारण काफी चर्चित हो रहा है। पहला नारा है गुजरात का विकास गांडो थायो छे मतलब विकास पागल हो गया है, जिसकी नया इंडिया में व्यासजी कई बार चर्चा कर चुके हैं। मगर दूसरा नारा जो कि काफी हद तक भावनात्मक कहा जा सकता है उस पर बहुत कम चर्चा हो रही है। राहुल गांधी ने भी अपने गुजरात दौरे में विकास वाले नारे की चर्चा तो की मगर राजनीति कारणों से दूसरे नए नारे पर चुप्पी साध गए। यह नारा है ‘मूंछों तो रेहवानी’ मतलब मूंछें तो रहेगी! 

यह बेहद गंभीर सामाजिक मसला है जो कि हमें यह बताता है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बापू के राज्य में किस तरह से दलितों के साथ बरताव किया जा रहा है। पूरा मामला बेहद गंभीर है, जिसने गुजरात के दलितों को आक्रोशित किया है। हुआ यह कि 25 सितंबर को 25 साल के पीयूष कुमार परमार व उसके 17 साल के चचेरे भाई की गांधीनगर जिले में आने वाले लिंबोरग इलाके में कुछ ऊंची जाति के लोगों ने महज इसलिए जम कर पिटाई कर दी क्योंकि उन्हें इन दलित युवकों का मूंछें रखना पसंद नहीं आया। 

हमलावरों ने पहले उनसे अपनी मूंछें कटवाने को कहा जब इन लोगों ने जवाब में कहा कि क्यों क्या हम लोगों का अच्छा दिखना मना है। इस पर उन लोगों ने इन दोनों की जम कर पिटाई कर दी। अगले ही हफ्ते एक अक्टूबर को जयेश सोलंकी नामक युवक पर तब हमला किया गया जबकि वह गरबा देख रहा था। इसके बाद जहां एक ओर गुजरात के दलित समुदाय में मूंछें रखने के मामलों ने जोर पकड़ा वहीं दूसरी और वहां सोशल मीडिया पर ‘मूंछों तो रेहवानी’ का नारा बेहद जोर-शोर से प्रचलित होने लगा है।

गुजरात में चंद माह बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता जा रहा है। पूरे देश की तरह यह प्रदेश भी भयंकर धार्मिक व जातीय आधार पर बंटा रहता आया है। महात्मा गांधी भले ही पूरे देश की जाति व धर्म से ऊपर उठ कर चलने की शिक्षा देते आए हों मगर गुजरात में वे बुरी तरह से असफल रहे। चिराग तले अंधेरा की कहावत यहां पूरी तरह से सही साबित होती है। हालात तो इतने बिगड़ गए हैं कि अब वहां के दलित चुप बैठने के बजाए जवाबी कार्रवाई करने के मूड में आ चुके हैं। वे गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं के विहिप के नारे की तरह गर्व से कहने लगे हैं कि हम दलित हैं। बड़ी तादाद में दलित युवक अपनी मूंछों वाली सेल्फी लेकर उस पर ‘मिस्टर दलित’ लिख कर राज्य में एक दूसरे को भेज रहे हैं। राज्य में मूंछों का नवीनतम विवाद दलितों की सामाजिक सक्रियता की वजह बन गया। यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर ने अपने नाम के साथ रावण लिखना शुरू कर दिया था। हालांकि रावण ब्राह्मण था भले ही वह राक्षसों का राजा रहा हो मगर वह बेहद कर्मकांडी व पूजापाठ करने वाला था। चंद्रशेखर ने तो जब सहारनपुर में दलितों की रैली की थी तब मोटर साईकिल पर सवार युवकों ने सबसे आगे ग्रेट चमार का बोर्ड लगा रखा था। उनका कहना है कि अब समय आ गया है जबकि हमें अपमानित होने की जगह अपना सम्मान बहाल करने के लिए अदालत में जाने की जरूरत नहीं है। हमें तो यह साबित करना होगा कि हम चमार वास्तव में महान हैं।

अब इन लोगों की सोच में जबरदस्त बदलाव आ रहा है। बीआर अंबेडकर, महात्मा गांधी की तुलना में हमेशा बढ़िया दर्जी से सिलवाया हुआ तीन पीस वाला सूट पहनते थे। कुछ दलितों का मानना है कि आज भी समाज में काफी हद तक यह सोच हावी है कि दलितों को वह सब करने का अधिकार नहीं हो सकता जो कि सवर्ण जातियों को होता है। अनेक राज्यों में टोपी, धोती या पहनावे के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि वे किस जाति के हैं। आजादी के पहले जब छुआछूत अपनी चरम सीमा पर था तब तो दलितों के कुंए तक अलग-अलग होते थे। ब्राह्मण उनके साये से भी बच कर चलते थे। उनकी परछाई पड़ जाने पर नहाते थे। 

दलितों की आज भी तमाम सुदूर इलाकों में चप्पल पहन कर चलने या शादी में घोड़े पर सवार होकर जाने का अधिकार नहीं है। कुछ राज्यों में तो दलित महिलाएं सोने के जेवर नहीं पहन सकती हैं। वे चांदी या लोहे के जेवर पहनती हैं। वे ब्लाउज की जगह लंबी कमीज पहनती हैं। केरल में भले ही वामपंथियों का लंबा चौड़ा जनाधार हो पर वहां लोगों के पहनावे, खानपान व नाम से उनकी जाति का पता लगाया जा सकता है। 

एक समय तो ऐसा भी था जबकि दलित महिलाओं को सवर्ण पुरूषों के सामने अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा तक ढकने का अधिकार नहीं था। इसके खिलाफ 1915 में वहां बहुचर्चित चन्नार आंदोलन हुआ था। अगर कोई महिला अपना ऊपरी हिस्सा ढंकना चाहती तो उसे इसके बदले में शासक को कर चुकाना पड़ता था। मगर अब हालात बदल रहे हैं। ऐसे में जब मूंछों के मुद्दे पर विवाद की खबरें सुनने को मिलती हैं तो थोड़ा अचरज होता है।

वहीं एक बहुत बड़ा विरोधाभास भी देखने को मिलता है। जिस देश व समाज में आज दलितों को मूंछें रखने से रोका जा रहा है। उसी समाज में 60-70 साल पहले दलित नेता अंबेडकर ने एक ब्राह्मण महिला से शादी की थी। दलित नेता रामबिलास पासवान व रिपब्लिकन पार्टी नेता रामदास अठावले की पत्नियां भी ब्राह्मण ही हैं। एक बार लेखक ने अठावले से पूछा कि क्या वजह है कि दलितों की दुहाई देने वाले तमाम दलित नेताओं ने ब्राह्मणों से शादी की तो उनका कहना था कि हम क्या करें। ब्राह्मण लड़कियों को दलित पसंद आते हैं। वहीं वनियार जाति की पीएमके पार्टी के नेता एस रामदॉस का कहना है कि दलित युवक सवर्ण जाति की महिलाओं को बरगला कर शादी कर रहे हैं। 

एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि पुरुषत्व व सत्ता का प्रतीक माने जाने के बावजूद भी हमारे देवताओं भगवानों की मूंछें क्यों नहीं हैं? राम, कृष्ण, लक्षमण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शिव शंकर किसी की भी मूंछें नहीं हैं। हालांकि उसी काल के रावण की मूंछें थीं। वह तो ठाकुर या जाट न होकर ब्राह्मण था। बताते हैं कि अंग्रेज भी शुरू में मूंछें नहीं रखते थे। बाद में उन्होंने महसूस किया कि सेना पर अपना रूतबा बनाने के लिए मूंछें रखना जरूरी है इसलिए 1908 के बाद सेना ने आला अंग्रेज अफसरों के लिए मूंछे रखना अनिवार्य कर दिया गया। शायद इसकी एक वजह हिटलर, स्टालिन, चार्ली चैपलिन सरीखी शख्सियतों का अपनी तरह की मूंछें रखना रहा होगा। हमारे देश में मूंछों पर अनेक कहावतें बनी। इसके बावजूद महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, अंबेडकर, गांधी किसी नेता की भी मूंछें नहीं थीं। सिर्फ वीपी सिंह इसका अपवाद कहे जा सकते हैं। मगर हम हैं कि आज भी मूंछों की लड़ाई में फंस कर इन्हें मरोड़ रहे हैं।

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