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बाबाओं की संपत्ति भूख और झगड़े

दुनिया के भौतिक सुखों को त्याग कर मोहमाया से दूर रहने की शिक्षा देने वाले हम हिंदुओं के बाबा खुद किस कदर मोह माया में लिप्त रहते हैं इसका जीता जागता उदाहरण डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम का है। अभी उन्होंने दुनिया नहीं सिर्फ डेरा ही छोड़ा है मगर उनकी संपत्ति को लेकर यह सवाल उठने लगे हैं कि अब उसका वारिस कौन बनेगा? इस बाबा ने न जाने कितने बुजुर्गों को उनसे उनकी संपत्ति डेरे के नाम लिखवा ली थी। वह नहीं चाहता था कि उन लोगों की संपत्ति उनके वरिष्ठो को मिले। मगर वक्त का खेल तो देखिए आज उसी संपत्ति को लेकर खुद उसके अपने परिवार में सिर फुटोव्वल की नौबत आ गई है। 

जो खबरें आ रही है उनके मुताबिक बाबा चाहता था कि उसकी वारिस उसकी सहेली हनी प्रीत सिंह बने। हालांकि वो उसे अपनी बेटी बताता है मगर इस पिता ने अपनी बाकी बेटियों को कैसे आर्शीवाद दिए और पाप मुक्त किया उस बारे में काफी कुछ छप चुका है। वह कैंसर तक के रोगियों को भला चंगा होने का आर्शीवाद देता था। मगर अब अदालत में अर्जी लगा कर फरियाद कर रहा है कि उसे डायबिटिज और कमर का दर्द है अतः उसकी मालिश करवाने के लिए हनीप्रीत को उपलब्ध कराया जाए। 

वैसे लगता है कि बाबा को थाईलैंड की सैंडविच मसाज की आदत पड़ चुकी है इसलिए वह चाहता है कि वह अपना मसाजर खुद तय करे। हालांकि उसकी इन हरकतों के कारण उसका अपना परिवार काफी घबराया हुआ है क्योंकि चैनलो व मीडिया पर अब बाबा से भी ज्यादा हनीप्रीत छाई हुई है। उसके पैदा होने से लेकर बाबा के गोद में खेलने और मसाज करने तक के किस्से कहानियां मसाले लगाकर पेश किए जा रहे है। 

राम रहीम अकेला ऐसा बाबा नहीं है। इससे पहले भी तमाम बाबाओं के जाने के बाद उनके साम्राज्य पर कब्जे को लेकर इस तरह के विवाद खड़े होते आए हैं। नवीनतम मामला आशुतोष महाराज का है। जिन्होंने यह भी साबित किया कि बिहार के लोग सिविल सर्विस, राजनीति, पत्रकारिता से लेकर बाबागीरी तक में हिट साबित होते हैं। पहले वहां के स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने इंदिरा गांधी को अपने व्यक्तित्व से इतना प्रभावित कर रखा था कि वे अतिसंविधानेतर शक्ल बन गए थे। 

बेहूदा व अपराधी सदाचारी भी बिहार से ही है तो दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के आसुतोष महाराज भी बिहार के थे उनका नाम महेश कुमार झा था। उन पर राम रहीम की तरह रासलीला रचाने के आरोप तो नहीं लगे मगर वे सिखो की नाराजगी के शिकार जरूर बने क्योंकि उन लोगों का मानना था कि वे अपने प्रवचनों में उन्हें बदनाम कर रहे हैं। 

उनका डेरा पंजाब में था। सरकार ने उन्हें जैड श्रेणी की सुरक्षा दे रखी थी। उनके निधन के बाद उनकी जबरदस्त दुर्गति हुई। 29 जनवरी 2014 को डाक्टरो ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डाक्टरो का मानना था कि दिल की धड़कन रूक जाने के कारण वे दुनिया छोड़ गए थे। मगर उनके भक्त यह मानने को तैयार नहीं थे। उनके भक्तों ने उनके शरीर को डीप फ्रीजर में रख दिया। ठीक वैसे ही जैसे कि चिकन रिपब्लिक या ग्रीन चिकन वाले अपने उत्पाद डीप फ्रजीर में रखकर बेचते हैं। 

उनके अनुयाईयों का मानना है कि बाबा गहरी नींद में है और वे एक दिन पुनः अपनी चेतना में लौट आएंगे। बाबा का बेटा होने का दावा करने वाले एक युवक दिलीप सिंह ने उनका शव हासिल करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया ताकि वह उनका अंतिम संस्कार कर सके। आश्रम ने इसका विरोध किया। साढ़े तीन साल की मुकदमेबाजी के बाद हाल ही में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस शव को हमेशा के लिए फ्रीजर में रखे जाने की इजाजत दे दी। आश्रम के लोगों का मानना था  कि शव हासिल करने के पीछे उस युवक का उद्देश्य आशुतोष महाराज की अरबों रू की संपत्ति पर अपना दांवा ठोकना था।

ऐसे बाबाओं के दुनिया छोड़ने के बाद उनके माल पर कब्जा जमाने के लिए उनके करीबी लोगों में जंग छिड़ना आम बात रही है। धरती पर सतयुग लाने का वादा करने वाले बाबा जयगुरूदेव के भक्तों की संख्या भी लाखों में थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक उनसे आर्शीवाद लेने जाती थी। उत्तर भारत में किसी समय उनका इतना प्रभाव था कि प्रोफेसर अरोड़ा करोल बाग के ‘रिश्ते ही रिश्ते’ विज्ञापन के बाद उनका विज्ञापन कि सतयुग आएगा व सोना दस रुपए तोला बिकेगा दीवारों पर लिखा मिलता था। 

उन्होंने तो एक बार खुद को नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक होने का दावा किया था मगर जब वे कोई प्रमाण नहीं दे सके तो कानपुर के फूलबाग मैदान में इकट्ठा हुई लाखों की भीड़ ने उनके मंच पर इतनी चप्पले व जूते मारे कि कुछ क्षणों के लिए तो आसमान ही काला हो गया था। बड़ी मुश्किल से पुलिस ने उनकी जान बचाई। मगर इसके बावजूद बाबा की दुकान मॉल बन गई। जब 18 मई 2012 को उनका निधन हुआ तो वे अपने पीछे अरबों रुपए की संपत्ति छोड़ गए जिसका मूल्य 1200 करोड़ रुपए आंका गया था। इसमें सौ करोड़ रुपए नकद, 250 लग्जरी कारें व एक क्विंटल सोने के आभूषण शामिल थे। 

उनका मथुरा के मुख्य हाईवे पर विशाल आश्रम है। इसके अलावा आधा दर्जन राज्यो में दर्जनों जमीन जायदाद है। उनके मरते ही उनके भक्तो में संपत्ति को लेकर झगड़ा शुरू हो गया। उनके ड्राइवर पंकज यादव ने उनकी वसीयत दिखा कर दावा किया कि वे सबकुछ उसके नाम कर गए थे। उमाकांत तिवारी की अगुवाई वाले दूसरे धड़े ने बाबा की उज्जैन की दुकान पर कब्जा जमा लिया। मथुरा के जवाहर बाग में कब्जा करने वाला राम वृक्ष यादव भी उन्हीं का चेला था। जिसके कब्जे से सरकारी जमीन को मुक्त करवाने के लिए पुलिस को जून 2016 में गोली चलानी पड़ी जिसमें दो पुलिस वाले व 22 प्रदर्शनकारी मारे गए।

ऐसे मामले सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि दक्षिण भारत में भी इस तरह के बाबाओं की घटनाएं देखने को मिलती आई है। वहां प्रेम कुमार सोमासुंदरम उर्फ स्वामी प्रेमानंद हुआ करते थे जोकि दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों समेत विदेशों में भी 15 आश्रम चलाते थे। तिरूचि का उनका आश्रम तो 150 एकड़ में फैला हुआ था। उनकी लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनकी शक्ल का साई बाबा जैसा होना था। उन पर हत्या का मुकदमा चला व अगस्त 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उनके जेल जाते ही उनकी संपत्ति पर किसका कब्जा हो इसे लेकर झगड़ा शुरू हो गया। 

गुरू के साथ उसके सबसे प्रिय चेले कमलानंद को भी अजीवन कारावास की सजा हो गई थी। अतः दो नंबरी को लेकर विवाद पैदा होना स्वाभाविक था। जब मुकदमा चल रहा था तभी उनकी करीबी व आश्रम की देखभाल की जिम्मेदारी संभालने वाली शिष्या दिव्य मथाजी जर्मनी भाग गई। वहां के साथ-साथ उसने फ्रांस की भी संपत्ति पर कब्जा जमा लिया। कुछ समय बाद वे करोड़ों की संपत्ति जायदाद छोड़कर मर गई। स्वामी प्रेमानंद का 20 फरवरी 2011 को कुड्डालोर की जेल में निधन हो गया और वे खाली हाथ दुनिया से चले गए।

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