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हरियाणा और हनीप्रीत!

हरियाणा  आज अपनी 51वीं वर्षगांठ मना रहा है। देश की राजनीति में विशिष्ट स्थान रखने वाले इस राज्य का गठन 1 नवंबर 1966 को किया गया था। यह पंजाब से अलग करके बनाया गया था। यह शुरू से ही विरोधाभासो से भरपूर रहा। 1857 के जब गदर में हरियाणा के तमाम शासको ने अंग्रेंजो के साथ टकराव लिया तो दिल्ली पर काबिज होने के बाद अंग्रेंजो ने जहां एक और बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह झज्जर के नवाब नाहर सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया और राव तुला राम को काबुल भेज दिया। वहीं, अपना साथ देने वाले पटियाला, जींद, नाभा आदि के शासको को ईनाम देने के लिए हरियाणा को उनके साथ कर दिया। 

आजादी के बाद जब सिख अपने अलग पंजाबी सूबे की मांग करने लगे तो इंदिरा गांधी ने हरियाणा को अलग कर दिया। इसलिए यह कहना सही होगा कि हरियाणा के अस्तित्व में आने में अकाली नेताओं की अहम भूमिका रही। इतना ही नहीं उनका पहला मुख्यमंत्री भी भगवत दयाल शर्मा को बनाया गया। जोकि प्रताप सिंह कैरों मंत्रिमंडल के सदस्य थे व उनके करीबी होने के कारण हरियाणा के गठन का लगातार विरोध करते आए थे। 

सो यह कहा जाए कि इसकी बुनियाद ही विरोधाभासो पर रखी गई थी तो कुछ गलत नहीं होगा। हरियाणा की मांग करते आए अपनी ही पार्टी के विधायक अब्दुल गफ्फार को उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए हुए मतदान में एक वोट से हराया। वे मार्च 1967 में मुख्यमंत्री बने और सत्ता में आते ही उन्होंने अहीर नेता राव बीरेंदर सिंह, दलित नेता चांदराम व जाट नेता देवीलाल को नाराज कर दिया। ये सभी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे व जाट बाहुल्य इस प्रदेश में एक बाह्मण का मुख्यमंत्री बनना उन्हें पसंद नहीं आया क्योंकि हरियाणा में ब्राह्माणों की संख्या बहुत कम है।

इन लोगों ने सबसे पहले मुख्यमंत्री के द्वारा विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए चुने गए दया किशन को मतदान में हरा दिया और सरकार बनने के पहले ही उठा-पटक का सिलसिला शुरू हो गया। महज 11 महीने के अंदर ही पहली सरकार का पतन हो गया। हालांकि राजस्थान में 1952, 1957 व 1967 में कांग्रेंस ने बहुमत होने के बावजूद भी इधर-उधर से विधायकों का जुगाड़ करके सरकारें बनाई थी मगर हरियाणा में एक नई परंपरा यह देखने को मिली कि बहुमत होते हुए भी कांग्रेंस की सरकारें सत्ता से बाहर हो गई। 

1 अक्टूबर 1967 में वहां जो कुछ देखने को मिला उसने भारतीय राजनीति को आयाराम-गयाराम की कहावत दी। गया-लाल नामक कांग्रेंसी विधायक ने  राव बीरेंदर सिंह का कैंप छोड़ने का ऐलान किया और 9 घंटे बाद चंडीगढ़ में राव ने उसे प्रेस के सामने पेश कर दिया व उसने उनका पुनःसमर्थन करने का ऐलान कर दिया। विधायक हीरानंद आर्य ने पांच बार पाला बदला। दो विधायकों ने चार बार आस्था बदली। तीन ने तीन-तीन बार निष्ठाएं बदली। जबकि 34 विधायको ने एक से ज्यादा बार पाला बदला। 

अंततः तत्कालीन राज्यपाल बीएन चक्रवर्ती को यह कहना पड़ा कि हरियाणा की राजनीति पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है व इसके कारण कोई वैकल्पिक या स्थाई सरकार संभव नहीं है। तत्कालीन गृहमंत्री यशवंतराव बलवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि वहां विधायकों को पाला बदलने के लिए 20 से 40,000 रुपए तक दिए गए है। उस समय यह काफी बड़ी राशि हुआ करती थी। जब 21 नवंबर को गृहमंत्री संसद में अपना भाषण दे रहे थे तभी उन्हें गया लाल के पुनः खेमा बदलने की खबर मिली और उन्होंने कहा कि अब तो ‘गया लाल भी गया।‘ उसके साथ ही राजनीति में दल-बदल करने वालो को आया राम गया राम कहा जाना शुरू हुआ। 

दूसरा इतिहास जनता पार्टी के शासन के दौरान हुआ। उस समय केंद्र की राजनीति में चरणसिंह व मोरारजी देसाई के गुट थे। एक गुट जगजीवन राम का भी था। देवीलाल चरणसिंह के गुट में थे। उन्होंने रिजक राम, बलवंत राय तायल, मूलचंद जैन सरीखे वरिष्ठ नेताओं को अपने मंत्रिमंडल से बाहर रख कर नाराज कर रखा था। जब देवी लाल ने चरणसिंह के पक्ष में दिल्ली में किसान रैली करवाई तो इससे मोरारजी देसाई काफी नाराज हो गए। उन्होंने देवीलाल को इससे दूर रहने को कहा मगर उन्होंने जवाब दिया कि मैं पहले किसान हूं व मुख्यमंत्री बाद में हूं। 

उस समय भजनलाल, बाबू जगजीवनराम भी कांग्रेंस फॉर डेमोक्रेसी के विधायक थे व सदन से इस दल के मात्र तीन ही विधायक थे। भजनलाल पहले गांवों में घर-घर जाकर चुनरी बेचते थे बाद में वे बंसीलाल के संपर्क में आए व बंसीलाल ने उन्हें पहली बार आदमपुर विधानसभा के उपचुनाव में टिकट दिया और वे जीत गए। बाद में वे मंत्री बने और बंसीलाल के लिए विधायकों पर नजर रखने का काम करने लगे। 

जब 1980 में मध्यवधि चुनाव हुए व लोकसभा चुनाव नतीजे आ ही रहे थे तो जनता पार्टी सरकार में मंत्री होने के बावजूद भजनलाल दिल्ली पहुंच गए। जैसे ही यह पता चला कि कांग्रेंस को बहुमत मिलने वाला है वे इंदिरा गांधी के घर लाल गुलाबो का बुके लेकर पहुंच गए। उसके बाद उन्होंने अपनी कार में एक बहुत बड़ा सूटकेस रखा और सीधे संजय गाधी से मिलने चले गए। दोनों ने कुछ देर तक अकेले में बात की और संजय गाधी ने उनसे वह सूटकेस मेनका गांधी की मां अमृतेश्वर आनंद के घर पहुंचाने की बात कही। उन्होंने वैसा ही किया।

इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी शासित राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिसा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट, मध्यप्रदेश व तमिलनाडु की सरकारें बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया मगर भजनलाल दूसरे मंत्रिमंडल व विधायको को लेकर इंदिरा गाधी से मिलने गए और उनसे बोले कि मैडम हम सभी पुराने कांग्रेंसी है और आज घर वापस आ रहे हैं। उनकी घर वापसी जोकि किसी पूरी सरकार के दलबदल करने की यह देश के इतिहास की पहली व अंतिम घटना थी। हालांकि उसके बाद भजनलाल ने अपने एक करीबी से कहा कि अगर मुझे पता होता कि नेहरू परिवार भी पैसे लेता है तो मुझे मुख्यमंत्री बनने में इतना वक्त नहीं लगता।

उसके बाद दिल्ली की राजनीति में हमेशा हरियाणा का दखल रहा। चंद्रशेखर सरकार हो या वीपी सिंह की सरकार। देवीलाल ने ही वीपीसिंह के सर पर ताज रखकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की व बाद में उनकी सरकार गिरा कर चंद्रशेखर की सरकार बनाई। राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार इस आधार पर गिराई क्योंकि हरियाणा पुलिस के दो जवानों को उनके घर पर नजर रखते पाया गया था। दिल्ली में किसी की भी सरकार रही हो उसे चलाने का खर्च हरियाणा से ही आता रहा। 

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा ही कांग्रेंस आला कमान को सर्वाधिक मदद किया करते थे। देश व दिल्ली की राजनीति पर हरियाणा हमेशा हावी रहा करता था। मैंने भी 37 साल तक दिल्ली व हरियाणा की रिपोर्टिंग की मगर वहां भाजपा की सरकार के सत्ता में आने के बाद राज्य अखबारों की सुर्खियो से ही गायब हो गया। यदा कदा कभी कोई खबर बनती भी है तो वह अच्छी नहीं होती। कभी जाट आंदोलन तो कभी बाबा रामपाल और अब तो इस राज्य को राम रहीम और हनीप्रीत के कारण जाना जाने लगा है। अतः लोग यह नहीं कहते कि जहां दूध-दही का खाना वह राज्य मेरा हरियाणा। वह तो अब हनीप्रीत का पर्याय बन चुका है।

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