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धूमल कैसे व क्यों बने जेटली?

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे आने के बाद जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह प्रेस को अपने संबोधन में कह रहे थे कि इस चुनाव ने जो तीन चीजे समाप्त की है उनमें एक जातिवाद और वंशवाद भी शामिल हैं तो वे सौ फीसदी सच बोल रहे थे। मैं तो अमित शाह और नरेंद्र मोदी का कायल हो गया हूं जिन्होंने इस चुनाव में अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए अपनी ही पार्टी के नेता वह भी मुख्यमंत्री पद के अपने उम्मीदवार को ठिकाने लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 

जब हिमाचल प्रदेश में भाजपा की लहर चल रही हो तो उसमें अपने ही गढ़ से पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हार जाए, यह कोई साधारण बात नहीं है। मगर मोदी और शाह की जोड़ी ने साबित कर दिया है कि वे इस देश की राजनीति से वंशवाद, जातिवाद और परिवारवाद समाप्त करने के लिए कोई भी कीमत चुकाने और अपनो तक की बलि देने को तैयार है। 

हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था। शुरू में भाजपा हाईकमान ऐसा नहीं करना चाहती थी मगर जब उनके करीबी हिमाचल के ठाकुर नेताओं ने दिल्ली तक यह खबर पहुंचाई कि अगर धूमल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया तो प्रदेश का ठाकुर वीर वीरभ्रद सिंह के साथ चला जाएगा तो बात बढ़ी। ध्यान रहे कि हिमाचल प्रदेश में 28 फीसदी मतदाता ठाकुर है। जिस हाईकमान ने 23 अक्तूबर को धूमल का टिकट तय करने के बाद भी 31 तक उसकी घोषणा नहीं की थी उसे अंततः उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना पड़ा। हालांकि इससे पहले रामलाल कह चुके थे कि हम यहां किसी को उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगे व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगें जाएंगे। पार्टी ने उन्हें टिकट तो दे दिया मगर उसके साथ ही उन्हें निपटाने की भी पूरी तैयारी कर दी। 

जिस तरह से उन्हें हमीरपुर विधानसभा सीट से सुजानपुर भेजा गया उसी समय स्पष्ट हो गया था कि पार्टी ने उन्हें निपटाने का मन बना लिया है। कभी सुजानपुर भी हमीरपुर का ही क्षेत्र हुआ करता था। यह हमीरपुर शहर व हमीरपुर लोकसभा संसदीय क्षेत्र में आती है। ठाकुर बाहुल्य हमीरपुर शहर की लोकसभा सीट से प्रेम कुमार धूमल को बेटा अनुराग ठाकुर सांसद है। सुजानपुर सीट से पिछली बार भाजपा के नरेंद्र ठाकुर जीते थे जिन्हें हमीरपुर से लड़वाया गया और उनकी जगह धूमल को उम्मीदवार बना दिया गया। 

यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। इस सीट से निर्दलीय विधायक रहे रजिंदर कुमार राणा को कांग्रेंस ने अपना उम्मीदवार बनाया था जो कि कभी धूमल के शिष्य हुआ करते थे और उन्हें धूमल ही राजनीति में लेकर आए थे। पहले राणा पीडब्ल्यूडी में छोटी-मोटी नौकरी किया करते थे। बाद में इस 46 वर्षीय नेता ने अपनी नौकरी छोड़ प्रापर्टी डीलिंग का काम शुरू किया। वे धूमल के बेहद करीब आए और जब धूमल सत्ता के बाहर थे तो उनकी क्वालिस इस परिवार की सेवा में उपलब्ध रहती थी। 

उनके बाथरूम से लेकर बैडरूम तक वे कभी भी आ जा सकते थे। वे अनुराग ठाकुर के भी काफी करीब थे। बताते है कि धूमल के बुरे दिनों में उन्होंने तन-मन-धन से उनकी पूरी मदद की। जब 2008 में धूमल पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने राणा को मीडिया सलाहकार समिति का अध्यक्ष बना दिया। फिर तो पूछना ही क्या था। बताते हैं कि ‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का’ को चरितर्था करते हुए राणा मुख्यमंत्री के कुछ निहायत करीबी लोगों के साथ जमकर मौज-मस्ती करने लगे। पुलिस ने उस घर पर छापा मारा जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था। करीबी तो भाग गए मगर राणा सैक्स स्केंडल में फंस गए। 

उसके बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। वे 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे मगर धूमल ने उन्हें टिकट नहीं दिया या नाकाम रहे और राणा ने निर्दलीय की हैसियत से चुनाव लड़ा और सुजानगढ़ से जीत गए। वे पैसे से काफी मजबूत थे और उन्होंने कांग्रेंस की अनीता वर्मा को 14155 मतो से हराया था। अतः वीरभद्र सिंह ने उन्हें एसोसिएट सदस्य बना लिया और लंबी रणनीति के तहत उनके जरिए धूमल को निपटाने का इंतजाम करना शुरू कर दिया। 

उन्होंने उन्हें अपनी विधानसभा में मनचाहा काम करने दिया। सुजानपुर में विकास पर 212 करोड़ रुपए खर्च किए गए। वहां एसडीएम का दफ्तर खोलने व साथ ही मिनी सचिवालय खोलने की अनुमति दे दी। खुद राणा भी काफी मिलनसार व्यक्ति बताए जाते हैं। गरीब लड़कियों की शादी करने से ले कर लोगों के ईलाज, बच्चों की फीस आदि के प्रबंध में उनकी हमेशा दिलचस्पी रही। उनकी घोषित संपत्ति 22 करोड़ रुपए की है। जब 2014 के लोकसभा चुनाव हुए तो वीरभद्र ने उन्हें हमीरपुर लोकसभा सीट से धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर के मुकाबले कांग्रेंस के टिकट से मैदान में उतारा। जहां किसी दल के विधायक या सांसद को अपने पद से इस्तीफा दिए बिना ही चुनाव लड़ने की छूट होती है वहीं संबद्ध विधायक को अपनी सीट से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ना पड़ता है। 

मोदी लहर में राणा लोकसभा का चुनाव हार गए। बाद में कांग्रेंस ने उपचुनाव में उनकी पत्नी अनीता राणा को उम्मीदवार बनाया। वे भी भाजपा उम्मीदवार नरेंद्र ठाकुर से चुनाव हार गई। वीरभ्रद सिंह ने उन्हें आपदा प्रबंधन विभाग का प्रभारी बना रखा था व उन्हें सुजानपुर का विकास करने की पूरी छूट दे रखी थी। धूमल तो इस बार भी हमीरपुर से ही चुनाव लड़ना चाहते थे मगर हाईकमान ने उनकी सीट बदल दी और गुरू-शिष्य को आमने-सामने खड़ा कर दिया।  राणा ने धूमल के पैर छूकर उनसे अपनी जीत का आशीर्वाद लिया। वे बताते हैं कि मैंने उनसे कहा था कि आप हमीरपुर से लड़ने जाइए मगर वे ऐसा नहीं कर सके। वे अपनी जीत का श्रेय धूमल को देते हैं। हिमाचल की राजनीति व भाजपा के जानकारों का कहना है कि राणा इतनी बड़ी तोप नहीं थे कि उनसे धूमल हार जाते मगर उन्हें तो खुद भाजपा हाईकमान व संघ ने निपटा दिया। इसकी वजह व कहानी बेहद दिलचस्प है।

कहते है जब अमित शाह मोदी सरकार में मंत्री थे और सीबीआई ने उनकी जांच शुरू की थी तो एक दिन शाह ने धूमल को फोन किया। धूमल उस समय हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे व तत्कालीन सीबीआई निदेशक अश्विनी कुमार कभी उनके राज्य के डीजीपी रह चुके थे। बताते हैं कि शाह ने उनसे अनुरोध किया कि वे जरा अश्विनी कुमार से बात करें। इस पर धूमल ने उन्हें हड़काते हुए तुरंत फोन रखने और दिल्ली में अनुराग ठाकुर से संपर्क करने को कहा। अनुराग ठाकुर ने अमित शाह का फोन ही नहीं उठाया।  

अब यह बात सही है या नहीं इसे ईश्वर जाने मगर नेताई गपशप के अनुसार इस बात को अमित शाह व मोदी नहीं भूले और न चाहते हुए भी पहले धूमल की सीट बदली व बाद में उन्हें चुनाव में निपटा दिया। सिर्फ उन्हें ही नहीं भाजपा की इस आंधी में जहां उसके पास 44 विधायक जीते हो उसका अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार, धूमल के राजस्व मंत्री गुलाब सिंह ठाकुर व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती तक हार गए। जबकि वीरभद्र व उनका बेटा विक्रमादित्य दोनों ही कांग्रेंस की पराजय के बावजूद अपनी सीटे जीत गए। इस तरह से ठाकुर वोटो को नाराज किए बिना भाजपा ने उनके वोट तो हासिल कर लिए मगर उनके नेता धूमल का निपटा दिया। 

चर्चा यह है कि अगली बारी अनुराग ठाकुर की है। डेढ़ साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में इसी तरह उन्हें निपटाया जा सकता है क्योंकि पार्टी तो सार्वजनिक रूप से वंशवाद व जातिवाद का कैंसर रसूल नष्ट करने का ऐलान कर चुकी है। सो भाजपा की सुनामी होने के बावजूद प्रेम कुमार धूमल, 2014 चुनाव की तरह के अरूण जेटली बन कर रह गए।

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