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मुर्गे की इतनी अहमियत

विवेक सक्सेना
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समय के साथ-साथ चीजे व उनका इस्तेमाल भी बदल जाता है। जब छोटा बच्चा था व अक्सर बीमार रहा करता था तो उन दिनों डाक्टर घर देखने आता था। वह सुई लगाता और नवलजीन की टिकिया देता था। जब शादी हुई और अच्छे चावल का शौकीन होने के कारण चावल ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने की जरूरत पड़ी तो किसी ने ‘पारद’ नामक आयुर्वेदिक दवा इस्तेमाल करने की सलाह दी। इसकी एक गोली एक किलो चावल को लंबे अरसे तक सुरक्षित रखती। 

फिर कुत्ता पाला तो किसी ने बताया कि आप कुत्ते को वे सभी दवाएं दे सकते हैं जो कि इंसान को दी जाती है। एक बार दीवाली पर किसी सुनार मित्र ने चांदी के सामान को कालगेट ट्रूथ पाउडर से चमकाने की सलाह दी। इसके इस्तेमाल से वह सामान चमक जाता था। 

पत्रकारिता करने लगा तो अकसर पढ़ता रहता था कि इस देश में किसान अपनी फसलों जेसे लौकी, तरबूज आदि को जल्दी से बड़ा करने के लिए रात में उन्हें पशुओं का दूध बढ़ाने वाला इंजेक्शन लगा देते हैं। जब पिछले कुछ वर्षों में इस देश में अचानक मरे हुए पशुओं का मांस खाने वाले गिद्दो के लगभग लापता होने की खबरें छपने लगी तो पता चला कि उनकी इस आबादी के सफाए की वजह उनके द्वारा उस मरे हुए पशुओं का मांस खाना था जिन्हें ज्यादा दूध देने के लिए उनके मालिक आक्सीटोन नामक दवाई का इंजेक्शन दिया करते थे। 

जरा कल्पना कीजिए यह दवा कितनी भयंकर होती होगी कि जिसको इस्तेमाल करने वाले पशुओं को खाकर वे गिद्द मर जाए जिन्हें प्रकृति ने सड़ा गला बदबूदार मांस खाने के लिए बनाया था। हाल ही में एक प्रतिष्ठित अंग्रेंजी अखबार के मुखपृष्ठ पर एक पूरे पेज का विज्ञापन छपा देखा जिसमें दावा किया गया था कि विदेश स्थित तमाम एनजीओ व चिकन (मुर्गा) उत्पादक भारतीय ग्राहकों को गुमराह करने के लिए आजकल दुष्प्रचार कर रहे हैं। 

इस विज्ञापन में कहा गया  कि वे लोग इस आशय के दावे कर रहे हैं कि भारत में चिकन को जल्दी बड़ा करने के लिए उन्हें एंटी बायोटिक दवाएं खिलाई जाती है जो कि भविष्य में इंसानों के लिए बेहद घातक हो सकती है। अहम बात तो यह कि यह विज्ञापन इस देश में पोल्ट्री उद्योग के पितामह माने जाने वाले वह पद्मश्री से सम्मानित दिवंगत डा बीवी राम की संस्थान माल इंडिया पोल्ट्री डेवलपमेंट एंड प्रा लि द्वारा दिया गया था।

इसमें कहा गया था कि मुर्गा उद्योग पोल्ट्री ने पूरी कहानी ही बदल दी है। आज उनकी दूरदृष्टि के कारण भारत दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा अड़ा उत्पादक देश हे जब कि मुर्गे के मांस के उत्पादन में वह दुनिया में चौथे नंबर पर आता है। इससे जहां देश को सकल घरेलू उत्पाद में एक लाख करोड़ रुपए का योगदान होता है वहीं इसके कारण 50 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। 

वैज्ञानिक प्रबंधन व उच्च तकनीक के कारण भारत दुनिया भर के देशों को चिकन उत्पादन में चुनौती दे रहा है क्योंकि यहां यह पूरी दुनिया की तुलना में सबसे सस्ता मिल रहा है। इसे देखते हुए पश्चिमी देश भारत के बाजारों में घुसना चाहते हैं और वहां के एनजीओ हमारे यहां के चिकन में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल का दुष्प्रचार कर रहे हैं। 

सच कहूं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने उदारीकरण का बेड़ा उठाया था व डब्ल्यूटीओ पर चर्चा होने लगी थी तो अक्सर सुनने को मिलता था कि अगर यह काम करने लगा तो भारत में दुनिया भर की चिकन कंपनियां बहुत सस्ते दामों पर यह चिकन लेकर बेचेगी, मगर आज तक यह नहीं हुआ।

सच कहूं तो मुझे भी चिकन खाने का बेहद शौक है। बचपन में जब बाबाजी शिकार करके हिरन मुर्गाबी आदि लाते थे तब हम लोग कभी चिकन नहीं खाते थे क्योंकि तब इसे एक गंदा पक्षी माना जाता था। उन दिन हम लोग देसी अंडे खाया करते थे व हमारी काम वाली इन्हें लाया करती थी क्योंकि चिकन पालन एक घटिया धंधा माना जाता था। शायद यह मुसलमानों का असर रहा होगा कि बचपन में हम लोग रेस्तरां में मुर्ग मुसल्लम खाया करते थे जोकि पूरी तरह से मसाले से भरा होता था। जब दिल्ली आया तो पता चला कि यहां के लोग खासतौर से पंजाबी इसे बहुत पसंद करते हैं। वे लोग तंदूरी मुर्गा, बंटर चिकन, चिकन कबाब काफी खाते थे। चिकन करी व चिकन बिरयानी भी काफी चर्चित हो गई। 

सच कहूं तो चिकन का अपना कोई स्वाद नहीं होता है। मेरा मानना है कि मटन व मछली की तुलना में एक सस्ता व घटिया मांस होता है जोकि महज मसालों के कारण स्वादिष्ट बनता हे। जब कुछ साल पहले हरियाणा में बाढ़ आई व बड़ी तादाद में पौलिट्री फार्म नष्ट हो गए तो एक रेस्तरां वाले ने बताया कि दिल्ली के लोग इतने ज्यादा उद्यमी है कि इन दिनों तमाम जगह बगुलो को तंदूरी मुर्गा बताकर बेचा जा रहा है। 

बहुत पहले दिल्ली से दीवाना तेज नामक एक पत्रिका निकलती थी। उन दिनों स्टिकर नहीं होते थे तब उसमें दीवानी चिपकियां छपती थी जो कि हाथ से बनाए गए हास्यास्पद चित्र होते थे जिनके पीछे गोंद लगाकर उन्हें कहीं भी चिपकाया जा सकता था। एक दीवानी चिपकी मुझे आज भी याद है जिसमें एक चित्र में दीवार पर बैठे मुर्गे को देखते हुए एक सिख मन ही मन मुस्कुराते हुए दिमाग में सोच रहा है कि कभी कभी मेरे मन में ख्याल आता है कि तुझे बनाया गया है मेरे लिए। 

उन दिनों जब शादी के बाद किसी जोड़े को खाने पर बुलाते थे तो डिंक व चिकन के बिना उसका खाना अधूरा माना जाता था। अब खबर चौकाने वाली है इनके मुताबिक भारत में चिकन का उत्पादन बढ़ने के लिए बहुत बड़ी तादाद में एंटी बायोटिक्स दिए जा रहे हैं जोकि मेरे जैसे लोग गला खराब होने पर रखते हैं। इन एंटी बायोटिक में कोलिस्टन नामक एक पदार्थ होता है जो कि निमोनिया सरीखी जानलेवा बीमारी के लिए डाक्टरो द्वारा सबसे अंत में इस्तेमाल किया जाता है। लंबी अवधि तक इनका उपयोग करने वाले चिकन को खाने के बाद शरीर की रोग निरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है व उस पर एंटी बायोटिक दवाओं का असर नहीं होता। 

भारत, वियतनाम, कोरिया, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील से लेकर हर साल वहां के चिकनों को यह दवा खिलाते हैं। भारत की आधा दर्जन कंपनियां यह लिखती हैं कि वे अपने चिकन को यह दवा खिला रहे हैं। मजेदार बात यह है कि इनमें विज्ञापन से जुड़ी वेंकीज कंपनी भी शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इन पर रोक लगा हुए है मगर हमारे यहां रेलवे, रेस्तरां, दवाई कंपनियों से लेकर मैकडोनाल्ड के एफसी व डोमिनीज सारी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां इनका खुले आम इस्तेमाल कर रही है। अब जाकर भारत सरकार हरकत में आई है व उसने दुकानों से सीधे एंटीबायोटिक दवाओं की खरीद पर रोक लगाने का मन बनाया है ताकि इनका दुरूपयोग न किया जा  सके। दुनिया के 22 देशों में पांच लाख लोगों में इसका प्रतिरोध पाया जा चुका है मगर क्या प्रोटीन के इस सबसे बड़े स्त्रोत को खाने से लोगों का रोका जा सकेगा?

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