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डा जेके जैन, सिंधिया और संपत्ति

विवेक सक्सेना
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पिछले कुछ अरसे से अपनी कुछ अजीबो-गरीब आदत पड़ गई है। जब प्रेस क्लब में जाता हूं तो बाहर लगे बोर्ड पर नोटिस पढ़कर यह पता लगा लेता हूं कि हममें से कौन बिछड़ गया। अब आए दिन किसी-न-किसी परिचित के चले जाने की खबर मिलती है। यही स्थिती अंग्रेंजी के अखबारों की है। हिंदुस्तान टाइम्स व टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे विज्ञापनों से पता चलता है कि कौन सा परिचित हमारे बीच नहीं रहा। 

कुछ साल पहले तक यही सोचता था कि इन ऑबिचुरी कॉलमों को कौन पढ़ता होगा? आए दिन किसी-न-किसी परिचित के दुनिया छोड़ जाने की खबर छपी रहती है। मंगलवार को अखबार खोला तो डा जेके जैन के दुनिया छोड़ जाने की खबर चार कॉलम के सबसे बड़े विज्ञापन में छपी हुई थी। पता चला कि वे नहीं रहे। संयोग है कि दिल्ली में दो जेके जैन राजनीति में छाए रहे। दोनों के नाम ही जीनेंद्र कुमार जैन है। एक जैन कांग्रेंस में है और वे अपना अखबार निकालते थे। उन्होंने 1980 के दशक में जवाहर लाल नेहरू की याद में पत्रकारों की आशुनिबंध प्रतियोगिता करवाई व उसमें तब कानपुर में रहने वाले राजीव शुक्ला पुरूस्कृत हुए। आज वे बहुत बड़े नेता हो गए हैं जबकि जेके जैन कांग्रेंस कवर करने वाले अपने मित्रों को 30 जनवरी मार्ग स्थित डालमिया की कोठी में अपने मित्र संजय डालमिया के भव्य बंगले में सायंकालीन संध्या करवाते रहे। 

डा जेके जैन भाजपा में थे। वे भाजपा उपाध्यक्ष व वरिष्ठ पार्टी नेता विजयराजे सिंधिया के करीब थे। वे भाजपा के टिकट पर राज्यसभा में पहुंचे। उन्हें नानाजी देशमुख बहुत मानते थे तो राजमाता सिंधिया भी बहुत मानती थी। यों वे उत्तरप्रदेश से थे। दिल्ली में उनका अपना अस्पताल था। उनकी पत्नी रागिनी माथुर भी डा थी। एम समय था जबकि हिंदुस्तान की राजनीति में ‘रथ’ की शुरुआत करने वाले एनटी रामाराव दिल्ली आए व बीमार पड़ने पर उनके नर्सिंग होम में भर्ती हुए। उन्होंने पुरानी शैवरले वैन को रथ में बदलकर उसका नाम चैतन्य रथ रख दिया था। इसको गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी शामिल किया गया। 

राजमाता डा जैन से इतनी ज्यादा खुश हुई कि उन्होंने सरोजनी नगर रिंग रोड पर स्थित सिंधिया विला की अपनी बहुमूल्य जमीन का एक बड़ा हिस्सा उन्हें अपने टीवी का दफ्तर खोलने के लिए दे दिया। उन्होंने जैन टीवी खोला जोकि तब जी टीवी सरीखे इक्का-दुक्का टीवी में शामिल था। वहां उन्होंने स्टूडियो खोला। नोएडा में 12 एकड़ जमीन खोलकर उन्होंने देश का पहला टेलीपोर्ट स्थापित करने का ऐलान किया। 

सरोजनी नगर स्थित उनके स्टूडियो के लॉन में एक पुराना हैलीकाप्टर खड़ा रहता था। उन्होंने गाडियों में वीडियो आन व्हील्स बनवाए । उनका दावा था कि एक दिन वे स्टार, सीएनबीसी, जी टीवी व बीबीसी को कहीं पीछे छोड़ देंगे। 

इसके बावजूद भी जैन टीवी सफल नहीं हो सका। हरियाणा के बेहद चर्चित वरिष्ठ आईएएस विष्णु भगवान व भारत सरकार में सचिव व उपराष्ट्रपति के निजी सचिव रहे अनिल कुमार तक जैन टीवी के निदेशक रह चुके थे। भाजपा ने उन्हें अपना सांसद बनाने के साथ ही राष्ट्रीय कार्यकारणी का सदस्य भी बनाया। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी के सत्ता में आने के बाद तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार ब्रजेश मिश्र से उनके संबंध खराब हो गए। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि देश की विदेशी खुफिया रॉ एजेंसी ने मिश्र के कहने पर सरकार को जो अपनी खुफिया रिपोर्ट दी है उसमें उन्हें पाकिस्तान समर्थक व वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट बताया है। 

वे अपने गले में तख्ती लटका कर संसद गए जिस पर लिखा था कि मैं पाकिस्तान का एजेंट हूं। उन्होंने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा उससे ही लग रहा था कि उनके दिन पूरे हो गए हैं। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने उनके इस दुस्साहस के लिए उन्हें 2001 में पार्टी से निकाल दिया। उन दिनों उनके टीवी ने ब्रजेश मिश्र के ऊपर एक फिल्म तैयार की थी जिसका प्रेस कांफ्रेंस कर प्रेस क्लब में प्रदर्शन किया गया। इसमें एक गीत का बहुत सुंदर चित्रांकन था। इसमें हवा के झोंके से खिड़की के पल्ले को बार-बार टीप से टकराते दिखाया गया था। इस गीत के बोल थे कि निर्बल से लड़ाई बलवान की, यह कहानी है दिए और तूफान की। 

लंबे अरसे तक गुमनामी में खोए रहने के बाद वे कांग्रेंस में शामिल हो गए जो कि राजनीतिक समुद्र कही जाती है। बताते है कि उनके झगड़े की वजह भी राजनीतिक थी। उन पर भोपाल में भाजपा सरकार से नियम कानूनों को ताक पर रखकर अपने टीवी के लिए जमीन अलॉट करवाने के आरोप लगे। राजमाता ग्वालियर राजपरिवार के अंतिम शासक की महारानी थी। उनके पति जार्ज जियाजी राव सिंधिया, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के बहुत खास थे।

जार्ज पंचम ने उनकी बादशाहत का ऐलान करते हुए 1925 में उन्हें जार्ज नाम से सम्मानित किया था। अंग्रेंज सरकार ने उन्हें सबसे ज्यादा 21 तोपों की सलामी का हकदार बनाया था। आजादी के बाद भारत सरकार ने उन्हें इस प्रदेश का राज प्रमुख (राज्यपाल) घोषित किया। वे मरने तक 1956 में इस पद पर रहे। मध्यप्रदेश के तमाम मुख्यमंत्री उनका व उनकी महारानी राजमाता का बहुत आदर करते थे जबकि ब्रजेश मिश्र के पिता डीपी मिश्र उनकी परवाह नहीं करते थे। इससे राजमाता उनसे नाराज रहती थी। 

पहले वे कांग्रेंस में थी पर संविद सरकार के साथ वे भाजपा में थी। बाद में उनके बेटे माधवराव सिंधिया कांग्रेंस में चले गए। पर इस परिवारिक टकराव को डा जेके जैन ने बनाए रखा। समय का खेल तो देखिए कि राजमाता की तीन बेटियां ऊषा, वसुंधरा व यशोधरा है। ऊषा का विवाह नेपाल के राजा जंग बहादुर से हुआ, वसुंधरा राजस्थान की मुख्यमंत्री है व यशोधरा मध्य प्रदेश में मंत्री है। उनका इकलौता पौता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेंस में है। अपने जीवन में ही उन्होंने माधवराव सिंधिया के साथ बोलचाल बंद कर दी थी। इस देश में उनकी करीब 70,000 करोड़ रुपए की संपत्ति है जो कि कई तरह के मुकमदें में फंसी हुई है। डा जैन के कब्जे में भी अरबों की कीमत वाली जमीन है। वह भी अभी मुकदमेबाजी में फंसी हुई है। संदेह नहीं कि सबकुछ होते हुए भी ये सभी परिवार अदालतों में चक्कर काट रहे हैं।

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