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जयंती तो महज बहाना है!

भजनलाल कहा करते थे कि राजनीति क्रिकेट का नहीं बल्कि कैरम का खेल होता है। इसमें आप सामने से आने वाली गेंद को हिट नहीं करते हैं बल्कि कैरम की तरह जिस गोटी को निशाना बनाते हैं वह उस गोटी को ठोकती है जिसे आप ठोकना चाहते हैं। जब सीबीआई द्वारा पूर्व पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन के चेन्नई स्थित घर पर घापा मारने की खबर पढ़ी तो उनकी यह बात याद आ गई। यह छापा उनके द्वारा यूपीए सरकार में मंत्री रहते हुए झारखंड की सिंहभूमि इलाके में खनन कंपनी इलेक्ट्रो स्टील कास्टिंग लिमिटेड को वन संरक्षण कानून की अनदेखी कर लाइसेंस दिए जाने के संबंध में मारे गए। 

जयंती नटराजन उस दौरान मंत्री थी व उन पर साजिश रचने व अपनी अधिकारिक हैसियत का दुरुपयोग करने का मामला दर्ज किया गया। इस एफआईआर में इस कंपनी के प्रबंध निदेशक उमंग केजरीवाल को भी नामजद किया गया है। सीबीआई के मुताबिक उनके पूर्ववर्ती मंत्री जयराम रमेश ने जंगल की 55.79 एकड़ जमीन को गैर-वन उपयोग के लिए इस कंपनी को दिए जाने पर रोक लगा दी थी। मगर मंत्री बनने के बाद जयंती ने वन महानिदेशक व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करते हुए यह जमीन इस कंपनी को आवंटित कर दी। वन सलाहकार समिति ने भी इस प्रस्ताव को ठुकरा देने की सलाह दी थी क्योंकि उसका मानना था जिस जमीन पर खनन की इजाजत मांगी जा रही थी वह हाथियो व अन्य जंगली जानवरों का अभ्यारण था। 

इसी आधार पर पर्यावरण मंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। जब जयंती नटराजन मंत्री बनी तो राज्य सरकार ने दोबारा अपनी सिफारिश उन्हें भेजी। इस बार भी मंत्रालय के सचिव व वन महानिदेशक ने उन्हें यह मामला पुनः वन सलाहकार समिति के पास भेजने की सलाह दी। मगर मंत्री ने इसकी अनदेखी करते हुए उस कंपनी को जमीन आवंटित कर दी। 

आम चुनाव के चंद महीने पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने जयंती नटराजन को बुला कर उनसे इस्तीफा देने को कहा था। उनका कहना था कि सोनिया गांधी का निर्देश है कि वे उनका इस्तेमाल संगठन में करना चाहती है। असली वजह यह थी कि जयंती नटराजन मंत्रालय में मनमानी कर रही थी। वे फाइलें लटका देती थी। जब वीरप्पा मोईली ने उनकी जगह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली तो पता चला कि जयंती नटराजन ने 350 फाइले अपने दफ्तर में रोक रखी थी। इस पर आगे चर्चा करने के पहले उनके बारे में  जानना जरूरी हो जाता है।

जयंती नटराजन पेशे से वकील थी और वे तमिलनाडु के अंतिम कांग्रेंसी मुख्यमंत्री एम भक्तवत्सलम की सगी पोती है। राजीव गांधी द्वारा सत्ता संभालने के बाद वे उनके संपर्क में आई और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब वे तमिलनाडु में दूरदर्शन की एंकर हुआ करती थी। उन्होंने इस पद पर रहते हुए जनरल करियप्पा का इंटरव्यू भी लिया था। वकील व एंकर होने के कारण वे अच्छी बहस कर लेती थी। राजीव गांधी ने उन्हें 1986 में राज्यसभा में भेजा और उसके बाद वे चार बार राज्यसभा की सदस्य रही। 

राजीव गांधी सरकार में उनकी काफी चलती थी। उन्हें वीणा बजाने का शौक है। राजीव गांधी के न रहने के बाद जब पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने और उन्होंने तमिलनाडु में अपने हिसाब से चुनावी तालमेल किया तो वे उनके विरोध में जीके मूपनार के साथ कांगेंस छोड़कर तमिल मनीला कांग्रेंस में शामिल हो गई। जब केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो वे उसमें नागर विमानन राज्यमंत्री बनाई गई। वे यूपीए-दो की सरकार में जुलाई 2011 से 20 दिसंबर 2013 तक मंत्री रही। इस दौरान पर्यावरण व वन मंत्रालय में क्या होता रहा उसका अंदाजा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान इस इलाके में अपनी जनसभाओं में ‘जयंती टैक्स’ का बार-बार जिक्र किया। 

वन मंत्रालय से इस्तीफा देने के बाद जयंती को भरोसा था कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी उन्हें संगठन में कोई पद देंगे। पद मिलना तो दूर रहा, इन दोनों ने उन्हें मुलाकात का समय तक नहीं दिया। अपने प्रखर व्यक्तित्व के कारण वे 10 सालों तक कांगेंस की प्रवक्ता भी रही थीं। एक दिन अजय माकन ने उनसे फोन पर कहा कि ऊपर से निर्देश आए हैं कि आपको प्रवक्ता के पद से हटा दिया जाए। 

इस बीच कांग्रेंस सत्ता से बाहर हो चुकी थी। जब जीके मूपनार के बेटे जीके वासन ने कांग्रेंस से अलग होने का ऐलान किया तो मोती लाल वोरा ने उन्हें फोन करके पूछा कि आपका क्या फैसला है? क्या आप भी पार्टी छोड़कर उनके साथ जा रही हैं? जयंती ने 30 जनवरी को कांग्रेंस से इस्तीफा दे दिया मगर जाते हुए सोनिया गांधी को एक लंबा चौड़ा पत्र लिख कर उसने सीधा उनकी राष्ट्रीय सलाहकार समिति व राहुल गांधी को निशाने पर ले लिया। उन्होंने कहा कि ये दोनों जो कहते थे वे उसी के अनुरूप काम करती थी। 

इसके बावजूद उन्हें हटाए जाने के महज एक दिन पहले राहुल गांधी ने फिक्की की एक सभा को दिल्ली में संबोधित करते हुए कहा था कि मुझे पता है कि उद्योगो के विकास की राह में रोड़े अटकाए जा रहे हैं। मैं इन्हें दूर करने जा रहा हूं। इसके साथ ही मुझसे इस्तीफा मांग लिया गया। मैं तो राहुल गांधी के इशारे पर ही काम करती थी। मुझे इनके दफ्तर में यह बताया जाता था कि किस क्षेत्र में किस परियोजना को स्वीकृति दी जानी है। मैं उसके अनुसार ही कदम उठाती थी। 

मैंने राहुल गांधी के ही कहने पर वेदांता के 30000 करोड रू की परियोजना को अनुमति देने से इंकार कर दिया था। अडानी के मामले में भी यही हुआ। कैबिनेट के मेरे साथियों ने मुझे यह अनुमति देने के लिए यह कहते हुए दबाव बनाया कि देश की अर्थव्यवस्था की पहले से ही बुरी हालत है। ऐसे में इतने बड़े निवेश की अनदेखी करना अनुचित होगा। राहुल गांधी ने इस संबंध में मुझे एनजीओ की शिकायते भेज कर अपने दफ्तर के दीपक बबारिया से संपर्क करने को कहा था। 

कुल मिलाकर जयंती नटराजन यह कहना चाहती है कि वे तो इस मंत्रालय में कठपुतली की भूमिका में थी जिसकी डोर राहुल गांधी के हाथों में थी। जयंती नटराजन कोई महान विभूति नहीं है और न ही उनका तमिलनाडु में कोई जनाधार है। उन्होंने इससे पहले भी भाजपा में शामिल होने की कोशिश की थी मगर नाकाम रही। यहां तक कह डाला कि वे नरेंद्र मोदी के स्नूपगेट के मामले में बयान नहीं देना चाहती थी। मगर हाईकमान खासतौर से सोनिया गांधी के निर्देश पर उन्होंने यह बयान दिया था। 

कुछ भी कहे पर यह तय है कि जयंती नटराजन बहुत बुरी तरह फंस चुकी है। अब राहुल गांधी उनके निशाने पर है। वे सीबीआई को बताएंगी कि उनके निर्देश पर उन्होंने क्या सही व क्या गलत काम किए। अगले आम चुनाव के पहले मोदी सरकार के पास राहुल गांधी को घेरने के लिए काफी मसाला होगा। जाति से क्षत्रिय जयंती नटराजन मोदी की तलवार के जवाब में राहुल पर तलवार भाजेगी। अगले कुछ महीने रोचक खबरें पढ़ने को मिलती रहेगी।

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