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हम कृतघ्न, नीच तंत्र व शहीद!

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे कुछ आदतों में बदलाव आने लगा है, जैसे कि प्रेस क्लब में घुसने के पहले वहां रखे नोटिस बोर्ड पर जरूर नजर डाल लेता हूं ताकि यह पता चले कि कौन पत्रकार दुनिया छोड़कर चला गया। यही स्थिति अखबारों के साथ भी है। अंग्रेंजी अखबारों की ओबिचूयरी या ट्रिब्यूट कॉलम में छपने वाले विज्ञापनों को ध्यान से देखता हूं ताकि यह पता चल सके कि कहीं कोई अपना परिचित तो स्वर्गवासी नहीं हो गया। 

जब 7 जुलाई के टाइम्स के ट्रिब्यूट कॉलम पर नजर डाली तो उसमें एक विज्ञापन कारगिल युद्ध के महावीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन अनुज नय्यर का भी था। इसमें उन्हें उनके परिवार के सदस्यों, दिवंगत पिता एसके नय्यर व कारगिल हाइट्स फिलिंग स्टेशन के कर्मचारियों द्वारा श्रद्धांजली दी गई थी। अनुज नय्यर से मैं कभी नहीं मिला। इसके बावजूद उनसे काफी लगाव हो गया। इसकी वजह यह थी कि उनके न रहने के बाद उनके परिवार को वसुंधरा एनक्लेव में पेट्रोल पंप आवंटित किया गया। था। उनके पिता एसके नय्यर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर थे व मां दिल्ली विश्वविद्यालय में लाइब्रेरियन थी। उनका दिल्ली में अपना घर था। मगर उन्हें यह पेट्रोल पंप घर से इतनी दूर अलॉट किया गया कि हर रोज घर से वहां पर आना उनके लिए मुमकिन नहीं था। 

इसलिए उन्होंने इस इलाके में घर की तलाश शुरू की व उन्हें हमारी हिंडन सोसायटी पसंद आ गई। कुछ समय बाद उन्हें थोड़े बड़े घर की जरूरत महसूस हुई क्योंकि उनका दूसरा बेटा भी अमेरिका से उनके पास अपने परिवार सहित मिलने व रहने आता था। एक कमरा उन्हें दफ्तर के कामकाज के लिए चाहिए था अतः उन्होंने मेरा फ्लैट पसंद कर लिया जोकि चार कमरों का था। फ्लैट दिलवाने वाले व्यक्ति से मैंने कह दिया था कि वे एक शहीद के पिता है इसलिए मैं उनसे किराए संबंधी बात नहीं करूंगा। इसके बावजूद उन्होंने जो किराया दिया वह उस समय के बाजार भाव से दिया था। 

मैंने उनसे कहा कि चूंकि वे चैक द्वारा किराए का भुगतान कर रहे हैं इसलिए मुझे इस पर कर भी देना होगा। उन्होंने कहा कोई बात नहीं। मैं टीडीएस का अपनी तरफ से भुगतान कर दूंगा। उन्होंने ऐसा ही किया। उन्होंने मेरे फ्लैट में कुछ बदलाव करवाए। जैसे कि कबूतरों को आने से रोकने के लिए जालियां लगवाई। एक टायलेट बदलवाया। मगर कभी मुझसे इसका खर्च वाहन करने को नहीं कहा। जब तक वे मेरे फ्लैट व इस दुनिया में रहे, मैंने भी अपने फ्लैट में कदम नहीं रखा। 

वे अक्सर छह महीने का किराया एडवांस में दे दिया करते थे। एक बार उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने अपने पेट्रोल पंप पर एक ही गांव के लोगों को नौकरी पर रखा है। उन्हें हिदायत दे रखी है कि अगर किसी भी कर्मचारी को घटतौली करते पकड़ा गया तो पूरे गांव के लोगों की छुट्टी कर दी जाएगी। उनका पेट्रोल पंप आज भी इतना लोकप्रिय है कि दिल्ली-नोएडा की सीमा पर स्थित होने के कारण नोएडा के लोग भी यही तेल भरवाने आते हैं। बिक्री के लिहाज से तो एक समय पर यह पेट्रोल पंप देश में दूसरे नंबर पर पहुंच गया था। 

वे बेहद सज्जन व्यक्ति थे और हमारी सोसायटी के सब लोग उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते थे। मगर कहावत है कि जिन लोगों की इस दुनिया में जरूरत है, उन्हें ईश्वर भी अपने पास जल्दी बुला लेता है। कुछ साल पहले उनका देहांत हो गया। वे कैंसर का शिकार बन गए। यह इस परिवार पर दोहरी मार थी क्योंकि 1999 के कारगिल युद्ध में उनका बड़ा बेटा अनुज नय्यर भी 7 जुलाई 1999 को शहीद हो गया था। जब कारगिल युद्ध हुआ तो वह 17 जाट रेजीमेंट में कारगिल के पिंपल II पर तैनात था। यह इलाका टाइगर हिल दोबारा हासिल करने की दृष्टि से बहुत अहम था। 

उसकी सगाई हो चुकी थी। वहां जाने के पहले उसने अपनी सगाई की अंगूठी अपने कमांडर को सौपते हुए कहा कि मुझे पता नहीं कि मैं वापस लौटूंगा या नहीं मगर मैं यह नहीं चाहता हूं कि मेरे न रहने पर यह अंगूठी पाकिस्तानियों के नापाक हाथों में पड़े। इस पर उसके कमांडर ने कहा कि तुम ऐसा क्यों सोचते हो। तुम जरूर जिंदा लौटोगे। उसने जवाब दिया कि भगवान न जाने क्या सोचता है। मैं यह अंगूठी साथ रखकर मर नहीं सकूंगा। अगर मैं मर जाऊं तो इसे मेरी मंगेतर को वापस सौंप दीजिएगा। वह अपनी टुकड़ी के साथ वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गया। 

उसके पराक्रम का अनुमान तो इससे लगाया जा सकता है कि उसे मरणोपरांत देश का दूसरा सबसे बड़ा सैनिक सम्मान महावीर चक्र प्रदान किया गया। उसके पिता नय्यर साहब इतने कड़े ओर बड़े दिल के थे कि उसके मरने के एक दिन पहले जब उनकी बेटे से बात हुई तो उन्होंने हंसते हुए उससे कहा था कि हार कर घर वापस मत आना वरना मैं गोली मार दूंगा। इस पर उसने जवाब दिया था कि पापा मैं आपका बेटा हूं। हार कर आने की बात सोच भी नहीं सकता हूं। 

जब अगले दिन ब्रिगेड हैडक्वार्टर से उसके शहीद होने की खबर देने वाला फोन आया तो नय्यर साहब समझ गए थे कि उन्हें क्या समाचार मिलने वाला है। फोन करने वाले ने उन्हें नमस्ते की और कुछ क्षणों के लिए चुप हो गया। नय्यर साहब ने खुद पूछा कि क्या वह लड़ते हुए मरा? जवाब में हां सुनाई पड़ा। उनके दिल पर क्या बीती होगी इसकी कल्पना करने से भी बदन सिहर उठता है। मगर उसके बाद इस देश और अफसरशाही ने जो कुछ किया उसे जानकार शायद कोई अपने बच्चों को सीमा पर नहीं भेजना चाहेगा।

सरकार ने अनुज की शहादत के मद्देनजर उसके परिवार को पेट्रोल पंप देने की पेशकश की जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। जब अनुज की रेजीमेंट की कमांडर ने उन्हें समझाते हुए कहा कि यह पंप आपको नहीं बल्कि आपके बेटे को अलॉट किया जा रहा है तो वे उसे लेने को तैयार हुए। इसके साथ ही उनकी परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया। दर्जन भर सरकारी एजेंसियों जिनमें दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली पुलिस से लेकर दिल्ली विद्युत प्राधिकरण तक शामिल थे उन्होंने उन्हें दौड़ाया। उनकी फाइल लटकाए रखी। बिजली वालों ने तो यहां तक कहा कि चूंकि आप शहीद के पिता है इसलिए हम आपको रिश्वत में 50 फीसदी छूट दे रहे हैं। आप तीन की जगह डेढ़ लाख दे दीजिए। 

अंततः उन्हें उनके घर से 35 किलोमीटर दूर वसुंधरा एनक्लेव में दिल्ली-नोएडा बार्डर पर पेट्रोल पंप के लिए जगह दी गई। बिजली न मिलने के कारण उन्होंने रिश्वत देने की जगह जनरेटर से उसे चलाया। संयोग से 26 जुलाई 2001 को राजग सरकार कारगिल विजय दिवस मना रही थी। उसमें एसके नय्यर को भी आमंत्रित किया गया था। वे जहां बैठे थे वो जगह प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के बैठने की जगह के पास थी। उन्होंने जब वहां खड़े सुरक्षाकर्मियों से कहा कि वे प्रधानमंत्री से कुछ कहना चाहते है तो उन लोगों ने उन्हें रोक दिया। इस पर उन्होंने जोर से चिल्लाते हुए कहा कि वाजपेयी साहब जो विजय दिवस आप यहां मना रहे हैं उसके लिए मेरे बेटे ने अपना खून दिया है। एक कारगिल आपने जीता और एक कारगिल मैं लड़ रहा हूं। और मैं यह जीतकर बताऊंगा। 

इसके बाद तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने मुलाकात के लिए बुलवाया और उनकी समस्याएं दूर करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई। अफसरशाही कितनी संवेदनहीन व क्रूर होती है इसका उदाहरण तब मिला जबकि एक अफसर ने जिसे एनओसी प्रमाणपत्र जारी करने थे, उनसे पूछा कि आप यह कैसे साबित कर सकते हैं कि आप ही अनुज नय्यर के पिता है। वह यह प्रमाण पत्र जारी करने के बदले में कुछ चाहता था। अंततः नय्यर ने इस मामले के संबंध में आडवाणी के दफ्तर फैक्स किया और उन्हें प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए।

संतोषश्वर नय्यर व भाभी जी मीना नय्यर काफी पूजा पाठ करने वाले लोग रहे। उन्होंने हमारी सोसायटी के मंदिर में देवी की मूर्तिया लगवाई। मंदिर के लिए कुछ-न-कुछ करते रहते हैं। हम लोगों ने अनुज की याद में मंदिर के प्रांगण में एक पत्थर लगाया है जिसमें उसकी शहादत का जिक्र है। मैं जब भी मंदिर जाता हूं तो हनुमानजी के सामने मत्था टेकने के पहले इस पत्थर के सामने अपना सिर जरूर झुकाता हूं। 

जब उसे श्रद्धांजलि देने वाला विज्ञापन पढ़ा तो आंखें भर आई मेरी समझ में नहीं आया कि मुझे क्या करना चाहिए। अंततः उसी पत्थर के आगे जा कर उसे याद करते हुए कुछ फुल अर्पित किया और अगरबत्ती जलाकर अपनी श्रद्धांजलि दी। भाभीजी से मेरी बात करने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। अगर यह विज्ञापन नहीं छपा होता तो शायद मुझे उसकी शहादत की वर्षगांठ याद न आती। लौटते समय सोच रहा था कि सवा सौ करोड़ के देश में किसी को भी इस शहीद की याद नहीं आई। क्या शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, सरीखे गीत उनकी शहादत का मखौल नहीं उड़ाते हैं? शहीद देश के लिए अपनी जान देता है मगर उसकी याद परिवार तक ही सीमित रह जाती है।

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