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मोदी राजनीति को दे रहे नई परिभाषा

विवेक सक्सेना
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इसे महज संयोग ही कहूंगा कि जब भाजपा ने पहली बार दक्षिण के अभेद्य किले को भेदते हुए कर्नाटक में अपनी सत्ता बनाई थी तब भी मैं वहीं था और इस बार भी मतदान के दिन व चुनाव परिणाम के बाद की राजनीति के दिनों में कर्नाटक में हूं। पहली बार विशुद्ध रूप से जनसत्ता के लिए बीएस येदियुरप्पा द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए जाने की रिपोर्टिंग करने के लिए गया था जबकि इस बार घूमने के लिए पहुंचा हुआ हूं। 

पत्रकार होने के नाते कर्नाटक के चुनाव को लेकर मन में तरह-तरह की बातें उठ रही थी। क्योंकि अगर सच कहूं तो यह कांग्रेंस व भाजपा के लिए चुनाव न होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक दिशा व दशा तय करने वाला चुनाव था। उनका पहला चुनाव गुजरात विधानसभा का चुनाव था जहां पहले की तुलना में कम सीटें मिलने के बावजूद भी उन्होंने अपनी सरकार बना ली थी। 

तब लगता था कि कभी कांग्रेंस ने नारा दिया था कि जनता से अपना नाता है, सरकार चलाना आता है। इसे हम लोग मजाक में कहते थे कि सत्ता से अपना नाता है, माल कमाना आता है। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा ने जिस तरह से बिहार, दिल्ली व पंजाब के अपवादों को छोड़कर महज दो विधायक जीतने के बाद भी जैसे राज्यों मे अपनी सरकारें बनाई उसे देखकर उसके लिए अपने मन में यह नारा जोर मारने लगा था कि विधायको से अपना नाता है, सरकार बनाना आता है। 

यहां पर यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि चुनाव नतीजे आने के पहले तमाम विद्वान चैनलों पर कह रहे थे कि ज्यादा सीटें आने पर अपने विधायको की कमी पूरी करने के लिए भाजपा या कांग्रेंस को जनता दल (एस) को मुख्यमंत्री पद देना पड़ेगा। अन्यथा वे उसके विधायक तोड़ने की कोशिश करेंगे। सच कहूं तो इस दौरान मुझे नहीं लगता था कि कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां जाति या धर्म की जगह नेता ज्यादा आसन रखते हैं। लोग अपने नेता को वोट देते हैं। जैसे कि लिंगायत के नेता बीएस येदियुरप्पा हैं तो कुरबा लोग सिद्धारमैया के साथ व गौड़ा जनता दल (एस) नेता कुमारस्वामी के साथ जुड़े हुए हैं।

ऐसे में भाजपा का वोट रहे लिंगायतो के बीच दरार डालने के लिए सिद्धारमैया ने उन्हें अलग धर्म का दर्जा देने का ऐलान कर दिया। मगर जब चुनाव नतीजे आए तो वे चौकाने वाले थे। लगभग सभी अनुमान धरे रह गए व भाजपा सत्ता के पास पहुंच गई।  

मगर सच कहूं कि उत्तर प्रदेश या दिल्ली की तुलना में यहां नतीजे आने के बाद जीतने वालो के घर के बाहर ज्यादा शोर शराबा देखने को नहीं मिला। कांग्रेंसी व जद(एस) के विधायक एलायंस के बावजूद सत्ता न मिलने की आंशका में है।  

इससे पहले तो चुनाव लड़ने वाला हर विधायक त्रिशंकु विधानसभा और अपने जीतने पर खुद को मधु कौड़ा बनने के सपने देख रहा था। कर्नाटक के चुनाव नतीजो ने देश की राजनीति को एक नई परिभाषा दी है। चुनाव नतीजे बताते है कि ज्यादा वोट हासिल करके सरकार बनाने का सपना देखना बेमानी है। राज्य में कांग्रेंस को भाजपा से वोट ज्यादा मिले बावजूद इसके वह सत्ता से बाहर है। ताबडतोड एलायंस बनाया तब भी राज्यपाल से न्यौते की उम्मीद नहीं। हालांकि यह पहला मौका नहीं था। इससे पहले भी 2008 में भाजपा ने कांग्रेंस से मामूली ही सही कम वोट प्रतिशत हासिल करके अपनी सरकार बनाई थी। पहले मुझे लग रहा था कि लिंगायतो में दरार डालकर सिद्धारमैया ने अपना मास्टर स्ट्रोक खेला है। मगर वे खुद चामुदेश्वरी से चुनाव हार गए। ध्यान रहे कि वे यहां के अलावा बदामी से भी चुनाव लड़े थे।

कर्नाटक के एक विद्वान का कहना था कि पहले राजनीति सांप्रदायिक होती थी मगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धर्म का सांप्रदायिक इस्तेमाल न करके उसके जरिए युवा वर्ग को राजनीति से जोड़ा। जिससे स्थानीय मुद्दे गौण हो गए। खासतौर से कांग्रेंस को भाजपा से ज्यादा वोट मिलना यह बताता है कि सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल काम नहीं कर रहा था। इसे भांपते हुए ही राहुल गांधी ने भी मोदी व शाह की तरह धार्मिक नेताओं और मंदिरो में मत्था टेका। 

उधर मोदी ने मतदान से पहले नेपाल के जानकी, मुक्तिनाथ व पशुपतिनाथ मंदिरों में गए जहां के मुख्य पुजारी कर्नाटक के उन इलाको से आते हैं जो कि अभी तक भाजपा समर्थक नहीं कहे जा सकते थे। इससे पहले संघ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर हिंदुओ के बीच धर्म की राजनीति को बदलने में काफी कामयाब रहे थे। मोदी व शाह को लोगों की नब्ज पहचानना अच्छी तरह से आता है। उन्होंने अपनी सफल रणनीति के जरिए स्थानीय मुद्दो को गौण कर दिया। यही वजह रही कि बेंगलुरू सरीखे शहर में जहां बडी तादाद में हिंदीभाषी व कामकाजी आईटी नौजवान रहते हैं वहा भाजपा आधी से ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही और लोग यह भूल गए कि इससे पहले यहां के अखबारों में इस झीलो बने शहर की झीलो के प्रदूषित होने व आग लगने की खबरें भी छपती थी। 

यहां आकर मुझे लगा कि कब्रिस्तान और श्मशान सरीखे जुमले उत्तर प्रदेश में ही नहीं चलते हैं बल्कि टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के मुद्दे पर कांग्रेंस को घेरा भी जा सकता है। ध्यान रहे कि लोकसभा व विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट न देकर सहज एक अपवाद छोड़कर मोदी ने यह साबित किया था कि वे चुनाव को मुस्लिम बनाम हिंदू बनाकर भी सता जीत सकते हैं। यह उनकी इस रणनीति का ही कमाल कहा जाएगा कि उसके सामने बीएस येदियुरप्पा व बेल्लारी बंधुओं के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले गौण हो गए। लोकपाल की नैतिकता के प्रतीक राज्य माने जाने वाले इस राज्य में नैतिकता ने घुटने टेक दिए। भाजपा ने दुश्मन का दुश्मन दोस्त, कहावत को चरितार्थ करते हुए जनता दल (एस) की तनमन से पूरी मदद की और चुनाव को त्रिकोणीय बनाकर जीत का समीकरण ही बदल दिया। 

सो जब तक कांग्रेंस के मणिशंकर अय्यर सरीखे लोग अपने बयान जारी रखेगे। मोदी के लिए हर चुनाव आसान होना जारी रहेगा। ध्यान रहे कि मैंने उत्तर प्रदेश विधानसभा में चुनाव नतीजो के बाद से ही खुद को राजनीति का जानकार पत्रकार मानना बंद कर दिया था। अब मुझे लगता है कि अगले साल होने वाले आम चुनाव में भी मेरी भूमिका एक आम दर्शक या श्रोता जैसी होनी चाहिए। राजनीति में अब दो और दो चार नहीं होते।

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