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खानाबदोश का वक्त लिए सऊदी अरब

यह खबर पढ़कर काफी अचरज हुआ कि अगले साल से सऊदी अरब में महिलाओं को कार चलाने की अनुमति मिल जाएगी। वे अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकेगी और ऐसा करने के लिए उन्हें अपने अभिभावकों की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। दरअसल पिछले एकाध साल से इस देश में जो कुछ हो रहा था उसे देख-सुनकर तो मैं यह सोचने लगा था कि हम लोग कितने पिछड़े हैं। 

जब तृप्ति देसाई ने शनि मंदिर में प्रवेश करके वहां की मूर्ति का स्पर्श किया तो जबरदस्त हंगामा हो गया। फिर पता चला कि सिर्फ नासिक के इस मंदिर में ही नहीं बल्कि देश के कई दूसरे मंदिरों में भी महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगी हुई है। अब सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग की छूट देने की खबर पढ़ने के बाद वहां उनके हालात पर नजर डाली तो पता चला कि पिछले 60-70 वर्षो से सऊदी अरब व उसके पड़ोसी देशों की गिनती भले ही दुनिया के सबसे अमीर देशों में होने लगी हो। वो सोने के नल लगवाते हो। उनके निजी विमान में हीरे मोती जड़े होते हों मगर आज भी उनकी सोच 1920-25 के दशक के खानाबदोश जैसी ही है। 

वे आज भी महिलाओं को कमतर करके आंकतें हैं और इस देश में महिलाओं की स्थिति संपत्ति की तरह मानी जाती है। उन्हें भी गाय, भेड़ों की तरह अपने पुरुषों पर निर्भर करना पड़ता है। वहां के समाज ने महिलाओं पर इतने ज्यादा प्रतिबंध लगा रखे हैं कि उसके सामने कार चलाने की अनुमति अभी तक न देना तो कुछ भी नहीं है। वहां महिलाओं पर इतने ज्यादा प्रतिबंध है कि वे अपने परिवार के सदस्यों के अलावा बाहर के पुरुषों से मेल-मुलाकात नही कर सकती है। ऐसा करने पर उन्हें जेल की सजा दी जा सकती है।

घर के बाहर निकलते समय उन्हें बुरका पहनना जरूरी होता है। हाथ और आंखों को छोड़ कर पूरा शरीर ढंकना पड़ता है इसलिए अनेक ऐसी जगहों पर जहां उनकी पहचान जरूरी होती है उसकी पुष्टि करने के लिए घर का पुरुष सदस्य जाता है। वे प्रेम विवाह करना तो दूर रहा अपने परिवार के पुरुष सदस्यों की इच्छा के बिना कहीं शादी नहीं कर सकती है। 

शिया महिला सुन्नी से शादी नहीं कर सकती है। काफिर या वामपंथी से तो शादी करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कुछ साल पहले बड़ा अजीबो-गरीब मामला देखने को मिला। एक महिला ने अपने पिता की अनुमति से किसी मुसलमान से शादी कर ली जिसका कबीला उसके कबीलों की तुलना में थोड़ा कमतर था। पिता के मरने के बाद उसके सौतेले भाई ने उसके खिलाफ अदालत में मान-हानि का मुकदमा दायर कर दिया। अदालत ने जबरन दोनों का तलाक करवा दिया। उस महिला को अपनी चार साल की बेटी के साथ कुछ साल जेल में काटने पड़े। अंततः वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी रिहाई करवाई। 

अगर पति पत्नी का तलाक हो जाता है तो पत्नी तभी अपने बच्चो को अपने साथ रख सकती है जबकि बेटे की आयु सात साल से व बेटी की नौ साल से कम हो। इस्लामी देश होने के कारण वहां शरीया कानून लागू होता हैं। बेटी को अपने परिवार की संपत्ति में बेटे की तुलना में आधा हिस्सा ही मिलता है। 

शरीया जब बना था तब कारें नहीं बनी थी इसलिए उसके महिलाओं को कार चलाने पर प्रतिबंध भी नहीं लगाया गया था। मगर सऊदी अरब दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जिसमें महिलाओं को कार चलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। उनका लाइसेंस नहीं बनता है अगर वे कार चलाने की कोशिश करें तो उन्हें गिरफ्तार करके सजा दी जाती है।

आंकड़ें बताते है कि 1990 में 50 महिलाओं को कार चलाने के अपराध में पकड़ा गया। उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए गए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। तब उन्हें सार्वजनिक रूप से 10-10 कोड़े लगाने की सजा मिली। इस बारे में वहां के शासकों की दलील रही है कि हम तो अपनी महिलाओं को रानी की तरह मानते हैं। उन्हें खुद कार चलाने की क्या जरूरत है। उन्हें तो पति या ड्राइवर के साथ जाना चाहिए। 

यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि कार में महिला पहली सीट पर ड्राइवर के साथ नहीं बैठ सकती है। वहां वे ड्राइवर से बात नहीं कर सकती है। साल भर पहले तो वहां के कानून मंत्रालय ने बड़ा अजीबो-गरीब फतवा जारी करवाया जिसमें कहा गया था कि ड्राइवर के साथ जाने वाली महिला को उसे अपना दूध पिला देना चाहिए ताकि उनके बीच खून का रिश्ता कायम हो जाए व ड्राइवर अकेले में उसे बुरी नजर से न देखें। 

वहां तो अपने पुरुष अभिभावक की मर्जी के बिना कोई महिला न तो पासपोर्ट बनवा सकती है न ही बाहर यात्रा कर सकती है। यहां तक कि उसे अपना ईलाज व गंभीर आपरेशन तक करवाने के लिए पुरुषों की स्वीकृति लेनी पड़ती है। हर महिला का पुरुष ‘संरक्षक वली’ होता है जो कि उसका भाई, पिता, पति या चाचा हो सकता है। व उनकी इच्छा के बिना उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सकती। नौकरी नहीं कर सकती। तलाक नहीं ले सकती है। बैंक में खाता तक नहीं खोला जा सकती है। 

जुलाई 2013 में प्रतिष्ठित किंग फहद अस्पताल में दुर्घटना की शिकार एक महिला के हाथ का आपरेशन महज इसलिए नहीं किया गया क्योंकि इसकी अनुमति देने वाला उसका पति दुर्घटना में मारा गया था व उसकी बेटी भी अस्पताल में भर्ती थी। वहां एक गरीब पिता ने पैसो के लालच में अपनी 8 साल की बेटी की शादी 42 साल के पुरुष से तय कर दी। उसको रोकने के लिए उसकी मां अदालत में गई पर वहां यह कहते हुए इस शादी पर रोक लगाने से इंकार कर दिया गया कि पिता को फैसला लेने का पूरा अधिकार है। 

एक महिला अपने पति से तलाक लेने के बाद दूसरी शादी इसलिए नहीं कर पाती क्योंकि उसके बेटे ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। वहां एक युवती को महज इसलिए आनर किलिंग का शिकार बनना पड़ा क्योंकि वह फेसबुक पर एक युवक के संपर्क में थी। अदालत ने उसके पिता को हत्या का दोषी नहीं माना। रेस्टोरेंट में महिला पुरुष के साथ ही जा सकती है। चूंकि खाना खाने के लिए चेहरा खोलना जरूरी होता है। इसलिए परिवार के लिए परदे वाले केबिन बनाए जाते हैं व वेटर सामान लाने के लिए पर्दा हटाने के पहले अपने आने की सूचना देता है ताकि महिला मुंह ढक सके। 

वहां के कानून में एक पुरुष की गवाही को दो महिलाओं की गवाही के बराबर माना जाता है। महिला के अधिकार ना साजिश के बराबर होते हैं। इस साल वहां के शासक किंग सलमान ने उदारता दिखाते हुए महिलाओं को शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में नौकरी करने की इजाजत दे दी थी। उन्हें इन दो क्षेत्रों में नौकरी करने के लिए किसी वली की इजाजत लेना जरूरी नहीं। उन्होंने संसद में भी 14 फीसदी महिलाआं को मनोनीत किया। खास बात यह है कि सऊदी अरब की महिलाएं भी इन प्रतिबंधों को सही मानते हुए उन्हें अपनी संस्कृति का हिस्सा बताती है। 

यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि पैगंबर की पहली पत्नी खदीजा बिंत खुद व्यापार करती थी और उन्होंने पैगंबर से शादी करने के पहले उन्हें अपने यहां नौकरी पर रखा था। उनकी दूसरी पत्नी आयशा ने बसूराह के युद्ध में सेना का नेतृत्व किया था। खुद पैगंबर कहते थे कि आपका जितना अपनी महिलाओं पर अधिकार है उतना ही महिलाओं का आप पर अधिकार है। इसके बावजूद महिलाएं सऊदी अरब में खुद व्यापार नहीं कर सकती है। कर्ज नहीं ले सकती है। खेलों में हिस्सा नहीं ले सकती है। 

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