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मलाला के बाद अच्छी खबर कृष्णा

विवेक सक्सेना
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बहुत दिनों बाद पाकिस्तान से एक अच्छी खबर सुनने को मिली है। इससे पहले वहां कि किशोरी मलाला युसुफजई पर आतंकवादियों ने जानलेवा हमला किया था उन्हें नोबल पुरुस्कार मिलने की खबर आई थी। अब नवीनतम खबर वहां की एक दलित हिंदू महिला कृष्णा कुमारी कोली के वहां के राज्यसभा याकि सीनेट का देश का पहला ऐसा सदस्य बनने की खबर है जो दलित महिला हैं। 

वहां की संसद के इस उच्च सदन की 104 सीटों में से 52 के लिए चुनाव होने थे। इसमें वे वहां के सिंध प्रांत की थारपरकर सीट से जीत गई। उनकी इस जीत ने उनके, हिंदुओं के व पाकिस्तान के बारे में यादें ताजा कर दी हैं। 

कृष्णा महज 38 साल की है। उनके पिता जुगनू कोली इसी सिंध के एक बड़े जमींदार (वडेरा) के गुलाम थे व सपरिवार उसके संरक्षण में रहते थे। गुलाम रहते हुए ही कृष्णा का जन्म हुआ। जब वह तीन साल की थी तब वह आजाद हुई जब वह महज नवी कक्षा में पढ़ती थी तो 16 साल की आयु में उसकी शादी हो गई। हालांकि उसके पति व उसके ससुराल वालों ने उसे कभी पढ़ने से नहीं रोका और वह मिट्टी के तेल वाली लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करती रही। 

उसने 2013 में समाजशास्त्र में एमए किया और वह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से जुड़ गई जिसने उसे अपना उम्मीदवार बनाया। यहां यह बता दें कि पाकिस्तान जैसे इस्लामी देश में इस पार्टी ने महिलाओं के हित में कुछ खास काम किए हैं। उसने देश की नेशनल एसेंबली में पहली महिला स्पीकर नियुक्त की, सिंध विधानसभा में पहली डिप्टी स्पीकर व पहली महिला विदेश मंत्री नियुक्त करने का श्रेय भी इसी पार्टी को जाता है। 

इस पार्टी ने पहली बार सीनेट में 70 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित रखी थी। उसके छोटे भाई को जोकि मानवाधिकार कार्यकर्ता है पिछले साल हत्या के एक झूठे मामले में जेल भेज दिया गया था। चंद दिन पहले वह अदालत के हस्तक्षेप के बाद हैदराबाद जेल से रिहा हुआ है। उसके बाबा रूपोलो कोली एक जाने माने स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1857 के गदर में अंग्रेंजो के साथ टकराव लिया था व बाद में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया था। 

उसका सीनेटर बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह दलित हिंदू महिला होने के साथ ही सिंध व पाकिस्तान से संबंध रखती है। वह उमेरकोट जिले के थारपरकर इलाके की रहने वाली है। भारत की जैसलमेर व कच्छ के रन के बीच स्थित यह इलाका राजस्थान सीमा से 60 किलोमीटर दूर है। इस जिले में 15 अक्तूबर 1542 को तीसरे मुगल सम्राट अकबर का वहां के तत्कालीन हिंदू राजा राना प्रसाद के महल में जन्म हुआ था। 

चंगेज खान का वंशज अकबर बाबर के बेटे हुमांयू का पुत्र था। आजादी के पहले अमेरकोट को अमर कोट कहा जाता था वह हिंदू बाहुल्य इलाका था। ठीक वैसे ही कि जैसे सिंधु घाटी की सभ्यता व मोहनजोदड़ो हिंदू धर्म से जुड़े थे। पाकिस्तान बनने के बाद भी सिंध के इस शहर में 80 फीसदी लोग हिंदू थे। 

आज भी इस देश में सबसे ज्यादा हिंदू सिंध के अमेरकोट में ही रहते हैं। आजादी के बाद यहां रहने वाले ज्यादातर जमींदार हिंदू ठाकुर थे जिनके यहां मुस्लिम व हिंदू मजदूर काम करते थे जिन्हें किहारी कहा जाता था। जमींदार इन लोगों का लालन पालन करता था व उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च तक उठाता था। 

थारपरकर दुनिया का एकमात्र ऐसा रेगिस्तान है जो कि उपजाऊ है इसलिए यहां हमेशा से खेती होती आई है। मगर 1965 व 1971 के बाद हालात बदल गए। इन दोनों युद्धों के दौरान भारतीय सेनाएं थारपरकर तक घुसी चली आई व वहां के निवासियों को वह जगह छोड़कर जानी पड़ी। इन युद्धों के बाद बड़ी तादाद में ठाकुर जमींदार भारत चले गए व बड़ी तादाद में दलित कोली, भील व मेघवाल हिंदू रह गए। पहले वहां 20 फीसदी मुसलमान व 80 फीसदी हिंदू रहते थे मगर आज 40-50  फीसदी हिंदू हैं। पाकिस्तान की एसेंबली में सबसे ज्यादा हिंदू सांसद बनिया है।

इस देश की राजनीति में हिंदुओ की ही नहीं अन्य अल्पसंख्यको की स्थिति भी बेहद अजीबो-गरीब रही हैं। लगभग 20 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आबादी का महज दो फीसदी हिंदू बचे है। उनके अलावा ईसाई, सिख, बौद्ध भी अल्पसंख्यकों की श्रेणी में आते हैं। वहां इन सबकी स्थिति बहुत खराब है। अल्पसंख्यकों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपनी बेटियों की रक्षा करना है। खासतौर से तालिबान के आने व आतंकवाद के हावी होने के बाद जबरन शादी व धर्म परिवर्तन की सबसे ज्यादा घटानाएं सिंध में ही घट रही है। 

पिछले साल औसतन हर माह वहां 25 बच्चियों के धर्म परिवर्तन किए जाते थे। यहां सबसे ज्यादा ऑनर किलिंग, कुरान से शादी करने, बंधुआ प्रथा व सैक्स संबंध अपराध दर्ज किए जाते हैं। हालात इतने खराब है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सत्ता में रहते हुए जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून लाने की कोशिश की थी मगर मौलवियो व आतंकवादियों के विरोध को देखते हुए वह पीछे हट गई। 

सिंध व थारपरकर के वडेरा तो मुस्लिम लड़कियों तक को नहीं बख्शते हैं। गुलामी, गरीबी व दमन के कारण बड़ी तादाद में धर्म परिवर्तन हो रहे हैं। भारत में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद तो वहां व्यापक हिंसा हुई व मंदिरों पर हमले हुए थे। वहां की सत्ता पंजाबी मुसलमानों के हाथ में रही है जो कि विघटन के बाद आज भारतीय मुसलमानों को मोहाजिर कहते हुए उनको निचली नजर से देखते हैं। 

मालूम हो कि देश के बंटवारे के समय 10 लाख लोग मारे गए थे। तब 45 लाख हिंदू व सिख पाकिस्तान से भारत आए थे व यहां से 65 लाख मुसलमान गए थे। ऋग्वेद की रचना सिंधु नदी, घाटी के तट पर हुई थी व लाहौर को लव का व कासूर को कश का शहर माना जाता था। जिस देश में हिंदुओं को डरपोक, पोगापंथी, यहूदियों को खून चूसने वाला ईसाई को दमनकारी व हमलावर बताते हुए बच्चों से जेहाद के लिए हरदम तैयार रहने को कहा जाता हो वहां एक दलित युवा महिला का सांसद बनना बहुत बड़ी उपलब्धि है। कम-से-कम मायावती को इस और ध्यान देना चाहिए।

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