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हम शहीदों को भूल गए

विवेक सक्सेना
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आज मुझे लगा कि मैं बहुत बड़ा अज्ञानी हूं। इस सत्य का बोध होने की वजह एक अंग्रेंजी के अखबार में छपे दो विज्ञापन थे। मेरे पास इतने सारे अखबार आते हैं मगर सिर्फ एक ही अंग्रेंजी के अखबार में यह विज्ञापन छपा और इसकी गहराई में जाने पर मुझे पता चला कि देश के सबसे खोजी व चर्चित अखबार में खोजी व राजनीतिक पत्रकारिता करने के बावजूद मैं एक अहम सत्य से अनभिन्न रहा हुआ हूं। 

विज्ञापन 8 मई के अखबार में छपा। इसमें दिल्ली सरकार द्वारा शहीदी दिवस पर चार शहीदो मास्टर अमीर चंद, वसंत कुमार बिस्वास, मास्टर अवध बिहारी व भाई बाल मुकुंद को श्रद्धांजली दी गई। इस विज्ञापन में कहा गया था कि इन चारों शहीदो को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज स्थित शहीद स्मारक स्थल पर शहीदी दिवस मनाते हुए श्रद्धांजली अर्पित करेंगे। 

यह पढ़ कर मुझे बहुत अजीब लगा और खुद पर शर्म भी आई। मैंने अपनी जिदंगी का बहुत बड़ा हिस्सा जिस अखबार जनसत्ता में नौकरी करते हुए बिताया है वह बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित इंडियन एक्सप्रेस भवन से निकलता था और उसके सामने सड़क पर मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज था। हम लोग अक्सर वहां जाते थे। वहां मेरे अंकल की दाढ़ निकाली गई थी फिर भी इस स्थान की अहमियत को लेकर मुझे अक्ल नहीं आई और मुझे यह पता ही नहीं चला कि देश की आजादी की लड़ाई का इतना अहम स्थल इतना पास था। 

वहां तो वह कांड हुआ था जो अंग्रेंजो द्वारा देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थांतरित किए जाने के बाद उनके खिलाफ किया गया था। देखा जाए तो यह मामला कुछ दशकों बाद दिल्ली की संसद में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा बम फेंके जाने की तुलना में कही ज्यादा अहम था। क्योंकि इसमें तो उन्होंने तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंक कर सीधे हमला किया था। 

राजधानी के दिल्ली आने के बाद उन पर हमले की योजना तैयार की गई जिसमें ये चारों शहीद शामिल थे। इनमें से अमीर चंद के बारे में मुझे कुछ ज्यादा मालूम ही नहीं था हालांकि उनके परिवार द्वारा संचालित कंपनी एस चंद एंड कंपनी से मैं बहुत अच्छी तरह से परिचित था। हमारी दसवीं की कक्षा की विज्ञान की पुस्तकें उनके द्वारा ही प्रकाशित की जाती थी। वे देश के जाने-माने पाठ्यपुस्तक प्रकाशकों में से एक है व दिल्ली के रामनगर स्थित बहुत महंगे इलाके में उनका कई एकड़ में फैला दफ्तर है। 

मैं अनेक बार वहां भी गया। अब पता चला कि यह कंपनी तो मास्टर अमीर चंद के परिवार के सदस्यों की है। मास्टर अमीर चंद ने कैब्रिज मिशन स्कूल से हाई स्कूल करने के बाद ही आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था।  वह लाल हरदयाल के काफी करीब आ गए। उन्होंने व अवध बिहारी ने दिल्ली के बहु प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कालेज से स्नातक किया। वे दोनों ही दिल्ली में शिक्षण का काम करने लगे। वे लाला हरदयाल से प्रेरित होकर क्रांति तेज करने के लिए अमेरिका गए और विदेश में रह रहे भारतीयों की गदर पार्टी के नेतृत्व के असर में आए। 

उन्होंने वापस लौट कर हैदराबाद से लिबर्टी नामक साप्ताहिक पत्र निकाला। वे सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार गनी खान के संपर्क में आएं। बताते है कि उन्होंने ही उन्हें सीमांत गांधी या फ्रंटियर गांधी का नाम दिया था। वे हैदराबाद में रहकर क्रांतिकारी साहित्य प्रकाशित कर देशभक्तो की तस्वीरे बेचने लगे। उन्होंने पंजाब के क्रांतिकारियों से गहरे संबंध बनाए। अमीर चंद के पिता हुकुम चंद भी स्कूल टीचर थे। अमीर चंद ने बचपन से ही सामाजिक सद्भाव, परिवर्तन के कामों में रूचि ली। वे बड़ी तादाद में विधवा विवाह करवाते थे और महिलाओं की शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। 

उत्तर भारत में उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां तेज करने में रास बिहारी बोस ने बहुत अहम भूमिका अदा की। जब 23 दिसंबर 1912 को तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग दिल्ली के चांदनी चौक इलाके से हाथी पर अपनी शाही यात्रा निकाल रहे थे तो वसंत कुमार विश्वास ने उन पर एक देसी बम से हमला किया। इस हमले में वायसराय तो बच गए मगर उनका महावत घायल हो गया जिसकी बाद में मौत हो गई। राजधानी बदले जाने के बाद हुआ यह पहला हमला था। 

इसकी योजना में इन चार शहीदों ने अहम भूमिका अदा की थी। इनमें बिस्वास सबसे छोटे थे व महज बालिग ही हुए थे। उन्हें पुलिस ने तब गिरफ्तार किया जब कि वे अपने दिवंगत पिता के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए पश्चिम बंगाल के नादिया इलाके में उनकी चिता के पास थे। अवध बिहारी ने भी सेंट स्टीफेंस से शिक्षा हासिल की थी और उन पर लाहौर के लाटेस गार्डन में बम से हमला करने का आरोप था जिसमें 20 लोग मारे गए थे। 

बाल मुकुंद महाराजा जोधपुर के बच्चो को ट्यूशन पढ़ाते थे। एक-एक करके अंग्रेंजो ने इन चारों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इस कांड का नाम लाहौर षडयंत्र कांड रखा गया। उन दिनों मौलाना आजाद मेडिकल कालेज नहीं होता था बल्कि उसकी जगह सेंट्रल जेल व फांसी घर हुआ करता था। भाई बाल मुकुंद, अवध बिहारी व मास्टर अमीर चंद को 8 मई 1915 को इसी स्थान पर फांसी दी गई। वसंत कुमार को पहले उम्र कैद दी गई व बाद में सरकार ने इस सजा के खिलाफ अपील की व उसे अंबाला जेल में मौत की सजा दी गई। अब मौलाना आजाद मेडिकल कालेज में एक उपेक्षित सा शहीद स्थल बना हुआ है व शहीदो के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। 

यहां सिर्फ उन लोगों के नाम लिखे है जिन्हें यहां फांसी दी गई थी। अमीर चंद के बेटे लाला सुल्तान चंद सांसद बने व उन्हें पद्मश्री मिला। उनके बेटे व अमीर चंद के पोते श्याम लाल गुप्ता ने सुल्तान चंद एंड कंपनी व एस चंद एंड कंपनी के नाम से प्रकाशन का काम स्थापित किया। आज इतने विशिष्ट क्रांतिकारियों को काई नहीं जानता। ऐसे में बड़ी आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब राजधानी में फांसी की सजा पाने वाले शहीदो को वहां सामने स्थित फ्लीट स्ट्रीट का मीडिया भी भूला हुआ हो तो उन शहीदो को कौन याद करता होगा जिन्हें देश के दूर-दराज इलाकों में अंग्रेंजो ने फांसी पर लटकाया था। 

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