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दास्तान-ए-दीना

इंसान क्या सोचता है और वक्त क्या करता है, इसकी जीती जागती उदाहरण रही है दीना वाडिया। वे 99 साल की उम्र में दुनिया छोड़ कर चली गई। वे जाने माने उद्योगपति नुसली वाडिया की मां और पाकिस्तान के जनक कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना की इकलौती संतान थी, जिन्हें खुद जिन्ना ने अपनी पत्नी के न रहने के बाद पाला था और बचपन का काफी समय उसके साथ बिताने के लिए वे राजनीति से अलग होकर लंदन चले गए थे। जिन्ना ने भले ही धर्म आधारित पाकिस्तान की आधारशिला रखी थी मगर वे पहले ऐसे नहीं थे। 

संयोग से वे और महात्मा गांधी दोनों ही गुजरात के थे। दोनों ने ही अपने कैरियर की शुरुआत वकील के रुप में की थी। जिन्ना मुंबई के जाने माने वकील थे। उन्होंने अपने मुवक्किल व बहुत धनी व प्रतिष्ठित पारसी उद्योगपति दिनशा पेरिट ने इकलौती बेटी रतनबाई पेटिट से प्रेम विवाह किया था। जब रतनबाई व उनके बीच प्यार हुआ तो वह 16 साल की थी। जिन्ना 40 साल के थे। उनसे शादी करने के लिए रतन ने अपना परिवार व धर्म दोनों ही छोड़ दिए। 

इस विवाह को लेकर मुंबई में बहुत हंगामा हुआ था। जिन्ना उनसे शादी करने के बाद लंदन में प्रैक्टिस करने लगे जहां 15 अगस्त 1919 को उनकी इकलौती बेटी दीना पैदा हुई। जिन्ना को बहुत अच्छे व मंहगे कपड़े पहनने का शौक था। उनके पास 200 सूट थे व सिल्क की टाई सिर्फ एक बार ही पहनते थे। उनके ड्राइवर समेत उनके घरेलू नौकर अंग्रेज थे। 

जब 1940 में उन्होंने अपनी वकालत छोड़ी उस समय वे 40 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रहे थे। बाद में जिन्ना रतनबाई के बीच दूरियां बढ़ी। रतनबाई उनसे शादी करने के लिए मुसलमान बन गईं। व उन्होंने अपना नाम मरियम रख लिया था। बाद में जिन्ना को अपने ससुर दिनशा पेटिट के हालात से गुजरना पड़ा। उनकी बेटी दीना को मुंबई के एक बहुत बड़े उद्योगपति नेवेली वाडिया से प्यार हो गया जिनका खानदान ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए जहाज और बंदरगाह बनाता आया था। 

अमेरिका के सिविल वार के दौरान जब वहां से कपास का निर्यात लगभग बंद हो गया तो वाडिया परिवार ने दक्षिण में कपास खरीद कर उसे दुनिया के तमाम देशों में भेजी और बहुत लाभ कमाया। उनके खानदान ने मुंबई में पहली कपड़ा मिल स्थापित की। वे लोग उन पारसियों में शामिल थे जिन्हें मछुआरों के गांव माने जाने वाले मुंबई को देश के सबसे बड़े औद्योगिक शहर में बदल दिया। 

जब जिन्ना को दीना के प्रेम की बात पता चली तो उन्होंने उनसे कहा कि इस देश में लाखों मुसलमान लड़के हैं। क्या तुम्हें उनमें से एक भी अपने लायक नहीं लगा तो दीना ने पलट कर जवाब दिया कि जब आपने मेरी मां से शादी की थी तब भी देश में लाखों मुसलमान लड़कियां थी मगर आपने एक पारसी को पत्नी बनाना क्यों पसंद किया? जवाब में जिन्ना ने इतना ही कहा था कि वह मुसलमान बन गई थी।   

पेटिट की 1929 में महज 29 साल की उम्र में मौत हो गई। वे कैंसर से पीड़ित थीं व उन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम कुछ वर्ष अपने पति से अलग होकर बिताए। वे मुंबई के ताज होटल में रहने लगी थीं। उनके व जिन्ना के बीच काफी दूरी बढ़ चुकी थी। उनकी बेटी ने 1938 में शादी की और उसको आशीर्वाद देने के लिए जिन्ना नहीं गए। उन्होंने उससे सारे संबंध तोड़ लिए हालांकि कानूनी रुप से उसने संबंध समाप्त नहीं किया। 

वे कहते थे कि अपनी बेटी और पत्नी की यादें भुलाने के लिए ही उन्होंने प्लोजेट रोड (मालाबार हिल्स) स्थित उस घर को तुड़ा कर वहां एक नया घर बनाया जिसकी उस समय लागत दो लाख रुपए आयी थी व ब्रिटिश आर्किटेक्ट क्लॉड बैटले ने उसका निर्माण किया था। अपने पिता के जीते जी दीना कभी उस घर में नहीं गई। जब पाकिस्तान बना तो 7 अगस्त को जिन्ना अपनी दिवंगत पत्नी की कब्र गए और फिर अपनी बहन फातिमा के साथ कराची चले गए। 

दीना से उन्होंने कोई बात तक नहीं की। जिन्ना को घरों का बहुत शौक था। उन्होंने लंदन के सबसे पॉश इलाके हौंसटेड में व दिल्ली में 10 औरंगजेब रोड स्थित बंगले खरीदे थे। जिन्ना ने अपनी वसीयत में सबकुछ अपनी बहन को दे दिया था। जिन्ना की पाकिस्तान में कायदे आजम व उनकी बहन को मादरे मिल्लत कहा जाता था। 

तकदीर का खेल भी गजब का होता है। दीना ने अपने पिता से सारे संबंध समाप्त कर जिस व्यक्ति से प्रेम विवाह किया उससे पांच साल बाद सारे संबंध समाप्त कर लिए। वे अपने पिता के साथ पाकिस्तान नहीं गई मगर उन्होंने आजादी के कुछ वर्षों बाद ही भारत भी छोड़ दिया और वे लंदन और न्यूयार्क में रहने लगीं। हालांकि उनका अपने बेटे नुसली वाडिया से लगातार संपर्क बना रहता था। 

वे अपने पिता को ‘ग्रे वुल्फ’ कहकर संबोधित करती थी। जो टर्की के शासक कमाल अतानुर्क के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द था। जिन्ना आजादी के पहले से काफी बीमार रहते थे व टीबी व कैंसर से पीड़ित थे। अंतिम वायसराय लार्ड मांउटबैटन ने कहा था कि अगर मुझे यह पता होता कि वह चंद दिनों के मेहमान है तो मैं यह विभाजन ही टाल देता। जिन्ना का सितंबर 1948 में निधन हो गया। वे एक दिन में 40 सिगरेट पीते थे। पाकिस्तान बनने के बाद पहली बार 1948 में दीना वहां तब गई जबकि जिन्ना का निधन हुआ। 

जब वे बीमार चल रहे थे तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने उनसे पूछा था कि क्या वे दीना को बुलवा ले मगर जिन्ना ने उन्हें दीना को वीजा देने से इंकार कर दिया। जिन्ना के निधन के बाद लियाकत अली खान ने पाकिस्तान से एक चाटर्ड विमान भारत भेजा जो कि दोनों को लेकर कराची गया। उन्हें अंतिम विदाई देकर दीना वापस भारत लौट आयी, दोबारा वे परवेज मुशर्रफ के निमंत्रण पर लौहार भारत-पाक क्रिकेट मैच देखने के लिए अपने परिवार समेत गई थीं। 

एक बार जब वे लंदन से भारत लौट रही थी तो उनका विमान ईंधन भरवाने के लिए कराची में उतरा। तत्कालीन गवर्नर जनरल ने उनसे अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया मगर वे उनके घर जाना तो दूर रहा विमान से भी नहीं उतरीं। उन्होंने सच कह दिया कि मैं यहां की धरती पर कदम भी नहीं रखना चाहती हूं। बताते हैं कि दीना की अपनी बुआ से कभी नहीं बनी। उन्हें लगता था कि उनके पिता बहुत कंजूस थे व मां व वे उन्हें पर्याप्त समय नहीं देते थे। 

बताते हैं कि जब जिन्ना गवर्नर-जनरल बने तो वहां की रसोई का जिम्मा उनकी बहन फातिमा पर आ गया। एक दिन उसने नौकर से कहा कि तुम एक दर्जन केले व एक दर्जन संतरे ले आओ आज कुछ लोग खाने पर आ रहे हैं। जिन्ना ने तो एक बार अपने एडीसी को इसलिए हड़का दिया था क्योंकि उसने बैरे को कुछ ज्यादा रकम टिप में दी थी। 

क्या संयोग है कि जिन्ना व नेहरु दोनों ही अपनी दामादों से खुश नहीं थे। जिन्ना ने जिस पाकिस्तान के लिए इतनी जद्दोजहद की थी वहां उनकी अपनी बेटी नहीं गई। उनकी प्रिय पत्नी की कब्र और बेहद प्यारा घर भी मुंबई में रह गया। पाकिस्तान ने भी उन्हें नहीं बख्शा। काफिर से शादी करने के कारण वहां उनके विरोधी उन्हें काफिरे आजम कह कर बुलाने लगे। कराची स्थित कायदे आजम अकादमी ने उन पर जो 806 पेज का ग्रंथ तैयार किया है उसमें मरियम और दीना, दोनों का ही कोई जिक्र तक नहीं है। आज भी मालाबार हिल स्थित घर को लेकर मुकदमेबाजी चल रही है।

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