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प्यारे लाल और लक्ष्मीकात की जोड़ी !

विवेक सक्सेना
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पुरानी कहावत है कि नाम में क्या रखा है। अपना मानना है कि बहुत कुछ रखा है। बचपन में मेरा एक मित्र था। वह जाति में ब्रह्मण था व चार भाई थे। उसके पिता ने अपने चारों बच्चों के नाम काफी बड़े रखे थे। उसका नाम राघवेंद्र कौशलेंड प्रकाश वाजपेयी था। अब वह बड़ा होकर सरकारी अफसर है और उसका नाम आर प्रकाश हो गया है। 

महाराष्ट्र में युवक अपने नाम के साथ पिता का नाम व महिलाएं पति का नाम लगाती है। पंजाब में व दक्षिण में तो गांव का नाम साथ में लगाया जाता है। जैसे खन्ना, बादल आदि पंजाब के स्थानों के नाम है। अपने सिख अकाली मित्र तो रहने के अलावा धंधें को भी नाम के साथ जोड़ देते हैं। जैसे आटोपिन, ग्रेटर कैलाश, भोगल आदि। 

पिछले दिनों जब जाने-मानें सूफी गायक प्यारे लाल वडाली के निधन की खबर आई तो उनके बारे में जो कुछ छपा उसमें उनके बड़े भाई पूरन चंद वडाली के बारे में भी काफी जानकारी थी जोकि अभी जीवित है। तब मुझे लगा कि फिल्मी दुनिया में ऐसे जो तमाम नाम हुए उनमें एक बड़ा नाम लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है। वे इस देश के जाने-माने संगीतज्ञ थे। लक्ष्मीकांत आयु में उनसे तीन साल छोटे थे मगर अब दुनिया में नहीं रहे। जबकि प्यारेलाल आज भी अकेलगी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 

जैसे बनारस में राधा कृष्ण व अयोध्या में सीताराम शब्द इस्तेमाल किया जाता है वैसे ही आज भी यह दोनों नाम एक साथ लिए जाते हैं। आज आप गूगल पर खोज करें तो वहां भी आपको दोनों नाम साथ ही मिलेंगे। दोनों की जोड़ी अपने आप में बेहद रोचक रही जिसने तमाम अनोखे काम किए। संयोग से वह दोनों ही गरीब परिवारों से संबंध रखते थे व प्यारेलाल ने महज आठ साल की उम्र में पैसा कमाने के लिए वायलिन बजाना शुरू कर दिया। 

उनके पिता भी छोटे-मौटे संगीतज्ञ थे व उनका नाम राम प्रसाद शर्मा था जोकि मुंबई में ही रहते थे जबकि 1937 में जन्मे लक्ष्मीकांत का पूरा नाम लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर था। दोनों साथ आए व उनकी जोड़ी बनी। प्यारेलाल बताते हैं कि प्यारे लाल का सारा जोर गीत पर होता था जबकि वे आक्रेस्ट्रा पर जोर देते थे। उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता। अकसर प्यारेलाल के पिता पैसे उधार लेने के लिए उसे अपने साथ ले जाते थे ताकि एक बच्चे को साथ देखकर पैसा देने वाले को दया आ जाए। 

उन्होंने लता मंगेश्कर व मोहम्मद रफी से भी 500-500 रुपए उधार लिए थे। एक बार संयोग से किसी गाने की रिकार्डिंग के दौरान वे सब साथ थे। प्यारेलाल ने अपनी जेब से यह राशि निकाल कर दोनो को देनी चाही तो रफी ने यह कहते हुए पैसा लेने से इंकार कर दिया कि उन्हें कुछ याद नहीं है जबकि लता ने उनसे कहा कि तुम आज इस राशि को ईनाम के तौर पर रख लो। 

जब उनकी शादी हुई तो प्यारेलाल की होने वाली पत्नी ने समझा कि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल एक ही नाम है। उनकी पहली फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। मगर जब रिलीज हुई तो उन्हें जबरस्त शोहरत मिली। उन्हें इस क्षेत्र में 13 साल तक काम करने के बाद यह उपलब्धि मिली थी। उनकी हैसियत का तो अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्हें 635 फिल्मों में 3810 गानों में अपना संगीत दिया। उनकी खासियत यह थी कि वे लोग फिल्म में हर तरह का संगीत खुद ही देते थे। चाहे इसमें दरवाजा खुलने की आवाज से लेकर बैकग्राउंड संगीत कुछ भी क्यों न हो। 

वे बताते है कि तब औसत एक फिल्म में आधा दर्जन गाने होते थे जिसे 125 से 135 संगीतज्ञ कलाकारों की टीम तैयार करती थी। जब उन्हें एक गाने का संगीत देने के 2 से 2.5 लाख तक मिल जाते थे व उनको हर गाने पर 80-90 हजार की बचत हो जाती थी। वे लोग राजकुमार, देवानंद, बीआर चौपड़ा, शक्ति सामंत, मनमोहन देसाई, यश चौपड़ा, ओमप्रकाश, सुभाष गई जैसे निर्माताओं के पसंदीदा संगीतज्ञ थे। 

लक्ष्मीकांत ने तो महज आठ साल की उम्र में गोवा के एंथोनी गोसाल्वेज से वायलिन बजाना सीखा था और बाद में अपनी गुरू दक्षिणा के रूप में फिल्म अमर अकबर एंथोनी का गीत ‘माई नेम इज एंथोनी गोंसल्वेज’ तैयार किया। उस समय एंथोनी जीवित थे और शंकर जयकिशन की जोड़ी से बेहद प्रभावित थे। शंकर जयकिशन ने अपना आरकेस्ट्रा महज इसलिए बनाया क्योंकि लग रहा था कि वह तो इन दोनों द्वारा तैयार किया हुआ गीत है। उन्होंने कहा कि इसी तरह आरडी बर्मन के साथ हुआ। 

वे लोग फिल्म ‘ज्वैलथीफ’ में अंग्रेंजी फिल्म जेम्सबांड की एक धुन इस्तेमाल कर रहे थे। यही काम बर्मन किसी दूसरी फिल्म में कर रहे थे। जब उन्हें पता चला कि हम लोगों ने इस धुन पर 5-6 रीले तैयार कर ली है तो उन्होंने यह धुन ही छोड़ देने का फैसला किया। उनकी फिल्मों के गीत हंसता हुआ नुरानी चेहरा, वो याद आए बहुत याद आए, दोस्ती के गीत, शोर का गीत एक प्यार का नगमा है बहुत लोकप्रिय हुए। एक समय था जबकि रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी द्वारा बिनाका गीत माला प्रस्तुत की जाती थी। इसे तब भारतीय गानों की लोकप्रियता का मानक टीआरपी माना जाता था। इसमें बजाए जाने वाले 50 फीसदी गानें उन दोनों की फिल्मों के होते थे। वे 11 साल तक टॉप पर बने रहे। 

अपने समय की जानी मानी फिल्म बॉबी के लिए उन्हें बेस्ट साउंड ट्रैक अवार्ड मिला। उनका कहना था कि अब वक्त बदल चुका है व फिल्म में 10 फीसदी गाने तो हीरो की इच्छा से लिखे जाते हैं जैसे कि अमिताभ बच्चन के दबाव में उन लोगों ने जुम्मा चुम्मा ले लो गीत लिखा। जब उन्हें पहली बार 6,000 रुपए का भुगतान हुआ तो उन्होंने 1200 रुपए की एक सोने की अंगूठी खरीदी व अपने पिता को भेंट की जिसकी उन्हें हमेशा चाहत रही थी। 

वे कहते हैं कि लक्ष्मीकांत के जाने के बाद मैंने कुछ नहीं किया। हमने वो जिंदगी जी थी जैसे  कि जब आप किसी रेस्तारां में जाते है तो किसी सामान के दाम और प्लेट में आने वाली उसकी मात्रा हीं पूछते। हमने गानों के साथ ऐसा ही किया। अब 78 साल की आयु में वे एकाकी जीवन बिता रहे हैं। शायद प्यारेलाल नाम ही ऐसा है जो हमेशा सुर्खियों में रहेगा।

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