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आज की पत्रकारिता और नैतिकता व समझ

पिछले दिनों अखबारों में छपी दो खबरों ने मुझे थोड़ा विचलित किया। एक खबर किसी युवती की उसके नाराज पूर्व आशिक द्वारा हत्या किए जाने के बारे में थी जबकि दूसरी खबर में दिल्ली के क्लबों में देर रात चलने वाली ऐसी पार्टियो पर रोक लगाए जाने की आलोचना थी जिनमें लड़कियां मुफ्त में प्रवेश कर बिना कुछ खर्च किए शराब के चंद पैग पीने का आनंद उठा सकती हैं। 

पहली खबर को जिस तरह से पेश करके सनसनी पैदा करने की कोशिश की गई उसने पत्रकारिता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। दिल्ली की एक युवती जो कि महज 12वीं पास थी व पत्राचार पाठ्यक्रम के जरिए बीए कर रही थी। उसकी बहुत बुरी तरह से चाकू मारकार हत्या कर दी गई। तमाम अखबारों में यह खबर कुछ इस तरह से छापी गई कि एक एयर होस्टेस की निर्भय हत्या। वह लड़की एक निजी संस्थान से एयर होस्टेस बनने की शिक्षा ले रही थी। अभी बनी नहीं थी और न ही किसी परीक्षा या इंटरव्यू में शामिल हुई थी मगर उसके नाम के साथ एयर होस्टेस जोड़कर खबर को ग्लैमराइज करने की पूरी कोशिश की गई। 

अखबारों को लगता है कि अगर किसी घटना या दुर्घटना के साथ ग्लैमर जुड़ जाता है तो पाठक उसमें ज्यादा रूचि लेने लगते हैं। कभी किसी युवती को अभिनेत्री बताया जाता है तो कभी किसी को मॉडल। अगर किसी के नाम के साथ यह जोड़ा जाए कि वह मेधावी छात्र या छात्रा थी अथवा किसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में पास हुआ था तो भी यह विशेषण जोड़ने की बात समझ में आती है मगर एक निजी संस्थान में एयर होस्टेस बनने का प्रशिक्षण करने वाली युवती को एयर होस्टेस घोषित कर देना वैसा ही है जैसे कि किसी सुरक्षा एजेंसी के गार्ड को पुलिस अधिकारी बताना। 

वह खबर बेहद दुखदायी थी मगर जो चीजें निकल कर सामने आ रही है उससे लगता है कि एक तरफ तो वह एयर होस्टेस सरीखी जिम्मेदारी संभालने की तैयारी करने जा रही थी जहां यह तक सिखाया जाता है कि संकट की स्थिति में जैसे विमान में गड़बड़ी पैदा होने या उसका अहसास होने पर उसे क्या करना चाहिए वहीं उसने अपने निजी जीवन में जो कुछ किया वह उसके चयन की क्षमता पर भी निशान लगा देता है। जिस अपराधी ने उसे चाकू मारे, उसका उस युवती के साथ तीन साल से प्रेम संबंध चल रहा था। वह अपराधी मोटर साईकिल चुराने का काम करता था व उस पर उसे बैठा कर सैर करवाता था। इस सबंध में चार बार गिरफ्तार भी हुआ। 

जब वह पहली बार 2016 में मधु बिहार में पुलिस द्वारा पकड़ा गया तो उस युवती ने अपने एक मित्र से कह कर उसकी जमानत करवाई थी। वह कभी-कभार टैक्सी भी चलाता था। उसने उस लड़की को एक महंगा फोन भेंट किया था जोकि बाद में संबंध खराब होने पर उस लड़के ने वापस मांगा जिसे लड़की ने लौटाने से मना कर दिया। लड़की कि किसी और से दोस्ती हो गई जो कि उस लड़के को पसंद नहीं आई और गुस्से में, बदला लेने के लिए  उसने उसकी हत्या कर दी। 

मेरा मानना है कि यह सिर्फ खबर नहीं है बल्कि इससे बहुत बड़ी शिक्षा व प्रेरणा मिलती है। हमें अपने पाठको को बताना चाहिए कि जब आप जीवन में गलत लोगों का चयन करते हैं तो उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। अगर कोई किसी अपराधी से दोस्ती करता है तो उसे यह भी पता होना चाहिए कि उसका अंजाम क्या होगा। एक कहावत है अगर आप अपने पिछवाड़े में सांप पालेंगे तो वह आपको डसेगा ही। 

मैं यह मानने को तैयार नही हूं कि जो लड़की उस लड़के की जमानत करवाती हो उसे उसके अतीत और वर्तमान के बारे में न पता हो। वह तो ठीक वैसा आचरण कर रही थी जैसे कि सेलफोन का इयरफोन कान में लगाकर कोई गाना सुनते हुए रेलवे लाइन पार करे। ऐसे में उसके दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है। हम शिक्षा देने की जगह खबर को ग्लैमराइज कर रहे हैं। एयर होस्टेस का पाठ्यक्रम करने वाली युवती को एयर होस्टेस बता देते हैं। यह पढ़ कर मुझे कानपुर के उन दिनों की याद आ जाती है जबकि गांवों से शहर आकर पढ़ने वाले छात्र भी कुछ ऐसा ही करते थे। ग्रेजुएट होते ही उनकी शादी की बात भी शुरू हो जाती थी। तब उनके मां-बाप लड़की वालो को बताते थे कि वे ‘आरएएस’ या वे ‘एलएलबी’ कर रहे हैं। इन्हें करने मात्र से ही शादी के बाजार में उनका भाव बढ़ जाता था।

दूसरी खबर तो और भी चौकाने वाली है। इसे पढ़ कर लगता है कि आज देश के सर्वाधिक बिकने का दम भरने वाले अखबार भी समाज को किस और ले जा रहे हैं। पहले जरा खबर पर ध्यान दे। हैडिंग है कि लेडीज नाइट से क्यों डरती है पुलिस? खबर में पहले यह बताया गया है कि लेडीज नाइट क्या होती है? इसमें बताया गया है कि लेडीज नाइट का कंसेप्ट पिछले कुछ सालों में काफी हिट हुआ है। पहले बुधवार या गुरूवार को ही लेडीज नाइट होती थी। अच्छे रिस्पोंस के बाद अब रोज कहीं-न-कहीं लेडीज नाइट होती है। लेडीज नाइट में लड़की की एंट्री फ्री होती है। उन्हें 2-3 ड्रिंक्स (शराब के पैग) काम्प्लीमेंटरी मिलते है। लेडीज नाइट सिर्फ रेस्टोरेंट, पब बार को प्रमोट करने के लिए होती है। एंट्री फ्री होने से बड़ी संख्या में लड़कियां वहां पहुंचती है। इससे वीक डेज में वहां अच्छा बिजनेस होता है वहीं क्राउड भी काफी होता है। उस दिन लड़की को एंट्री कवर चार्ज या एक फिक्स एमाउंट देने होते हैं। यह 1000 से 2000 रुपए के बीच होती है। क्राउड को अट्रेक्ट करने के लिए लेडीज नाइट होती है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि मुंबई, बेंगलूर-पुणे और चंडीगढ़ समेत कई शहरों में लेडीज नाइट काफी हिट है। 

फिर खबर में पूछा गया कि दिल्ली पुलिस इन पर प्रतिबंध कैसे लगा सकती है? पुलिस को लेडीज नाइट से डर क्यों लग रहा है। रेस्टारेंट ओनर्स कह रहे हैं कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए ऐसा कर रही है। पुलिस नाइट लाइफ को बरकरार रखने के लिए सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं कर सकती है? दरअसल 5 जुलाई को देर रात हौज खास विलेज में एक लड़की को कुछ लड़कों ने किडनैप करने की कोशिश की थी। एक और लड़की उसको बचाने आई और उनकी बहादुरी से वारदात टल गई। खबर में कहा गया है कि इसके बाद दिल्ली पुलिस के सुरक्षा के कड़े इंतजाम हाने के दावों पर सवाल उठे। 

कुल मिलाकर खबर का लब्बोलुआब यह है कि देर रात ऐसे कार्यक्रमों में लड़कियों का अकेले जाकर वहां मुफ्त की शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। यह तो पुलिस की नाकमी है कि वह नशे में धुत इन लड़कियों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर पा रही है। मैं दाकियानूसी व्यक्ति नहीं हूं। लंबे अरसे तक शराब का सेवन करता रहा हूं। अब इच्छा न करने के कारण नहीं पीता हूं। मगर मुझे पता है कि पीने के बाद इंसान की मानसिकता व उसके कार्यकलाप में किस तरह का परिवर्तन आता है। 

जिस दिल्ली में आए दिन निर्भया कांड होते रहते हो वहां आजादी के नाम पर किसी लड़की का मुफ्त में शराब गटकने के लिए ऐसे रेस्टोरेंट में जाना कहा तक उचित है? उसे पता होता है कि वह तो नौजवानों को फंसाने के लिए कांटों में जाने वाले केंचुए की तरह इस्तेमाल की जा रही है। खुद खबर में कहा गया है कि इन लड़कियों के कारण ही वहां लड़के आते हैं।  पब या बार कोई मंदिर या देवालय नहीं है जहां सत्यनारण की कथा और रामचरित मानस का पाठ होता हो। ऐसे में वहां जाने वाले लोगों खासतौर पर लड़कियों को यह पता होता है कि उनके साथ शराब पीने वाले कैसा बर्ताव कर सकते हैं। 

मेरा मानना है कि कोई भी सभ्य परिवार अपनी बेटी तो क्या अपने बेटे तक को देर रात ऐसी जगह जाने की इजाजत नहीं देगा। आप तो देर रात तक लोगों को शराब पिलाएं और घर लौटते समय किसी के साथ बेहूदगी होने पर उसके लिए पुलिस की नाकामी को जिम्मेदार ठहराए, यह कहां तक उचित है? जिस दिल्ली में सड़क चलती महिला के मंगलसूत्र तक लुटेरे खींच कर ले जाते हो। वहां मुफ्त में शराब देकर लड़को को फंसाने के लिए लड़कियों को आमंत्रित करना ठीक वैसा ही है जैसे सुनार का अपनी दुकान को ताला लगाए बिना यह सोचकर घर चले जाना कि उसकी रक्षा करना तो पुलिस की जिम्मेदारी है। तभी क्या लगता नहीं कि आज की पत्रकारिता में खबर लिखने के साथ सोच कैसी है तो नैतिकता के मानक क्या बन रहे है?  

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