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इतनी बेरोजगारी कि पनगढिया भी डरे!

अर्थशास्त्र में एमए करने के बावजूद मुझे कभी आंकड़ेबाजी पसंद नहीं आई। आमतौर पर मैं लेखन करते समय आंकड़े देने से बचता आया हूं क्योंकि मेरा मानना है कि ये बेहद नीरस होते हैं व आम पाठक की समझ और रूचि से परे होते हैं। जब जनसत्ता में था और किसी का नाम छपवाना होता तो उसके नाम के आगे-पीछे कुछ आंकड़े जोड़ देता था क्योंकि डेस्क वालों के लिए आंकड़ों की काटपीट में बहुत मुश्किल होती थी। इससे अर्थ का अनर्थ हो जाता था।

पर इस कॉलम में कुछ आंकड़ों का मजबूरन इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि उनके बिना वस्तुस्थिति को समझना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि टमाटर महंगे होने की बात समझाने के लिए यह आंकड़ा इस्तेमाल करना कि महज छह माह पहले दो रुपए किलो बिकने के लिए मजबूर टमाटर अब 100 रुपए तक पहुंच गया है। मैं आर्थिक खबरें भी आमतौर पर नहीं पढ़ता हूं।

मुझे तो नौकरी करते हुए भी यह पता नहीं था कि मेरी ग्रेड में या मूल वेतन क्या था? मैं तो सिर्फ चैक पर नजर डाल कर उसे सीधे जमा करवा देता था। मगर जब नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष अरविंद पनगढिया ने अपना इस्तीफा देने का ऐलान किया तो मैंने इसकी वजह जानने के लिए सरकारी निगाह से उस खबर पर नजर डाली और मेरी आंखों ने जो कुछ पढ़ा उसे पढ़कर मैं हैरान रह गया। बात इतनी अहम थी कि उसने मेरे तमाम सवालों का जवाब दे दिया। यह सवाल क्या था जोकि मुझे परेशान कर रहे थे पहले इसे जान लेना चाहिए।

मोदी सरकार ने अच्छे दिन आने का वादा और दावा किया था। मगर सत्ता में आने के बाद सिर्फ शेयर समाचार को छोड़ कर हर जगह मायूसी और गिरावट नजर आई। मेरा मानना है कि कभी भी शेयर बाजार को सरकार की अर्थिक प्रगति का सूचक नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि सनसैक्स व निफ्टी चंद शेयरों में आए उतार-चढ़ाव के अनुसार ही ऊपर चढ़ते, नीचे गिरते हैं? शेयर बाजार में ऐसा ही उछाल हर्षद मेहता के समय में आया था। उस समय भी अपोलो टायर के मालिक ने कहा था कि मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि मेरी कंपनी का उत्पादन गिर रहा है। मुनाफा कम हो रहा है और उसका शेयर ऊपर जा रहा है।

पिछले साल एक नेता मित्र ने बताया कि गुड़गांव के एक मॉल में उन्हें अपने शौ रूम का किराया ढाई लाख रुपए मिल रहा था। पिछले माह किराएदार ने किराया आधा कर दिया क्योंकि उसकी बिक्री में काफी गिरावट आई थी। उनका कहना था कि जो हालात है उन्हें देखते हुए तो वे इस शोरूम का इतना किराया भी लेने को तैयार हो जाएंगे जिससे कि उसकी मेंटीनेंस का खर्च व हाऊस टैक्स भी निकलता जाए।

फिर एक परिचित ने जो कि सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था, बताया कि उसके ज्यादातर लोग बिल्डरों के यहां उनकी साइट पर काम करते हैं। बिल्डरों का काम ठप्प हो जाने के कारण अब वे पैसा देने से कतरा रहे हैँ। जब भी मैं उन्हें बिल सौंपता हूं तो वे उसकी कहीं ज्यादा राशि का सामान चोरी हो जाने का आरोप लगाते हुए उल्टे मुझसे पैसा मांगने लगते हैं।

भवन निर्माण की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं है। आए दिन बिल्डरो का घेराव किए जाने की खबरें अखबारों में छपी रहती है। कुछ समय पहले पता चला कि बेटे का दोस्त जिस कंपनी में काम करता था वह बंद हो गई। वहां उसे 90,000 रुपए मासिक वेतन मिलता था उसे नई नौकरी में 20 हजार रुपए का वेतन दिया जा रहा है। जरा सोचे कि जिस युवक को किराया देना हो घर चलाना हो अगर उसके वेतन में दो-तिहाई की कटौती कर दी जाए तो क्या होगा। चंद दिन पहले देश के एक चर्चित व काफी पुराने चैनल ने अपने 62 कैमरामैनों की एक साथ छुट्टी कर दी क्योंकि उनका कहना था कि वे उन्हें वेतन देने की हालत में नहीं है। अब संवाददाताओं को ही, कैमरे वालो को ही सेलफोन थमा दिए गए है।

लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनाव सभा में हर साल एक करोड़ रोजगार उपलब्ध करवाने का वादा किया था। सरकार के अपने आंकड़े बताते है कि पहले तीन सालों में बेरोजगारी की दर में काफी तेजी आ रही है व पिछले सालों की तुलना में 39 फीसदी रोजगार कम उपलब्ध हुए हैं। आईटी क्षेत्र की जानी-मानी कंपनियां इंफोसिस, विप्रो, काग्रीजेंट ने हाल के कुछ महीनो में अपने 56,000 इंजीनियरों की छुट्टी कर दी है व मैंकेंजी एंड कंपनी ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में उजागर किया है कि अगले तीन वर्षों में आधे आईटी इंजीनियर घर बैठ जाने को मजबूर होंगे। सरकार के आंकड़े बताते है संगठित व असंगठित दोनों ही क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ी है।

इस देश में महज 10 फीसदी लोग ही संगठित क्षेत्रों मैन्यूफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ट्रेड, ट्रांसपोर्ट, एनीमिशन, रेस्टोरेंट, बीपीओ सरीखे क्षेत्रों में काम करते हैं। करीब 49 फीसदी लोग कृषि में लगे है बाकी 90 फीसदी लोग जिन क्षेत्रों में काम कर रहे हैँ उन्हें मुख्य कृमिक, सीमांत क्रमिक व बेरोजगार श्रमिक की श्रेणी में रखा जाता है। मुख्य श्रमिक वे लोग कहे जाते हैं जिन्हें साल में कम-से-कम छह माह मजदूरी मिल जाती है। इससे कम वाले सीमांत की श्रेणी में आते हैं व बाकी बेरोजगार की श्रेणी में रखे जाते हैं। असंगठित क्षेत्र में आने वाले लोगों को तो न्यूनतमक मजदूरी भी नहीं मिल पाती है। हाल ही में श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने 2020 तक पांच करोड़ नौकरियां उपलब्ध करवाने की बात कही। जिसका सीधा अर्थ यह है कि हर साल सवा करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाया जाएगा।

सरकार आंकड़ों के जरिए कैसे झूठे दावे तक लफ्फाजी करती है इसका एक छोटा-सा उदाहरण प्रधानमंत्री द्वारा जोर-शोर से शुरू की गई मुद्रा योजना है जिसके तहत छोटे-मोटे काम करने के लिए लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने का दावा किया जा रहा है। इस योजना के लिए 1.14 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान करके सरकार ने दावा किया कि इसके जरिए 3.20 करोड लोगों को रोजगार मिलेगा। इसके तहत 50000 रुपए से लेकर 10 लाख रुपए का कर्ज देने की बात की गई। पता चला कि 60 फीसदी लोगों ने 50,000 या उससे कम कर्ज लिया। गुजरात के लोगों ने सबसे ज्यादा 55,000 का कर्ज लिया पर राशि कार खरीदने, नाई की दुकान, ब्यूटी पार्लर, जिम, बुटीक, दर्जी की दुकान के रखरखाव पर खर्च की गई। मतलब जो लोग पहले से अपना काम धंधा चलाते थे उन्होंने ही यह पैसा लिया। मगर सामने आंकड़े में करोड़ों को नौकरी मिल गई। ऐसे ही बड़े जोर-शोर से शुरू की गई स्टार्टअप कंपनियों का क्या हुआ किसी से छिपा नहीं।

हां मैं असली बात तो बताना भूल ही गया कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अध्यापक अरिवंद पनगढिया जोकि 64 साल के हो चुके हैं वे अपने भविष्य को लेकर कितना चिंतित थे इसका अंदेशा उनकी इस बात से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि अगर मैं 40 साल का होता तो मैं कहीं और नौकरी ढूढ़ सकता था। मगर अब इस उम्र में अगर पुरानी नौकरी पर वापस नहीं लौटा तो मेरा क्या होगा। जरा ध्यान दीजिए कि यह बात कैबिनेट मंत्री के बराबर के पद वाला व्यक्ति कह रहा है जिसका वेतन व भत्ते कैबिनेट सचिव के बराबर है और जो सीधे प्रधानमंत्री के अधीन है। तो जरा कल्पना करिए कि जब वह नौकरी को लेकर इतना चिंतित है तो देश का आम आदमी व आम बेरोजगार का क्या हाल होगा।

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