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सत्ता की लालच में बदलती आस्था

महात्मा गांधी को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है। वे इस्लाम के काफी बड़े प्रशंसक थे। मगर जब उनके अपने बेटे ने इस्लाम कबूल कर लिया तो न केवल उन्होंने अपने बेटे को त्याग दिया बल्कि उसके साथ ही यह फरमान भी जारी कर दिया कि धर्म परिवर्तन में कोई बुराई नहीं है मगर किसी लालच के दबाव में आकर धर्म परिवर्तन नहीं करना चाहिए। हालांकि इससे पहले उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की सगी बहन विजय लक्ष्मी पंडित के एक मुस्लिम युवक के साथ चल रहे प्रेम प्रसंग में ऐसी टांग अड़ाई कि वो जिदंगी भर के लिए कुंआरी ही रह गई। 

तब तो लव जेहाद सरीखे शब्द भी ईजाद नहीं हुए थे मगर गांधी तो गांधी थे उन्हें पता था कि कब कहां चोट करके धार्मिक भावनाएं भड़कानी चाहिए। यह किस्सा मैं पहले बता चुका हूं। अब इसका जिक्र करने की जरूरत इसलिए आ पड़ी कि मैं भले ही गांधीजी की तमाम हरकतों व हथकड़ों से सहमत न हूं पर उनकी इस बात को आज भी मानता हूं कि दबाव या लालच में धर्म परिवर्तन करने की तुलना में कहीं ज्यादा घातक विचार परिवर्तन करना है। 

पिछले कुछ समय से लालच में आकर जो सैद्धांतिक व वैचारिक रंग बदलने के, बदलाव देखने में आए है उसे देख सुनकर तो यही लगता है कि हिंदू धर्म की तारीफ करने वाले गैर-मुस्लिम नेताओं की तुलना में तो कहीं ज्यादा बेहतर आजम खान और ओवैसी है जो खुले आम हिंदुओं व हिंदू धर्म के खिलाफ जहर उगलने के बावजूद कम से कम सत्ता या पद हासिल करने के लिए अपनी विचारधारा से समझौता तो नहीं करते।

कुछ दिन पहले बिहार में मंत्री पद की शपथ ग्रहण करते ही जद(यू) के मुस्लिम नेता खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद ने जय श्रीराम के नारे लगाए। प्रेस वालों को अपने हाथ में बंधा कलावा गर्व से दिखाते हुए कहा कि गांधी भी राम-रहीम की बात किया करते थे। इस पर एक स्थानीय मौलवी ने उनके खिलाफ फतवा जारी करते हुए उनकी बीवी तक को उनसे तलाक लेने का आदेश दे डाला। बस फिर क्या था उनका घबड़ाना स्वाभाविक था। मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने उन्हें बुलाकर समझाया होगा कि क्यों मेरे मुस्लिम वोटों को तोड़ने पर आमदा हो। लालू यादव क्या कम थे जो कि तुम भी इसी काम में जुट गए। 

इसके बाद मंत्री ने अपने बयान पर खेद जताते हुए कहा कि नीतीश जी के कहने पर मैं खेद जता रहा हूं कि अगर किसी को मेरे बयान से ठेस पहुंची है तो मैं माफी चाहता हूं। उनसे कुछ दिन पहले ही सपा छोड़कर भाजपा में आए उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे बुक्कल नवाब ने भी ऐसा ही कुछ कर दिखाया था। उनका दावा है कि वे अवध के नवाब के खानदान से हैं। वे पहली बार राजनीति व चर्चा में  तब आए थे जब उन्होंने लखनऊ के दौलतगंज वार्ड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नगर निगम का चुनाव लड़ के सर्वाधिक वोट हासिल किए थे। इसके बाद सपा ने उन्हें लपक लिया। मुलायम सिंह यादव ने उन्हें दो बार विधानसभा का उम्मीदवार बनाया व दोनों ही बार वे हारे। फिर उन्हें अल्पसंख्यक व श्रम मंत्रालय में राज्यमंत्री बना दिया। 

जब चुनाव हारने के बाद मायावती ने 2012 में राज्यसभा में जाने का फैसला किया तो उनकी विधान परिषद की सीट खाली हो गई। जिस पर मुलायम सिंह यादव ने बुक्कल नवाब को विधान परिषद का सदस्य बना दिया। उन्हें 2016 में पुनः विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। मगर तब तक नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आ चुके थे। लालू ने तो कभी यह कहा था कि रामविलास पासवान तो राजनीति का मौसमी मुर्गा (वैदर कॉक) है जो कि हवा को पहचानते हुए अपनी दिशा तय करता है। मगर उन्हें शायद नहीं पता था कि वैदर कॉक सिर्फ बिहार या लोजपा तक ही सीमित नहीं है वे तो हर राज्य व हर दल मे होते है और मौसम बदलते ही फड़फड़ाग व बांग देना शुरू कर देते हैं। 

भाजपा में आने के पहले ही नवाब ने माहौल बनाना शुरू कर दिया था। उन्होंने नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद सपा में रहते हुए यह बयान दे डाला था कि अयोध्या में मंदिर का निर्माण होना चाहिए। वे भगवान श्रीराम का सम्मान करते हैं। अगर उनका मंदिर बनता है तो वे उनका मुकुट तैयार करने के लिए 10 लाख रुपए दान के देंगे। शायद यह भाजपा को इशारा था कि ऐसी बयानबाजी व आस्था परिवर्तन के बदले मे तुम मुझे कौन सा मुकुट पहनाओगे?  

चंद दिन पहले ही उन्होंने विधान परिषद की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। तय है कि उन्हें जो मुकुट पहनाया जाएगा उसकी कीमत राम के मुकुट के लिए दी जाने वाली राशि की तुलना में कहीं ज्यादा होगी। भाजपा तो वैसे भी राम की ही पार्टी है। वैसे नवाब बुक्कल ने अपने नाम के अनुरूप काम कर दिखाया है। पंजाबी भाषा में बुक्कल का मतलब दो बाहों में लपेट लेना होता है। बुक्कल शब्द को लेकर चर्चित गीत जैसे ‘मेरी बुक्कल दे विच चोर या नी तू मेरी बुकल विच होवे, ते वेल्या रात द हावे सरीखे चर्चित गीत भी बने हैं। अब पता नही है कि भाजपा ने उनके गलबहियां डाली है अथवा नवाब ने उन्हें अपनी बाडों में ले लिया है। 

पहले कहावत थी कि नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है मगर अब कहा जा सकता है कि भाजपाई मुल्ला ज्यादा राम राम जपता है। इससे पहले भी एक खस्सी मुर्गे, कांग्रेंस के पूर्व नेता जाफर शरीफ ने राष्ट्रपति चुनाव के पहले भाजपा को सलाह दी थी कि उसे संघ प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बना देना चाहिए क्योंकि वे सबसे बड़े राष्ट्र इंसान है। शायद अगले साल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनकी आस्था में भी बदलाव आया होगा। मगर सिर्फ इन लोगों की ही आलोचना क्यों की जाए?

चंद दिन पहले भाजपा की बैस्साखियों पर सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में जो कुछ कहा उसे देखकर तो यह संदेह पैदा होता है कि वे क्या उस प्रदेश के राजा है जहां कभी चाणक्य सरीखे विद्वान हुआ करते थे। उन्होंने कहा कि भाजपा व नरेंद्र मोदी को 2019 में कोई चुनौती देना वाला नहीं होगा। मुझे इन लोगों की बुद्धि पर तरस आता है। अरे जब खुर्शीद मंत्री बन गए या नीतीश मुख्यमंत्री बन गए तो सार्वजनिक रूप से इस तरह के बयान देकर अपनी भद उड़वाने की क्या जरूरत थी? मजे से कुर्सी भोगते रहते। पता नहीं कल को राजनीति की दिशा व दशा क्या हो? 

मेरा मानना है कि ये सभी बयान सत्ता का लालच और मूर्खतापूर्व सोच को दर्शाते हैं। ऐसे में अल्लामा इकबाल याद आते हैं जिन्हें पाकिस्तान अपना राष्ट्रपिता मानता है। देश के विभाजन के काफी पहले ही 1938 में उनका निधन हो गया था। तब इस देश में सांप्रदायिक राजनीति का जन्म नहीं हुआ था। उन्होंने तब लिखा था कि राम इमाम-ए-हिंद को अवतार है हे राम के वजूद पर हिंदुओं को नाज, अहले नजर समझते हैं उनको इमाम-ए-हिंद। राम के बारे में उन्होंने कहा था कि तलवार का धनी याशुजात में फर्द था, पाकीजगी में जोश-ए-मुहब्बत में फर्द था।

इतिहासकार बताते है कि महात्मा गांधी ने दशको बाद जिस राम राज्य की कल्पना की वह तो अल्लामा इकबाल की मौलिक सोच का नतीजा थी। आज किसी भी मौसमी मुर्गे में इतनी ताकत है कि वह इकबाल की तरह राम को इमाम-ए-हिंद तो क्या हिंद केसरी भी कहने की हिम्मत जुटा सके। 

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