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पान की अजीब महिमा

सिंधियों का भी जवाब नहीं। उन्होंने जिस क्षेत्र में भी हाथ लगाया अपना अलग स्थान बनाया। भारत में ज्यादातर सिंधी बंटवारे के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए थे और वे यहां के विभिन्न हिस्सों में बस गए और नौकरी की जगह ज्यादातर काम धंधे करने लगे। कानपुर का गोविंदनगर इलाका उन शरणार्थी बनकर आए सिंधियों का गढ़ हुआ करता था। वे ज्यादातर साबुन, नमकीन व बेकरी का काम करते थे। देखते ही देखते वे शहर के बड़े व्यापारियों व उद्योगपतियों में गिने जाने लगे। 

राजनीति में लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर वकालत में राम जेठमलानी तक सिंधियों की विशिष्ट हैसियत के परिचायक है। दिल्ली के हीरानंद सिंधी घोड़ी वाला से लेकर आसाराम बापू व हरिभाई लालवानी तक सभी सिंधी है। वह तो इस समय बापू का बुरा समय चल रहा है वरना उन्होंने बाबा होते हुए जो मजे लिए उनकी कल्पना तो कामदेव भी नहीं कर सकते थे।

जाने माने प्रिंस गुटका के मालिक हरिभाई लालवानी का पिछले हफ्ते निधन हो गया। उनसे मेरी मुलाकात सिंधी संवाद के संपादक श्रीकांत भाटिया ने करवाई थी जिनकी कि हर सिंधी वीआईपी के साथ जबरदस्त पहचान है। मैंने हरिभाई लालवानी के बारे में अपने इस कालम में कुछ साल पहले तब लिखा था जबकि उन्होंने अखिल भारतीय पान विक्रेता संघ का गठन किया था। वे उस समय उसके अध्यक्ष थे। 

एक समय था जबकि पान बेचने वाले को बहुत छोटा आदमी माना जाता था। साठ के दशक में मेरे शहर कानपुर में अक्सर जवाबी कव्वालियां आयोजित की जाती थी। ऐसे ही एक बार दो गायकों का मुकाबला चल रहा था। पुरुष प्रतिद्वंदी गायक ने अपनी महिला प्रतिद्वंदी को कव्वाली गाते गाते अपने साथ चलने का निमंत्रण दे दिया। उसने जलभुन कर जवाब दिया कि तू तो मेरे पान बीड़े का खर्च भी नहीं उठा पाएगा, जवाब में पुरुष ने कहा कि तू उसकी चिंता मत कर क्योंकि मेरी पान की ही दुकान है। वैसे उत्तरप्रदेश में ज्यादातर पान की दुकानें चौरसिया लोगों की ही है। सागर में वकील चौरसिया ने भी इस क्षेत्र में अपना अलग स्थान बनाया है। 

हरिभाई लालवानी के पिता टीकमचंद ने 1950 में कनाट प्लेस में प्रिंस पान सेंटर नाम से पान की दुकान खोली। बाद में उनके पान का धंधा उनके बेटे हरिभाई ने संभाला। उन्होंने प्रिंस गुटका तैयार किया। यह गुटका युग की शुरुआत थी। गुटका भले ही आम आदमी की सेहत के लिए कितना भी घातक क्यों न साबित हुआ हो मगर वह अपने निर्माताओं व एक्साइज विभाग वालों के लिए बहुत लाभकारी साबित हुआ। 

गुटका से होने वाली कमाई का अंदाजा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि पश्चिमी भारत में माणिक चंद नामक गुटका बनाने वाले उद्योगपति ने अपनी बेटी की शादी में दुनिया की सबसे महंगी कार दहेज में दी थी। तब यह भी अफवाह उड़ी थी कि दाउद इब्राहीम ने भारत के कुछ गुटका निर्माताओं से पाकिस्तान में गुटका तैयार करने के लिए उसके फार्मूले और मशीनों की मांग की थी। हरिभाई का धंधा काफी फला फूला। उन्होंने एक नई शुरुआत करते हुए दिल्ली व देश को पहली महिलाओं द्वारा संचालित पान की दुकान कनाट प्लेस के आउटर सर्किल स्थित एनडीएमएसी मार्केट में खोली व उसका नाम यामू पंचायत रखा। 

वहां महिलाएं पान लगाकर बेचती थी व सबसे सस्ते पान की कीमत भी कुछ सौ रुपए हुआ करती थीं। उन्होंने इसकी देशव्यापी श्रृंखला तैयार करने का फैसला किया और गुजरात से इसकी शुरुआत की। उनका लक्ष्य देश में ऐसी 100 शाखाएं खोलने का था जहां 500 महिलाओं को रोजगार मिलता व उससे होने वाली बिक्री से 20,000 रु. रोज की आमदनी होती। उन्होंने हुक्का, सिगार, मीठी सुपारी, चुस्की व लैमनोड भी बेचना शुरु कर दिया। दिल्ली व देश भर में उन्होंने यामू पंचायत ब्रांड नाम स्थापित किया। 

उन्होंने एक नई पहल करते हुए देश में पान विक्रेताओं का पहला संगठन अखिल भारतीय पान विक्रेता संघ स्थापित किया। उसका मुखपत्र भी प्रकाशित करना शुरु कर दिया। उन्होंने मुझे बताया था कि वे इसे राजनीतिक दल में तब्दील करना चाहते हैं। उनका दावा था कि अगर पान विक्रेताओं की पार्टी ने चुनाव लड़ा तो वह सारे राजनीतिक समीकरण बिगाड़ कर रख देगी क्योंकि इस देश में सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस पान की दुकानों पर ही होती है और पान विक्रकेता अपने ग्राहकों के जरिए माहौल बदल सकता है। कुछ समय पहले जब केंद्र सरकार ने पान की दुकानों पर टॉफी, बोतल पेय, चिप्स आदि की बिक्री पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया तो अखिल भारतीय पान विक्रेता संघ ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात करके उनके इस आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि सिर्फ पान की बिक्री से इतनी आमदनी नहीं होती कि दुकानदार का गुजारा चल सके। 

हमारे देश में पान का अपना अलग महत्व रहा है। यह तो भगवान को चढ़ाया जाता है। सुपारी, नारियल,  तुलसी, दूब व आम के पत्तों की तरह इसे देवताओं का पसंदीदा माना जाता है। हनुमानजी को तो यह विशेष तौर पर पसंद है। किवंदती है कि जब हनुमानजी अशोक वाटिका में सीताजी से मिलने पहुंचे तो वे उनसे मिलकर इतनी खुश हुई कि उन्होंने उन्हें पान की माला भेंट की थी। भारत ही नहीं पूरे एशिया में पान का अनादिकाल से इस्तेमाल होता आया है। बनारस व कलकत्ता का पान तो खासतौर पर चर्चित रहा है। विभाजन के बाद से भारत ही पाकिस्तान को पान का निर्यात करता आया है। 

लाहौर के चर्चित अनारकली बाजार में तो एक मशहूर पान गली है जहां पान के अलावा भारत से आने वाले तमाम सामान जैसे कपड़े, नकली गहने, मालाएं आदि मिलती है। हड़प्पा काल से लेकर सुब्रुत व धनवंतरी तक ने पान के गुणों का बखान किया है। पान पर तो कई चर्चित गाने, जैसे पान खाए सैया हमारे व लाइके पान बनारस वाला भी बने। इस पर कहावतें बनी कि मूंछ क्यों मुड़ी, घोड़ा क्यों अड़ा व पान क्यों सड़ा ? इसका उत्तर है कि चूंकि फेरा न था। मतलब मूंछ का हाथ से फेरते हुए मोड़ना चाहिए। घोड़े को ठहलाते हुए फेरा लगाना चाहिए ताकि वह चलना न भूले व पान को पलटते रहना चाहिए ताकि व न सड़े। 

मिथिला में तो अगर मेहमान की खातिर न की जाए तो वह कहेगा कि बड़े नीच लोग थे। पान सुपारी तक को न पूछा। वहां रिश्वत देते समय यह कहा जाता है कि यह आपके पान सुपारी के लिए है। मैं भी कभी कभार पान खा लेता हूं। मगर कभी उसे थूका नहीं। हिंदुस्तान समेत तमाम देशों में पान ही सबसे ज्यादा गंदगी फैला रहा है। लंदन तक इससे अछूता नहीं है। वहां व दुबई में पान के पीक थूकने पर कड़ा जुर्माना किया जाता है। पापुआ न्यूगिनी में तो पान बेचने पर प्रतिबंध है। 

खैर हरिभाई ने पान के जरिए अपना साम्राज्य स्थापित किया व उनकी कंपनी का सालाना करोबार 2 अरब रुपए का था। हाल में उनका निधन हुआ। वे अपनी वसीयत में लिख गए कि उनकी चारों बेटियां ही उनके पार्थिव शरीर को कंधा दे व उनका अंतिम संस्कार करें। उनके मरने पर कोई रोए नहीं क्योंकि जन्म व मृत्यु दोनों ही उत्सव होते हैं। क्योंकि पहले हम ईश्वर के यहां से आते हैं व फिर ईश्वर के यहां जाते हैं। उनकी इन इच्छाएं का पालन करते हुए परिवार ने बैंड बाजा बारात की तरह शव यात्रा निकाली जिसमें शामिल परिवार के लोग नाचते नजर आए। हरिभाई दूरदर्शी थे उन्हें पता था कि दुनिया में यही ऐसा धंधा है जिससे ग्राहक खुद को चुना लगवाने में भी खुश होकर पैसा देता है।

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