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छाती नहीं दिल बड़ा कीजिए

मैं सुबह अखबारों पर सरसरी निगाह डालता हूं और रात को इन्हें इत्मिनान से पढ़ता हूं। जब रात को अखबार खोले तो उनमें नेहरू जी के जन्मदिन पर अखिल भारतीय कांग्रेंस कमेटी द्वारा जारी एक विज्ञापन नजर आया। अगले दिन किसी भी अखबार में कहीं भी यह जिक्र नहीं था कि कहां किसने बाल दिवस मनाया? मुझे याद है जब मैं छोटा था तो बड़े उत्साह से 14 नवंबर को स्कूल में बाल दिवस मनाया जाता था। सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते व अक्सर लड्डू या टाफी खाने को मिल जाती थी। 

हो सकता है इसकी दो वजह रही हो। पहली वजह यह कि तब नेहरूजी को मरे बहुत कम समय बीता था वे 1965 में मरे थे। दूसरा यह कि केंद्र व राज्यों में कांग्रेंस की सरकारें थीं व इंदिरा गांधी जीवित थी। सुबह से ही स्कूलों और रेडियो पर देशभक्ति के गीत बजते थे। अगले दिन के अखबार बाल दिवस के आयोजन संबंधी खबरों और तस्वीरों से भरे होते थे। 

मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। हो सकता है कि पिछली बार भी यही स्थिति रही हो और मैंने उस पर ध्यान न दिया हो। अब वह हैडिंग भी पढ़ने को नहीं मिलती कि कृतज्ञ राष्ट्र ने बापू, शास्त्री या नेहरू को याद किया। जवाहरलाल नेहरू को तो बच्चे चाचा नेहरू कहकर बुलाते थे। मैं न तो कांग्रेंसी हूं और न ही जवाहर लाल नेहरू का प्रशंसक या समर्थक हूं। मैं तो इस कॉलम में उनकी तमाम नीतियों का विरोध और गलतियों की आलोचना करता आया हूं। इसके बावजूद मेरा मानना है कि सरकार बदलने के साथ ही किसी नेता की अनदेखी करना या उसे हाशिए पर लाने की कोशिश करना उचित नहीं हैं। 

सच कहूं तो मैं भी विज्ञापन के जरिए कृतज्ञता जताए जाने पर किसी की याद ताजा किए जाने के खिलाफ हूं। मगर मेरा मानना है कि कम-से-कम इसके जरिए जहां एक और लोगों के मन में उस नेता की याद ताजा हो जाती है, वहीं कम-से-कम छोटे अखबारों को विज्ञापन के जरिए आर्थिक मदद हो जाती है। हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि हमने जहां रंगों से लेकर पकवानों व खाने-पीने के सामान, दिनों तक को धार्मिक आधार पर बांट रखा है वहीं हमारे नेता राजनीतिक आधार पर बंटे हुए हैं। 

अगर महात्मा गांधी का अपवाद छोड़ दें तो शायद ही कोई ऐसा नेता होगा जिसे हर दल अपना मानता हो। शुरू में तो महात्मा गांधी भी सिर्फ कांग्रेंस के नेता थे मगर काफी बाद में भाजपा ने उनके साथ अपने को जोड़ा। हालांकि उनकी तस्वीरे कभी किसी भाजपा कार्यालय या कार्यक्रम में नजर नहीं आई। वे तो ठंडा मतलब कोकाकोला की तरह गांधी मतलब कांग्रेंस बन कर रह गए थे। 

वो तो भला हो नरेंद्र मोदी का जो कांग्रेंस की कुछ विभूतियों को उठा ले गए। जैसे लापरवाह बच्चे खेलते समय अपना कोई खिलौना पार्क में छोड़ आए हैं। उसी तरह उसके गोदाम में पड़े सरदार पटेल व मोरारजी देसाई सरीखे कुछ जंग खा रहे गटरपाचा के खिलौनो को मोदी ने नहला धुला कर स्थापित करने की कोशिश की। गांधी को भी राष्ट्रपिता जन्म उनके गुजरात तक सीमित कर दिया। देश को बताया कि वे व गांधी दोनों एक ही राज्य के थे। यह बताना भूल गए कि जिन्ना भी इसी गुजरात के ही थे।

अपना मानना है कि नेता व विभूतियां किसी एक दल या परिवार की धरोहर नहीं होती है। उन्हें सीमित करना ठीक नहीं है। हालांकि आज नरेंद्र मोदी सरकार ने जिस तरह से नेहरू की अनदेखी की उसकी शुरुआत तो कांग्रेंस ने ही की थी। उन्होंने तो सिर्फ उस परंपरा को बनाए रखने व आगे बढ़ाने का ही काम किया है। सत्ता में रहते हुए कांग्रेंस ने देश की हर बड़ी परियोजना, भवन, सड़क आदि के नाम जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर रखे। मानों कि उन लोगों के अलावा इस देश में ऐसा कोई नेता पैदा ही नहीं हुआ हो जिसने देश के लिए कुछ योगदान दिया हो। 

इतना ही नहीं इस परिवार ने तो अंतिम संस्कार तक की जगह भी अपने लिए ही आबंटित करवा ली थी। राजघाट पर महात्मा गांधी का समाधि स्थाल बनने के बाद वहां जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी व राजीव गांधी के अंतिम संस्कार किए गए। जगजीवनराम के मरने के बाद उनके पार्थिक शरीर को सासाराम ले जाने के लिए बाध्य किया गया। वह तो गनीमत थी चौधरी चरणसिंह जाट थे और उनके समुदाय के लोग अड़ गए थे वरना इस कतार में किसान घाट न बन पाता। जब तक कांग्रेंस ने राज किया किसी ने गांधी, नेहरू परिवार के अलावा किसी और राष्ट्रीय नेता को याद तक नहीं करने दिया। और तो और लाल बहादुर शास्त्री भी महात्मा गांधी के जन्मदिन वाले दिन पैदा होने के कारण गुमनामी में खोए रहें।

कांग्रेंस पर परिवारवाद का आरोप लगाना ठीक नहीं होगा। क्योंकि उसने तो अपने परिवार के लोगों तक को नहीं बख्शा। देश के पहले प्रधानमंत्री के दामाद व जुझारू पत्रकार व नेता होने के बावजूद गांधी परिवार ने कभी भी फिरोज गांधी को याद नहीं किया। उनका जन्मदिन और निर्वाण दिवस मनाना तो दूर रहा किसी को यह भी पता नहीं होगा कि उनका अंतिम संस्कार कहां व कैसे किया गया था। 

इस परिवार के दूसरे बेटे संजय गांधी का क्या हुआ। उनके मरने के बाद मैंने पहली बार यह नारा सुना था कि जब तक सूरज चांद रहेगा, संजय तेरा नाम रहेगा। आज उनका अपना परिवार ही उनका नाम लेना या उन्हें अपना सदस्य मानना पसंद नहीं करता है। उनका बेटा व पत्नी भाजपा में है। कांग्रेंस ने पीवी नरसिंह राव को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक दिया। आज जब एआईसीसी होती है तो वहां मंच पर लगने वाले पूर्व पार्टी अध्यक्षों की तस्वीरों में भी सीताराम केसरी से लेकर पीवी नरसिंह राव तक सभी नदारद होते हैं। जब इनकी यह हालत हो तो वीपी सिंह, चंद्रशेखर, चरणसिंह या इंदर कुमार गुजराल को भुला दिया जाना तो बेहद स्वाभाविक नजर आता है। दिवंगतों और बुजुर्गो के प्रति श्रद्धा प्रकट करना कोई बुरी बात नहीं है। वो तो विरासत की तरह सबके होते हैं। मोदी जी आप अपनी छाती 56 इंच के होने का दावा करते आए हैं। जरा उसके अंदर स्थित दिल को भी थोड़ा बड़ा कर लीजिए।

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