Loading... Please wait...

मोदी सरकार को तो मोतियाबिंद!

विवेक सक्सेना
ALSO READ

पिछले दिनों अचानक ताऊजी के बेटे के निधन की खबर मिलने के कारण कानपुर जाना पड़ा। अतः अपना कालम नहीं लिख पाया। इससे पहले पिछले साल दिसंबर माह में दिल्ली से बनारस तक का रेल सफर किया था और इसी कालम में अपनी रेल यात्रा के दुखद संस्मरणों का जिक्र किया था। तब महज आठ घंटे का सफर 18 घंटों मे पूरा किया था। 

और देखिए पिछले लगभग एक साल में देश ने ऐसी गजब प्रगति की है कि इस दफा जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा तो पता चला कि यहां से कानपुर तक 6 घंटे में पहुंचने वाली गाड़ी देर से चल रही है। हालांकि उस दिन कोहरा भी नहीं था। गाड़ी सुबह 5 बजे रवाना हुई। सारी रात प्लेटफार्म पर खड़े खड़े काटनी पड़ी क्योंकि जो चंद बेंच थे उस पर लोग सोए हुए थे। वहां होने वाली घोषणाओं से पता चला कि हर गाड़ी 6 से नौ घंटे तक देरी से चल रही थी। 

गंदगी का आलम यह था कि आप किसी खंबे का सहारा भी नहीं ले सकते थे क्योंकि वहां हर जगह लोगों ने थूका हुआ था। बदबू के मारे खड़ा होना मुश्किल था। एक नई चीज यह देखने को मिली कि इस देश में आवश्यकता ही आविष्कार की जननी वाली कहावत फिर पूरी तरह से सही साबित हुई दिखी।। इससे पहले जब कुछ साल पहले मैं हरिद्वार गया था तो वहां सायंकालीन गंगा आरती के लिए घाट की धुलाई के बाद गीली जमीन पर बैठने के लिए कुछ लोगों को प्लास्टिक की शीट बेचते देखा था। 

इस बार यह छपी हुई शीट नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बिकती नजर आयी। गाड़ी का इंजार करते हुए थक गए तमाम यात्री, खासतौर पर वे लोग जिनके साथ बच्चे थे प्लेटफार्म पर यह शीट बिछा कर उस पर अपने परिवार के साथ सो रहे थे। सुबह पांच बजे चली गाड़ी ने 6 घंटे का सफर 10 घंटे में पूरा किया। जब मैं कानपुर ताऊजी के घर पहुंचा तो चौथे का कार्यक्रम लगभग समाप्त होने वाला था। तय तो यह किया था कि सुबह-सुबह ही घर पहुंच जाऊंगा। खैर क्या कर सकते थे। 

अगले दिन सुबह 6 बजे शताब्दी से चलना था। यह गाड़ी पांच घंटे में दिल्ली पहुंचती थी। वह साढ़े तीन घंटे देर से आयी और शाम को दिल्ली पहुंची! 

मेरी जिंदगी का बहुत लंबा हिस्सा कानपुर में बीता है। मेरा मानना है कि अपना यह शहर देश में सबसे गंदे शहरों में शुमार होता है। मगर इस बार वहां एक ही दिन में यह अहसास होने लगा कि जहां तक गंदगी का सवाल है देश की राजधानी दिल्ली व कानपुर में कोई खास अंतर नही है। प्रदूषण भी वहां दिल्ली से ही कम नजर आया। हालांकि मिलों का शहर होने के कारण यहां धुंए के कारण बुरा हाल हो जाता था। एक समय तो प्रदेश के सबसे ज्यादा टीबी के रोगी इसी शहर में होते थे। या तो पिछले कुछ वर्षों में कानपुर में थोड़ी बहुत सफाई हुई थी, जिसकी संभावना काफी कम है अथवा इस दौरान दिल्ली कुछ ज्यादा ही गंदा हो गया। 

तीन साल में दो रेल मंत्री बदले जाने के बावजूद भी भारतीय रेलवे गंदगी का रिकार्ड बनाने पर तुली हुई है। न केवल स्टेशनों पर रेलवे ट्रेक गंदगी से भरे हुए थे बल्कि एक्सप्रेस ट्रेन के शौचालय भी इतने गंदे व गीले थे कि वहां चंद मिनट भी खड़ा होना मुश्किल था। लग रहा था मानो अमोनिया या सल्फरडाई आक्साइड के गैस चैंबर में आ गए हो। चंद मिनटों में ही दम घुटने लगा। 

जब गाड़ी ने दिल्ली की सीमा में प्रवेश किया तो रेलवे लाइन के दोनों ओर कूड़े कचरे का अंबार लगा हुआ था। ट्रेन आईटीओ के पास स्थित तिलक ब्रिज पर रुकी तो वहां यात्रियों के बैठने के लिए लगाई गई बेंचो के नीचे पुरानी चाय के गिलास बोतलों व कूड़ा करकट का ढेर लगे नजर आए। ऐसा लगा कि जैसे प्लेटफार्म पर शताब्दियों से सफाई ही न की गई हो। दिल्ली का प्लेटफार्म तो प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान का मखौल उड़ाता नजर आया। 

काश! किसी दिन नए रेल मंत्री वहां जाकर बदबू व गंदगी का नजारा ले लेते। बाहर निकलते ही चारो ओर गंदगी के अलावा पेशाब की इतनी जबरदस्त बदबू आ रही थी कि कार के दरवाजों की खिड़कियां तक बंद होने के बाद भी वहां चद मिनट सांस ले पाना मुश्किल हो रहा था। यह वो स्टेशन है जहां सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक आते है क्योंकि देश के तमाम पर्यटन स्थलों जैसे आगरा, जयपुर से आने जाने वाली रेल गाड़ियां यहीं से रवाना होती है। वे हमारे बारे में क्या सोचते होंगे इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मगर हम है कि सच सुनने के लिए भी तैयार नहीं है। शायद हमारी दुर्दशा की यही सबसे बड़ी वजह भी। 

जब घर पहुंच कर अखबार खोला तो पढ़ा कि मोदी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के स्वच्छता एवं सुरक्षित पेयजल व मानवाधिकार मामलों के विशेष प्रतिनिधि हैलर की भारत यात्रा के दौरान की गई टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उसे असंवेदनशील करार दिया था। अपने दो सप्ताह के दौरे पर भारत आए हैलर ने यहां की गंदगी देखकर जो टिप्पणी की वह बहुत गंभीर है। मालूम हो कि मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन का लोगों महात्मा गांधी का चश्मा बना रखा है। हैलर ने कहा कि मैं जहां कहीं भी गया वहां मैंने गांधी के चश्मे को इस मिशन पर देखा। इस मिशन के लागू होने का यह तीसरा साल चल रहा है। अब समय आ गया है जबकि इस चश्मे के लेंस बदल दिए जाने चाहिए। मौजूदा लेंसो की जगह मानवाधिकार के लेंस लगा देने चाहिए। 

उनकी इस टिप्पणी के तुरंत बाद भारत सरकार द्वारा एक बयान जारी किया गया जिसमें हैलर की भर्त्सना करते हुए कहा गया था कि पूरी दुनिया को पता था कि महात्मा गांधी स्वच्छता व मानवाधिकारों के कितने बड़े पुरोधा था और इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। इसीलिए हमने उनके चश्मे को स्वच्छ भारत मिशन का लोगों बनाया। हैलर ने जो कुछ कहा है वह उनकी गलत जानकारी के आधार पर दिया गया बयान है। स्वच्छता की स्थिति वैसी नहीं है जैसा कि उन्होंने कहा है। मालूम हो कि हैलर ने यहां तक कहा कि महज शौचालय बनाने से स्वच्छता अभियान पूरा नहीं हो जाएगा। लोगों को उनके रखरखाव व इस्तेमाल करने के लिए पानी भी उपलब्ध करवाना पड़ेगा। 

यह सब पढ़ कर लगा कि यह सरकार कितनी संवेदनहीन व असहिष्णु हो चुकी है कि वह सच को सुनने तक के लिए तैयार नहीं है। अपना मानना है कि हैलर ने जो कुछ कहा वह पूर्णतः सत्य है। मगर बापू के चश्मे के लेंस बदलने से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि यहां तो सरकार की आंखों में मोतियाबिंद हो चुका है अतः कितने भी लेंस क्यों न बदल ले उसे सच्चाई दिखायी नहीं देंगी।

549 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2018 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech