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मोदीजी, खिचड़ी की जरूरत क्यों पड़ी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी जवाब नहीं। वे इतनी दूर की कौड़ी लाकर उसे विश्व रिकार्ड बता देंगे, इसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। उन्होंने खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित करवाने के साथ ही इंडिया गेट पर उसे इतनी बड़ी मात्रा में बनवा कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल करवा दिया। इतना ही नहीं घर में चाय तक न बनाने वाली अपनी केबिनेट मंत्री हरसिमरन कौर व स्वयंभू महर्षि बाबा रामदेव के हाथों में कड़छी पकड़वा कर उन्हें देखते-ही-देखते संजीव कंपूर का सहायक शैफ बना डाला। 

नरेंद्र मोदी को खिचड़ी शुरू से ही पसंद है। भले ही उन्होंने गुजरात में मंच पर मुसलमानों को जालीदार टोपी पहनने से इंकार कर दिया हो मगर जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और वे संघ के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो एक बार अचानक उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के घर पहुंच कर कहा कि मैं भूखा हूं। खाना खाऊंगा। मेरे लिए खिचड़ी बनवा दो। वे उन्हें प्यार से बाबू भाई कहकर बुलाते थे। 

बाबू भाई ने राजीव गांधी द्वारा बुलाई गई बैठक छोड़कर उनके लिए खिचड़ी बनवाई। उन्हें खिलाई और फिर बैठक में गए और समय पर न आ पाने के लिए राजीव गांधी को असली वजह बताई। देश का 90 फीसदी नमक का उत्पादन गुजरात में ही होता है। मगर लगता है कि जल्दबाजी में बाबू भाई उस दिन खिचड़ी में नमक डलवाना भूल गए थे। वरना चंद माह पहले गुजरात में हुए राज्य सभा चुनाव में उन्हें हरवाने की इतनी बड़ी नाकाम कोशिश न की जाती।

बहरहाल जब इस साल नरेंद्र मोदी ने अपने दो मंत्रियों मुख्तार अब्बास नकवी व जीतेंद्र सिंह को ख्वाजा मोहनुद्दीन चिश्ती की मजार पर चादर चढाने के लिए उन्हें अजमेर शरीफ भेजा तब मैं उसकी वजह नहीं समझ पाया था। जब उन्होंने चंद दिन पहले इंडिया गेट पर खिचड़ी बनवा कर बंटवाई तो मुझे इन मंत्रियों की यात्रा का मतलब समझ में आया। 

दरअसल अकबर और जहांगीर दोनों ने ही इस दरगाह को दो बड़ी कढाईयां या देग भेंट में दी थी। इन्हें बड़ी देग व छोटी देग कहा जाता है। इनमें मीठा चावल या जरदा चावल तैयार करवा कर गरीबो में बांटा जाता है। अकबर की बड़ी देग की क्षमता 4800 किलोग्राम मीठा चावल तैयार करने की है जबकि जहांगीरी देग में 2400 किलो चावल तैयार होता है। 

अकबर ने पहली बार अपनी कढ़ाई में 5000 लोगों के खाने के लिए खिचड़ी तैयार कराई थी। खुद अकबर व नूरजहां ने अपने हाथों से खिचड़ी निकाल चखी थी। बाद में उसे गरीबों में बांट दिया गया था। मोदी ने इंडिया गेट पर जो खिचड़ी तैयार करवाई उसे गरीबों के साथ-साथ 60 देशों के राजदूतो को भी खिलावा दिया। अकबर ने जब खिचड़ी बनवाई थी तब गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड नहीं हुआ करता था। अतः उसकी मात्रा को रिकार्ड नहीं माना जा सकता है। इससे पहले विश्व रिकार्ड 500 किलो का था मगर इंडिया गेट पर आयोजित विश्व खाद्य मेले में 918 किलो खिचड़ी तैयार करवा कर मोदी सरकार ने विश्व रिकार्ड बनाने के साथ ही यह भी साबित कर दिया कि उसने अकबर को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है। 

इसे बनाने के लिए 50 किलो मूंग की दाल व 250 किलो चावल, 200 किलो ज्वार बाजरा व 700 लीटर घी का इस्तेमाल किया गया। इस मौके पर जब बाबा रामदेव ने यह कहा कि खिचड़ी तो इस देश की अनेकता में एकता को प्रतिबिंबित करती है तो उनकी बात सुनकर प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी व उनके चेले राजीव सेठी द्वारा आयोजित किए गए अपना उत्सव की यादें ताजी हो गई जिसको बाद में तब मणिशंकर अय्यर ने मुझे दिए साक्षत्कार में कहा था कि हुक्के का धंधा भी संस्कृति है। 

सच है जो सत्ता में या उसके करीब होता है उसके मुंह से निकलने वाली बेहूदगी भी वेदवाक्य मानी जाती है। उन्होंने खिचड़ी को जो अंतर्राष्ट्रीय हैसियत दिलवाई उसके लिए उन्हें देश हमेशा याद करेगा। हमारे देश में खिचड़ी का इतिहास बहुत पुराना है। जब से इंडिया गेट पर खिचड़ी बनी है सोशल मीडिया खिचड़ी संबंधी जानकारी से भर उठा है। इस जानकारी के मुताबिक वेदों में भी खिचड़ी का जिक्र मिलता है। वेदों में उसके लिए खिरचा शब्द का उपयोग किया गया है। अकबर, जहांगीर व शाहजहां तक को खिचड़ी बहुत पसंद थी। इब्ने बतूता से लेकर तमाम विदेशी यात्रियो ने अपनी भारत यात्रा में खिचड़ी का जिक्र किया है। हैदराबाद का निजाम भी खिचड़ी का बहुत बड़ा शौकीन था मगर वह अपनी खिचड़ी में कीमा डलवाता था। अवध का नवाब सीरूद्दीन शाह को मेवे की खिचड़ी बनवाना पसंद था। वह तो खिचड़ी में दाल के साथ चावल की जगह काजू व बादाम के चावल जितने छोटे टुकड़े करवा कर उनसे खिचड़ी तैयार करवाता था। 

गनीमत है कि खिचड़ी हिंदू है क्योंकि उससे मिलती-जुलती बिरयानी को मुसलमान माना जाता है। हालांकि हिंदू व मुसलमान के बीच का व्यंजन तहरी है जो कि कायस्थ लोगों में बहुत लोकप्रिय रही जोकि धर्म से हिंदू थे व उनका खान-पान, भाषा मुसलमानों की तरह हुआ करती थी। तहरी में दाल चावल के अलावा मटर, गोभी व आलू भी डाला जाता था व उसे साज व हल्दी के साथ छौका जाता था। खिचड़ी व तहरी इतनी लोकप्रिय थी कि जब अंग्रेंज भारत आए तो उन्होंने इसकी देखा-देखी एक नया व्यंजन तैयार किया जिसे कि कैहगेरे के नाम से जाना जाता है। इसमें चावल को अंडे, मक्खन, मछली व मसालों के साथ पकाया जाता है। वे अपने साथ इसे ब्रिटेन भी ले गए और तमाम शब्दकोष में इसको खिचड़ी का ही करीबी बताया जाता है। 

हमारे देश के हर राज्य में खिचड़ी किसी न किसी रूप में प्रचलित है। मकर संक्रांति पर तो इसे विशेष तौर पर खाया जाता है। कहवत है कि खिचड़ी के चार मार, दही पापाड़, घी और अचार। मुझे तो उड़द की दाल वाली खिचड़ी पसंद है जो कि बासमती चावल के साथ बनाई जाती है और जिसका एक-एक दाना अलग होता है। वैसे अपना मानना है कि खिचड़ी तो बीमार लोगों का खाना है। आयुर्वेद में भी ऐसा ही बताया गया है। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है कि सत्ता में आने के पहले मोदी ने कहा था कि मैं न तो खाऊंगा और न ही खाने दूंगा। अब ऐसा क्या खा लिया कि महज साढ़े तीन साल में ही सरकार की पाचन प्रणाली इतनी खराब हो गई कि खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित करने की नौबत आ गई।

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