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दो गज जमीन को तरसता बादशाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की म्यांमार यात्रा के साथ ही एक बार फिर भारत देश के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर की याद और उनकी अंतिम इच्छा की याद ताजी हो गई। वे उनकी मजार पर भी गए और वहां उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित की। बहादुर शाह जफर को सत्ता से हटाने के साथ ही अंग्रेजों ने 330 साल से चले आ रहे मुगल शासन का नामो निशां मिटा दिया था। वे एक ऐसे शासक थे जिन्हें युद्ध और हाथियारों की जगह गजल और शेरो-शायरी से लगाव था। उन्हीं को लेकर यह कहावत गढ़ी गई थी कि ‘शहंशाहे आलम दिल्ली से पालम’!

सच था कि भारत का बादशाह होने के खिताब के बावजूद उनका शासन सिर्फ शाहजहांनाबाद पुरानी दिल्ली तक ही सीमित था। अंग्रेज उन्हें पेंशन देते थे व ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेनाओं का खर्च जुटाने के नाम पर उनसे कर वसूल करने और शासन करने का अधिकार हासिल कर लिया था। जिस शासक के पूर्वजों ने 330 साल तक हिंदुस्तान पर राज किया। यहां ताजमहल, शालीमार बाग, लाल किला, आगरा का किला व फतेहपुर सीकरी सरीखी ऐतिहासिक इमारतें बनवायी थीं वही उसका आखिरी वंशज बेहद जिल्लत और गरीबी की जिंदगी जीते हुए मरा।

वह सूफी विचारधारा के मानने वाले थे। जौक व मिर्जा गालिब सरीखे शायर उनके दरबार में शायरी करते थे। वे खुद भी गजलें लिखते थे। जब 1857 का विद्रोह हुआ तो मेरठ से बगावत करके आए करीब 300 ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय सैनिकों ने उन्हें अपना कमांडर-इन-चीफ मान लिया। इसकी वजह यह थी कि बहादुर शाह जफर को हिंदू व मुसलमान दोनों ही अपना मानते थे। वे हिंदुस्तान की शान के प्रतीक बन गए थे। सच्चाई तो यह है कि बादशाह होने के बावजूद भी उनके पास न तो सेना थी और न ही हथियार। 

कमांडर इन चीफ होने के बाद भी उनका बागी सैनिकों पर अधिकार नहीं था। इन बागी सैनिकों ने दिल्ली पर कब्जा करने के बाद हर योरोपीय औरतों-बच्चों व पुरुषों का मार डाला। शहर में जमकर लूटपाट भी की। इसमें स्थानीय लोगों ने उनका साथ दिया व साहूकारों, व्यापारियों के यहां लूटपाट की गई। जब अंग्रेजों ने बगावत को कुचल दिया तो 20 सितंबर 1857 को बहादुर शाह जफर एक पालकी में बैठकर निजामुदीन औलिया गए। वहां के ख्वाजा शाह गुलाम हुसैन से उन्होंने कहा कि अब मेरा शासन समाप्त होने जा रहा है। मेरे पूर्वज तैमूर इंस्ताबूल से हजरत मोहम्मद की दाढ़ी के पवित्र बाल लेकर आए थे जो कि आज तक मुगल शाही परिवार में सुरक्षित रखे हैं। अब मैं इन्हें आपको सौंप रहा हूं। उन्होंने उनसे वह बाल लेकर तिजोरी में रख दिया। 

इसके बाद जफर ने उनसे कहा कि मैंने तीन वक्त से कुछ खाया नहीं है। ख्वाजा उन्हें खाना खिलाने के लिए घर के अंदर ले जाने लगे मगर उन्होंने अंदर जाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि इससे आपके लिए दिक्कत पैदा हो जाएगी। इस पर ख्वाजा घर के अंदर गए और वहां रखी बेसन की रोटी और सिरके की चटनी ले आए। बादशाह ने वे रोटियां खायीं और हुमायूं के मकबरे की ओर चल दिए जहां उन्होंने अगले दिन मेजर हडसन के समक्ष अपने दो बेटों के साथ समर्पण कर दिया। 

दिल्ली पर पुनः अंग्रेजों का कब्जा हो गया व बादशाह के 16 बेटों की हत्या कर दी गई। तीन बेटों के सिर काट कर काबुली या लाल दरवाजे पर लटका दिए गए और फिर उसका नाम खूनी दरवाजा पड़ गया। यह जगह बहादुर शाह जफर मार्ग पर ही स्थित है। इसके बाद हडसन ने उन सिरों को बादशाह के पास भिजवा दिया। उन पर दिल्ली में मुकदमा चलाया गया और हिंदुस्तान के बादशाह पर देशद्रोह का आरोप लगा। उन पर बागी सैनिकों का नेतृत्व करने, योरोपीय लोगों की हत्या करवाने के आरोप भी लगाए गए। 

करीब तीन माह तक चले इस मुकदमे में बहादुर शाह जफर ने कहा कि मैं तो नाम का बादशाह था। बागी सैनिकों ने मेरी शाही मोहर ले रखी थी व वे मेरी मोहर लगाकर लिफाफे सिल करके भेजते थे। मुझे नहीं पता था कि इन लिफाफो में क्या होता था। क्या विडंबना थी कि हिंदुस्तान के बादशाह पर उसी के महल लाल किले में मुकदमा चलाया गया। उन्हें कैद की जगह देश निकाले की सजा दी गई। 

उन्हें बरमा याकि म्यामांर भेज दिया गया जो उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन था। उन्हें उनकी बेगम जीनत महल व परिवार के कुछ सदस्यों व सेवकों के साथ बैलगाड़ी से कलकत्ता भेजा गया और वहां से पानी के लड़ाकू जहाज द्वारा रंगून भेजा गया। पूरे काफिले में करीब 30-40 लोग थे मगर उन लोगों के लिए चार कमरे वाला मकान उपलब्ध करवाया गया जिसमें एक कमरे में बादशाह रहते थे। 

वे उस समय 82 साल के हो चुके थे और बीमार रहते थे। घर के नौकरों में एक भिश्ती, एक जमादार, एक चपड़ासी व एक रसोइया मिला था। अंग्रेजों ने उन्हें चेतावनी दे रखी थी कि अगर भागने की कोशिश की तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। उन्हें पढ़ने लिखने का शौक था मगर अंग्रेजों ने उनकी कलम और कागज तक उनसे छीन लिए थे। अंतिम दिनों में दीवार पर लकड़ी के टुकड़े से लिखते थे। करीब पांच साल तक वहां बिताने व बीमार रहने के बाद 7 नवंबर 1862 की सुबह तीन बजे उनका देहांत हो गया। उस शाम उनके शरीर को इस घर के पास ही में दफन कर दिया गया और मिट्टी भरकर उसमें चारो ओर बांस की बाढ़ लगा दी गई। यह स्थान श्वेदागान पगोड़ा के पास में था। 

इसके बाद वहां के अंग्रेज कमिश्नर ने लंदन को सूचित किया कि उन्होंने इस जगह की पहचान मिटाने के पूरे इंतजाम कर दिए हैं क्योंकि उसे आशंका थी कि यह जगह हिंदुस्तानियों का तीर्थस्थल बन जाएगा। उनकी बेटी व बेगम को भी वहीं दफना दिया गया। सन 1903 में बरमा आए हिंदुस्तान के एक प्रतिनिधि मंडल ने उनको सम्मानपूर्वक दफनाने की मांग की। उसके बाद वहां एक पत्थर लगा दिया गया जिस पर लिखा गया था कि यहां दिल्ली के पूर्व राजा को 7 नवंबर 1862 को दफनाया गया है। शायद यह पत्थर भी वहां दबकर खो गया होता व बहादुर शाह जफर की अस्थियों का पता भी नहीं लगता मगर 16 फरवरी 1961 को उस जगह पर नाला खोदते हुए मजूदरों को एक पत्थर के नीचे, रेशम के कपड़े में लिपटी अस्थियां मिली। वहां फूल भी पाए गए। 

जांच से पता चला कि वे जफर की ही अस्थियां थी। इसके बाद भारत सरकार ने वहां दरगाह बनाने में मदद की। अब वहां प्रार्थना होती है। लोग मन्नतें मांगने जाते थे। शायद यही एक मात्र ऐसी जगह है जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के नेता अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं। आसफ अली जरदरी ने तो वहां 50000 डालर की रकम भी दी थी। जहां एक ओर अंग्रेजों ने भारत के बादशाह को बरमा में भेजा वहीं बरमा के अंतिम राजा थिवा को गिरफ्तार करके महाराष्ट्र के रत्नागिरी इलाके में कैद कर दिया था जहां 1885 में उनका निधन हो गया था और उन्हें वहीं दफना दिया गया था। 

लंबे अरसे से बहादुर शाह जफर की अस्थियां भारत ला कर उन्हें दफनाने की मांग की जाती रही है। वे महरौली में कुतुबद्दीन बख्तिार की दरगाह के निकट दफनाया जाना चाहते थे और अपने जीवन काल में ही उन्होंने अपनी कब्र भी खुदवा दी थी। उनकी अस्थियों के वापस लाने के लिए अनेक बार कुलदीप नैयर, सईद नकवी, राजेंद्र सच्चर सरीखी हस्तियों ने अभियान चलाएं। जब सुषमा स्वराज सत्ता के बाहर थी तो वे भी उनकी अस्थियां लाए जाने की हिमायत करती थीं मगर लंबे अरसे से यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

बहादुर शाह जफर का वह शेर बहुत चर्चित हुआ जिसमें उन्होने कहा था कि 'कितना बदनसीब है जफर दफन के लिए दो गज जमीन भी मिल न सकी कू-ए-यार में।’ सुषमा स्वराज अब विदेश मंत्री हैं और जफर की अस्थियां अपने देश की मिट्टी में दफनाए जाने का आज भी इंतजार कर रही हैं।

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