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चुनाव के लिए कुछ भी हल्ला कर देंगे

विवेक सक्सेना
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एक बार किसी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि अगर आपको अपने खानदान का इतिहास पता करना हो तो चुनाव लड़ लेना चाहिए। आपके विरोधी ऐसी-ऐसी जानकारी निकाल कर लाएंगे कि आपकी आंखें खुल जाएंगी। हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान जो कु पढ़ने को मिला उसमें से कुछ मामले ऐसे हैं जिनकी मैं चाह कर भी अनदेखी नहीं कर सकता हूं। 

एक मामला प्रधानमंत्री द्वारा सेना के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल केएस थिमैया की नेहरू द्वारा अपेक्षा किए जाने का है तो दूसरा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर उठे विवाद का है। सब जानते हैं कि इन विवादों की वजह कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सीधे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करवाने कराने की कोशिश है। ठीक वैसा ही उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान और श्मसान सरीखे बयान देकर व किसी भी मुसलमान को विधानसभा का टिकट नहीं दे कर किया था। 

यह इस देश दुर्भाग्य है कि ज्यादातर लोग यह मान कर चलते हैं कि आम मुसलमान, पूर्व के मुस्लिम शासक, पाकिस्तान में हिंदुओं के प्रति नफरत में सब एक से है। संघ ने तो एक बार यहां तक कह दिया था कि हम कह सकते हैं कि आम मुसलमान आतंकवादी नहीं हो सकता। मगर क्या वजह है कि हर आतंकवादी मुसलमान ही होता है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ। यह विवाद हिंदू धार्मिक संगठनों द्वारा पैदा किया गया था। हल्ला मचाने वाले यह भूल गए कि दिल्ली स्थित संसद के एक बड़े कमरे में जहां भाजपा नेता बैठते है एक बड़ी तस्वीर पाक के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की लगी है जो कि कभी आधे करनाल के मालिक हुआ करते थे। 

यह बात सच है कि इस विश्वविद्यालय के संस्थापक पाकिस्तान के समर्थक रहे थे। उनका नाम सर सैयद अहमद था जो कि अंग्रेंजो के काफी करीबी माने जाते थे। उनकी लिखी दो किताबों बगावत ए हिंदु व बिजनौर की बगावत को पढ़कर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने 1857 के स्वंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों का विरोध किया था और उन्हें फसादी बताया था। उन्होंने अंग्रेंजो की जान बचाई थी बदले में अंग्रेंजो ने उन्हें सर की उपाधि देने के साथ भारी तादाद में जमीनें दी थी। 

इस क्रांति की विफलता के कारण मुसलमानों में विभाजन हुआ। देवबंदी मुसलमानों के नेता मौलाना कासिम ने फैसला किया कि अंग्रेंजो से किसी तरह का कोई सबंध न रखा जाए। इसके तहत दारूल उलूम देवबंद की स्थापना की गई। जबकि सर सैयद अहमद ने अंग्रेंजों के साथ मिलकर 1875 में एंग्लो कालेज की स्थापना की जिसकी नीव तत्कालीन वायसराय ने रखी थी। 

वे ऐसे पहले मुसलमान थे जिन्होंने लाहौर में कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमे है। यही वजह रही कि जब असहयोग आंदोलन के दौरान वहां मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना आजाद व मोहम्मद हुसैन मदनी इस विश्वविद्यालय में गए और वहां जाकर महात्मा गांधी के आंदोलन का समर्थन करने की बात कहना चाहते थे तो छात्रों ने उन्हें घुसने नहीं दिया। 

यहां बता दें कि अपने समय के जाने-माने वकील जिन्ना पहले कांग्रेंस में हुआ करते थे। उनकी गिनती सोली सोराबजी सरीखे जैसे नामी वकीलों में की जा सकती है। वे बेहद अमीर व विद्वान थे। बाद में जब उन्होंने महात्मा गांधी के तौर तरीको व जवाहर लाल नेहरू के प्रति उनके प्रेम को देखा तो वे उनसे अलग होने लगे। इसकी एक बड़ी वजह नागपुर सत्र में गांधी द्वारा असंवैधानिक तरीको से अंग्रेंज शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू करना था। 

जाने-माने कांग्रेंसी नेता चितरंजन दास, लाला लाजपत राय व जिन्ना इसके विरोधी थे। मगर जिन्ना के अलावा महात्मा गांधी के इस फैसले के खिलाफ कोई भी खुलकर नहीं बोला। उन्होंने कहा कि आजादी हासिल करने का आपका रास्ता गलत है व मेरा सहीं है। जब यह आंदोलन हिंसक हो गया व गोरखपुर के निकट चौराचौरी में भीड़ ने दो पुलिस वालों की हत्या कर दी तो गांधी ने यह आंदोलन वापस ले लिया। 

कहा जाता है कि वे खादी पहनने वाले व हिंदुस्तानी बोलने वालों के खिलाफ थे और राजनीति को पढ़े लिखे पैसे वालों की मिल्कियत बताते थे। हालांकि उन्होंने जिन मुसलमानों का नेतृत्व किया उनमें से ज्यादातर लोग गरीब थे, हिंदुस्तानी बोलते थे व खादी पहनते थे। बाद में वे कांग्रेंस से अलग हो गए और इंडियन मुस्लिम लीग का नेतृत्व करने लगे। यह भी सच है कि हमारे नेताओं की जिद के कारण देश का विभाजन हुआ और इसमें अपने इतिहास के सबसे ज्यादा 10 लाख लोग मारे गए। 

दूसरी और चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान के साथ 1948 का युद्ध जनरल केएस थिमैया के कारण जीता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन ने उनका बार-बार अपमान किया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। सच तो यह है कि थिमैया को दो वरिष्ठ अफसरो की अनदेखी करके नेहरू ने 1957 में सेना प्रमुख बनाया था। वे उनके काफी करीबी थे। 

उनकी कृष्णामेनन से नहीं पटती थी व उन्होंने अपना इस्तीफा दिया था जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया व 1964 में उन्हें साइप्रस में संयुक्त राष्ट्र सेनाओं का सेनापति नियुक्त करवाया। काश मोदी उनकी जगह देश के पहले व एकमात्र फील्ड मार्शल सैम मानेक शा की इंदिरा गांधी द्वारा की जाने वाली दुर्दशा के बारे में बोलते। वे भी कर्नाटक के थे। मगर लगता है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा का पढ़ने लिखने का काम कम हो गया है। जिन्ना के साथ हमारी काफी असहमतियां हो सकती है मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि वे हमारे बुजुर्ग थे व इस कारण हम सबके सम्मान के अधिकारी थे। 

अलीगढ़ विश्वविद्यालय में लगी तस्वीर मुंबई के मलाबार हिल स्थित उनके विशाल बंगले सरीखा ही सत्य है। जिस देश के प्रधानमंत्री सैनिको की गर्दन कटवाने वाले पाक प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उन्हें बिना बुलाए बधाई देने व पकौड़े खाने पहुंच सकते हो, वह और उनकी पार्टी व सहयोगी दलो के लोगों में इतनी सहनशीलता भी होनी चाहिए कि वे पाक व जिन्ना का असम्मान न करे।

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