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हिंदी विरोध की यह राजनीति

पिछले दिनों कर्नाटक में हिंदी के विरोध को लेकर जो घटनाएं घटी वे अब भले ही शांत हो गई हो मगर उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। कहने को तो यह छोटा-सा मामला था। वहां के एक कन्नड संगठन ने बेगलुरू शहर के दो मेट्रो रेल स्टेशनों पर लगे त्रिभाषी नाम वाले बोर्डों जिन पर अंग्रेजी, कन्नड़ व हिंदी में उनके नाम लिखे हुए थे, उन पर हिंदी में लिखे नामों को पोत डाला। इसके साथ ही बेगलुरू शहर की कुछ ऐसी दुकानों पर लगे हिंदी के साइन बोर्डो को भी पोत डाला गया जिन पर हिंदी में दुकान का नाम लिखा था। 

फिर सोशल मीडिया पर तमाम दक्षिण भारतीय भाषा बोलने वालों ने एकजुटता दिखाते हुए उत्तर भारत के हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। यह सब कितना सघन होता जा रहा है और किस तरह से इसे दक्षिण भारतीय राज्योंकी पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी हवा दे रही है वह निश्चित रूप से एक खतरनाक संकेत है। सच कहूं तो ऐसा करके हिंदी के खिलाफ जहर फैलाया जा रहा है। हिंदी भाषा की तुलना उपनिवेशवाद से करते हुए दलीले दी जा रही है कि इस भाषा का आधिपत्य स्थापित करने के लिए उसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर जबरन थोपा जा रहा है। 

अपनी दलील को सही साबित करने के लिए तरह-तरह के तर्क व कुतर्क दिए जा रहे हैं। जैसे कि बेगलुरू में स्वच्छ इंडिया का विज्ञापन हिंदी में दिए जाने का क्या मतलब है? इस तर्क में दम है कि यह विज्ञापन अगर कन्नड़ में दिया जाता तो कहीं बेहतर रहता। पूछा जा रहा है कि भारतीय पासपोर्ट सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी में ही क्यों छापा जाता है? भारतीय जीवन बीमा निगम के फार्म सिर्फ हिंदी व अंग्रेंजी में ही क्यों छापे जाते हैं? अब इन लोगों को कौन समझाए कि मेरे सरीखे हिंदी के पत्रकार को भी सरकारी अनुदित हिंदी समझने के लिए मूल अंग्रेंजी के दस्तावेज की मदद लेनी पड़ती है। 

सवाल पूछा जा रहा है कि दूरदर्शन का किसान चैनल सिर्फ हिंदी में क्यों है, क्या सिर्फ हिंदी भाषी राज्यो के किसान ही खेती करते है? एक ने रेल की बोगी में शौचालय में लिखे नोटिस का हवाला देते हुए कहा है कि इसमें लिखा हुआ है कि जब ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी हो तो शौचालय का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह जानकारी सिर्फ हिंदी व अंग्रेजी में ही है। क्या यह दोनों भाषाएं न जानने वाले शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते हैं? 

एक ने तो सोशल मीडिया पर 15 अप्रैल 2015 को बेगलुरू में आयोजित की गई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक की तस्वीर भी पोस्ट की है जिस पर सबकुछ हिंदी व अंग्रेजी में ही लिखा गया है। उसने पूछा है कि जब इस शहर में ज्यादातर लोग कन्नड़ भाषी हैं तो क्या वहां कि इस भाषा की अनदेखी करना उचित ठहराया जा सकता है? मेरा भी मानना है कि इस शिकायत में दम है। 

दिक्कत यह है कि 1991 में बेगलुरू में महज दो फीसदी लोग ही हिंदी भाषी हुआ करते थे पर आज हालात बदल चुके हैं। जब चंद माह पहले मैं वहां गया था तो मैंने पाया कि वहां बड़ी तादाद में हिंदी भाषी राज्यों के लोग आ चुके हैं। कहीं भी कन्नड़ की जानकारी न होने के कारण मुझे बातचीत करने में दिक्कत नहीं हुई। बड़ी तादाद में उत्तर भारतीयो ने न केवल सिलिकॉन वैली में अपनी जगह बनाई है बल्कि वे सफलतापूर्वक रेस्टोरेंट, दुकाने आदि भी चला रहे हैं। उत्तर भारतीय खाना भी आपको बड़े आराम से मिल जाता है। 

कमोबेश यही हालात पुणे की भी है। अगर दो टूक शब्दों में कहा जाए कि जिस तरह से बड़ी तादाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के लोगों के आने के बाद दिल्ली के मूल निवासी अल्पमत में आ गए है वहीं स्थिति बेगलुरू की भी होने वाली है। गनीमत यही है कि वहां ज्यादातर उत्तर भारतीय लोग पढ़े लिखें और साइबर जगत से जुड़े हुए हैं। हालांकि पान और मिठाई बेचने वाले भी पहुंच रहे हैं। 

सच कहूं तो भाषा एक बेहद भावनात्मक मुद्दा है। आजादी के बाद राज्यों का पुर्नगठन भी भाषा के आधार पर हुआ था। मद्रास एस्टेट के विभाजन से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक अस्तित्व मे आए जबकि मुंबई एस्टेट के गुजराती भाषी लोगों के लिए गुजरात व मराठी भाषियों के लिए महाराष्ट्र बना। भाषा के ही आधार पर हरियाणा, पंजाब व हिमाचल का विभाजन हुआ। भाषाई आंदोलन कितने खतरनाक साबित हो सकते है इसका सबसे कटु अनुभव कांग्रेंस को ही रहा है। 

देश के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल सी राजगोपालाचारी जिन्हे देश का पहला भारत रत्न हासिल हुआ वे कभी हिंदी के कट्टर समर्थक हुआ करते थे उन्होंने तो देश आजाद होने के पहले ही 1937 में हिंदी अनिवार्य कर दी थी। इसका जबरदस्त विरोध हुआ। हिंसक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें दो लोग मारे गए। 1198 लोग गिरफ्तार हुए। अततः तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर लाड एर्लकिम को उनकी सरकार का यह फैसला बदलना पड़ा। 

गणतंत्र बनने के बाद 1950 में यह फैसला किया गया कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी सहायक भाषा के रूप में इस्तेमाल होती रहेगी जबकि राज भाषा हिंदी होगी। जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में राजभाषा कानून लाकर 1965 के बाद भी यह इसे जारी रखने का प्रावधान करवाया। तमिलनाडु में इसका विरोध हुआ। 25 जनवरी 1965 को राज्य में हिंदी के विरोध को लेकर दंगे भड़क गए। दो पुलिस कर्मियों समेत 70 लोग मारे गए। 

तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह भरोसा दिलाना पड़ा कि जब तक गैर-हिंदीभाषी राज्य नहीं चाहेंगे तब तक उन पर हिंदी नहीं थोपी जाएगी। तब विरोध भड़कने की एक बड़ी वजह त्रिचुरापल्ली से 50 किलोमीटर दूर स्थित कल्लाकुड़ी में डालमिया सीमेंट कारखाने के कारण उस जगह का नाम डालमियानगर रखा जाना था। इसका हिंसक विरोध हुआ। राज्य में कांग्रेंस की भक्त वत्ससलम सरकार थी। कांग्रेंस को हिंदी का विरोध इतना महंगा साबित हुआ कि 1967 के विधानसभा चुनाव में एक छात्र पी श्रीनिवासन ने कामराज सरीखे दिग्गज नेता को हरा दिया। 

हिंदी के विरोध को लेकर द्रविड पार्टियों ने अपनी राजनीति चमकाई। तब हिंदी को ब्राह्मणों की भाषा बताते हुए उसका विरोध किया गया। करूणानिधी सरीखे नेता हिंदी के विरोध पर ही फले-फूले। जब प्रधानमंत्री बनने पर राजीव गांधी ने देश में गरीब मेधावी बच्चों को पढ़ाने के लिए नवोदय स्कूल खोलने का फैसला किया तो तमिलनाड में सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों ने ही इसका यह कहते हुए विरोध किया कि इनमें हिंदी पढ़ाई जाएगी। आज तमिलनाडु ही देश में एक मात्र ऐसा राज्य है जहां नवोदय स्कूल नहीं। 

हिंदी विरोध के कारण कांग्रेंस तमिलनाडु से साफ हो गई वहां द्रविड पार्टियों का कब्जा हो गया। वैसे यह सच है कि जहां दक्षिण भारतीय लोग उत्तर भारत में आने पर हिंदी काफी जल्दी सीख लेते हैं वहीं हम उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखने से कतराते हैं जबकि यह तो हमारी योग्यता में ही चार चांद लगाती है। मैं खुद इसका जीता जागता उदाहरण हूं। मुझे दिल्ली में आए 37 साल हो गए। पत्नी पंजाबी है। जीवन भर पंजाब कवर किया मगर आज तक किसी से पंजाबी में बात नहीं की।

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