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कहां है मोती की पोती?

विवेक सक्सेना
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जब रविवार को अखबार खोले तो एक ओर इंदिरा गांधी की जन्मशती पर उन्हें याद करता हुआ कांग्रेस का विज्ञापन नजर आया जो कि आधे पेज का था जबकि उसके पिछले पेज पर पूरे पेज का शौचालय दिवस का विज्ञापन छपा देखा तो मन भर गया जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी शौचालय की नींव रखते दिखाई दे रहे थे। दोनों नेता आमने सामने थे। 

यह सब देख कर मुझे यह सोचने के लिए बाध्य हो जाना पड़ा कि इन दोनों नेताओं में कितनी ज्यादा समानताएं है। कम से कम उनके राजनीति करने का तरीका तो कमोबेश एक जैसा ही है। दोनों ही नेता जब तक सत्ता में रहे अपनी पार्टी व सरकार पर हावी रहे। वे जो ठान लेते थे उसे करके छोड़ते। इंदिरा गांधी ने अपने सामने कांग्रेस पार्टी को गौण बना दिया था। ठीक वैसे ही जैसे नरेंद्र मोदी ने भाजपा में किया है। इंदिरा गांधी ने अपने समय के कैसे बड़े नेताओं जिनमें मोरारजी देसाई से लेकर एस बी चव्हाण तक शामिल थे सबको बर्फ में लगा दिया। उन लोगों के न चाहने के बावजूद वे देश की प्रधानमंत्री बनीं और अततः कांग्रेस का विभाजन हुआ और पार्टी को उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा। 

मोदी जिस तरह से पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत बना कर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने वह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने भी लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी सरीखे बुजुर्ग व वरिष्ठ नेताओं को बर्फ में लगा कर उनकी राजनीति समाप्त कर दी। अगर इंदिरा गांधी ने गरीबों को अपने साथ लेने के लिए ‘इंदिरा लाओ गरीबी हटाओं’ का नारा देने के साथ बैकों का राष्ट्रीयकरण किया तो मोदी ने भी वही बात नोटबंदी करके कर दिखाया। हालांकि इंदिरा गांधी के उस कदम से गरीबी नहीं हटी। 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने एक बार मुझसे कहा था कि उन्हें पता था कि जब तक इस देश में गरीब रहेगा तब तक हमें गरीबी हटाने के मुद्दे पर वोट मिलता रहेगा। अगर गरीबी हट गई तो रैली करने के लिए भीड़ कहां से आएगी? लोगों को लुभाने के लिए हमारे पास क्या बचेगा? 

वे ठीक थे क्योंकि जिस बेअंत सिंह की कांग्रेस ने पंजाब से आतंकवाद का सफाया किया उसे अगले चुनाव में राज्य की जनता ने साफ कर दिया।

इंदिरा गांधी को अंर्तराष्ट्रीय नेता बनने का बहुत शौक था। दिल्ली का विज्ञान भवन उनकी ही देन है। जहां उन्होंने गुटनिरपेक्ष देशों (नैम)का सम्मेलन करवा कर अंर्तराष्ट्रीय जमावड़ा किया था। तमाम राष्ट्राध्यक्षों से मिलना जुलना व दोस्ती करना उनका शौक था। पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर के मुताबिक एक बार जब वे इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से मिलने गईं तो दोनों को अकेले में बात करनी थी। अचानक उन्होंने सलमान हैदर को अंदर बुला लिया। उन्होंने देखा कि सद्दाम हुसैन के साथ एक महिला दुभाषिया खड़ी थी। पूरी बातचीत के दौरान इंदिरा गांधी ने सलमान हैदर से कुछ नहीं पूछा और बातचीत चलती रही। 

उनके मुताबिक इंदिरा गांधी किसी भी मामले में खुद को उन्नीस नहीं होने देना चाहती थी क्योंकि सद्दाम हुसैन ने अपने साथ किसी और को बुला लिया था इसलिए जवाबी कार्रवाई करते हुए इंदिरा गांधी ने भी उन्हें बुलाया था। वैसे यहां यह याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि 29-अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दो बेहद काली महिलाएं काम करती थी। जब इंदिरा गांधी वहां आती तो अपने पीछे उन दोनों को खड़ा कर लेती थी ताकि जब उनकी फोटो खिंचे तो उनके साथ होने वाली तुलना में वे बेहद सुंदर नजर आए।

हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री को भी सैल्फी खिंचवाने का बहुत शौक है। उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी किसी नेता का कद बढ़ने नहीं दिया। भले ही वह उनकी अपनी पार्टी का रहा हो। इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता था कि वे पर्यावरण को बहुत प्यार करती थीं व उनकी कार्यशैली पौधे तैयार करने वाली उस नर्सरी जैसी थी जहां पौधा भले ही कितना पुराना व उम्रदार क्यों न हो जाए उसकी जड़े कभी गहरी नहीं हो पाती थी। यही फार्मूला उन्होंने राज्यों में भी अपनाया। चुन चुन कर ऐसे लोगों को मुख्यमंत्री बनाया जिनका अपना कोई बड़ा जनाधार नहीं था। प्रदेश अध्यक्ष ऐसे नेता को बनाया जाता था जिसकी मुख्यमंत्री से न बनती हो। ऐसे में मुख्यमंत्री कभी इतने मजबूत हो ही नहीं पाते थे कि वे उनके खिलाफ साजिश कर सके। 

जब उन्होंने टी अंजैया को आंध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था तो वे बहुत चर्चित नहीं थे। उस समय हिंदुस्तान टाइम्स में सुधीर धर का एक कार्टून छपा था जिसमें तमाम कांग्रेसी नेताओं को हाथ जोड़े कतार में खड़ा दिखाया गया था और उनके सामने खड़ी इंदिरा गांधी एक नेता की ओर इशारा करते हुए कह रही थीं कि तुम्हारा क्या नाम है, तुम नए मुख्यमंत्री हो? 

नरेंद्र मोदी ने भी वही किया। उन्होंने साबित कर दिखाया कि वे तो राम लीला के उस निदेशक की तरह है जो जब मन करे किसी के सिर पर मुकुट रख कर उसे राम या पूंछ लगाकर हनुमान बना सकता है। उन्होंने राज्यों से लेकर केंद्र सरकार तक यह कारनामा कर दिखाया। उत्तराखंड, हरियाणा से लेकर झारखंड में ऐसे अनजान लोगों को सत्ता  कमान सौंपी। केंद्र में स्मृति ईरानी से लेकर निर्मला सीतारमन तक को वे मंत्रालय सौंपे जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। 

इतना दुस्साहस तो इंदिरा गांधी भी नहीं दिखा पायी थी। इंदिरा गांधी को तो अखबारों को काबू में रखने के लिए आपातकाल के दौरान सेंसरशिप लगानी पड़ी थी मगर मोदी ने तो यह काम बिना कोई बयान तक दिए कर दिखाया। ज्यादातर निजी चैनलों में होड़ लगी है कि वे उनकी स्तुति करने व विपक्ष की ऐसी तैसी में एक दूसरे को पछाड़ते है। दूरदर्शन को तो वे बहुत पहले ही पीछे छोड़ चुके हैं। 

कांग्रेस के अध्यक्ष रहे देवकांत बरुआ ने तो ‘इंदिरा इज इंडिया’ का नारा दिया था। मुझे आश्चर्य इस बात पर होता है कि भाजपा के अध्यक्ष रहे व तुकबाजी में महारत हासिल करने वाले वेंकैया नायडू मोदी के बारे में ऐसा नारा क्यों नहीं गढ़ पाए? उन्हें तो उनकी तुलना ईश्वर से करनी चाहिए। वैसे भी उपराष्ट्रपति बनने के बाद नारा गढ़ने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगता है। एक समय था जब हरियाणा में कांग्रेस की जनसभा होती थी तो 'स्वाग व रागनी वाले'...... ‘मोती की पोती जवाहर की ज्योति’ सरीखे गाने गाते थे। मगर आज कांग्रेस तक ने उनकी जन्मशताब्दी पर कोई विशेष आयोजन तक नहीं किया। इंदिराजी बहुत दूरदर्शी थी। उन्हें पता था कि उनके जाने के बाद क्या होगा> इसीलिए उन्होंने अपने जीवित व प्रधानमंत्री रहते हुए खुद को  ‘भारत रत्न’ से नवाजा था। उन्होंने सिक्किम का भारत में विलय करवाया, पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा दिए फिर भी इस कृतघ्न राष्ट्र व उनकी पार्टी ने उन्हें भुला दिया। मोदीजी से आग्रह है प्रधानमंत्रीजी इंदिरा गांधी के हश्र से सबक लीजिए।

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