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महारानी ने खानसामे को बनाया सर

अपना शुरु से मानना रहा है कि इस देश में चापलुसी और चमचागीरी की बहुत अहमियत रहती आयी है। खासतौर से हिंदू धर्म में जहां हर भगवान, देवी, देवताओं की चालीसा बनी है वे सब उनको खुश करने के लिए ही रची गई थी। चापलूसी और मक्खनबाजी से तो ईश्वर तक खुश हो जाते हैं तो फिर इंसान क्या चीज है। हमारे देश में इसका सबसे अच्छा प्रमाण ‘गणेश परिक्रमा’ कही जा सकती है। 

दिवंगत राजेश पायलट ने भी एक बार एआईसीसी के मंच से कहा था कि अब कांग्रेस में भी गणेश परिक्रमा का रोग लग चुका है। कुछ लोग दिल्ली आकर एक घर की परिक्रमा करते हैं और फिर अपनी राजनीति चलाते आए हैं। चंपूगिरी सिर्फ किसी पार्टी विशेष का विशेषाधिकार नहीं रही। खुद को ऐसे लोगों से दूर रखने का संदेश देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 12वीं पास स्मृति ईरानी को आईआईटी सरीखे संस्थानों का उपकुलपति नियुक्त करने व पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी थी तो यह लगने लगा था कि शयद यह कमजोरी हमारे खून में है। 

मगर हाल में जो कुछ पढ़ा उससे पता चला कि हम भारतीय ही नहीं बल्कि कभी दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज भी इससे अछूते नहीं थे। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने भी अपने मुंह लगे रसोइए की चमचागीरी से खुश होकर उसे अपने उपकारों से इतना नवाजा कि वायसराय तक उससे रश्क करने लगे थे। आमतौर पर चापलूसी को नापसंद करने वाले अंग्रेजों से उसने मनचाहे काम करवाए। पद्मभूषण व पद्म विभूषण सरीखे सरकारी ओहदे बटोरे। उसकी हैसियत इतनी बढ़ गई थी कि उसे लेकर महारानी के परिवार के सदस्यगण उससे जलने लगे थे। 

इस बावर्ची का नाम मोहम्मद अब्दुल करीम था। महारानी विक्टोरिया के इस पद पर रहने की 50 वीं वर्षगांठ 1887 में मनायी जानी थी। इसमें बड़ी तादाद में भारत से राजा और रजवाड़ों को हिस्सा लेना था। महारानी विक्टोरिया चाहती थीं कि उन्हें कुछ भारतीय वहां के बारे में जानकारी व भाषा सिखाएं। इस मौके पर लंदन में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की जानी थी जिसमें आगरा जेल में कालीन बुनने वाले 34 कैदियों को भी भेजा जाना था। 

आगरा जेल के सुप्रिटेंडेट जान टाइलर ने इन कैदियों के साथ जेल का कामकाज देखने वाले दो लोगों मोहम्मद अब्दुल करीम व मोहम्मद बख्श को भी लंदन भेज दिया। करीम ने टाइलर को सुझाव दिया कि उन्हें महारानी के लिए कुछ भेंट भी भेजनी चाहिए और भारतीय कंगन अच्छा उपहार रहेंगे। ये दोनों लोग लंदन पहुंचे व महारानी से मिले। दोनों ने महारानी के पैर चूमे और फिर उनकी महारानी के खाने की मेज की जिम्मेदारी सौंपी गई। 

करीम महारानी को भारतीय करी, दालें, पुलाव आदि तैयार करके खिलाने लगा। ये चीजें उन्हें इतनी ज्यादा पंसद आने लगी कि महारानी उन्हें नियमित रुप से खाने लगी। वे उसे अंग्रेजी सिखाने लगी और उससे उर्दू (हिंदुस्तानी) सीखने लगी। उन्होंने उसकी दोहरी टयूशन लगवा दी ताकि वह जल्दी अंग्रेजी सीख लें। जैसे-जैसे वह अंग्रेजी और विक्टोरिया उर्दू सीखती गईं वे उनके काफी करीब आता गया। 

एक दिन उसने मौका देखकर उनसे कहा कि वह तो आगरा में मुंशी था। यहां उसे कुक बना दिया गया है। महारानी ने पहले उसे मुंशी की उपाधि दिलवाई और फिर उन्होंने उसे अपना सेक्रेटरी बना दिया। उसे महल के ही एक हिस्से में रहने के लिए कमरा दिया गया। वह महारानी को हिंदुस्तान की राजनीति समझाने लगा। 

वे उसके बारे में नियमित रुप से अपनी डायरी में लिखने लगी। वे लगातार उसकी तारीफ करती। अपने मिलने वालों से कहतीं कि यह तो मेरे बिना कहे ही यह जान लेता है कि मैं क्या चाहती हूं। उसके पिता आगरा की जेल में वार्ड ब्वाय थे। वह नवंबर 1888 में भारत आया जबकि उसके पिता रिटायर होने वाले थे। वह जेलर टाइलर से भी मिला, जिन तक उसकी शोहरत पहुंच चुकी थी। टाइलर ने उससे कहा कि उनकी पदोन्नति का मामला रुका हुआ है। उन्होंने अपने व उसके पिता वजीरुद्दीन के पेंशन के मामले को महारानी से पैरवी करने को कहा। 

लंदन लौट कर उसने महारानी से इन दोनों के बारे में बात की व उन्होंने तत्कालीन वायसराय लार्ड लैसडाउन को चिट्ठी लिखी। लैसडाउन ने कुछ समय तक यह मामला दबा दिया। उन्होंने महारानी को लिखा कि वे उसे आखिर किस कोष से पेंशन दे सकते हैं? महारानी ने उन्हें दोबारा पत्र लिखकर ये दोनों काम करने के कहा। अंततः वजीरुद्दीन को सैनिकों के बराबर पेंशन देने व टाइलर को इंस्पेक्टर जनरल बनाया जाने के आदेश जारी कर दिए गए। 

महारानी उसे इतना ज्यादा पसंद करने लगी थी कि वे उसे अपने साथ मैज पर खाना खिलाने लगी। उसे अपने विदेश दौरों पर साथ ले जाने लगी। एक बार उसके एक रिश्तेदार हुरमत अली को महल के किसी निवासी के किसी आभूषण के साथ पकड़ा गया। उसने सफाई दी कि भारत में जब किसी को कोई चीज मिलती है तो वह उसकी हो जाती है। महारानी ने अब्दुल की पैरवी पर उसे छोड़ दिया। 

धीरे-धीरे वह बेहद गुस्ताख, बदमिजाज होने लगा। उसे महल के बाकी कर्मचारी नापसंद करने लगी। जब कोई महारानी से उसकी शिकायत करता तो वो यही कहता कि उसके साथ नस्ली भेदभाव किया जा रहा है। जब 1857 की बगावत हुई तो अनेक अंग्रेजों ने उसके मुसलमान होने के कारण महारानी को दूर रहने व उस पर ज्यादा भरोसा न करने की सलाह दी मगर उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी। वे जब नाटक, ओपरा देखने जाती तो उसे राजपरिवारों के सदस्यों के साथ ही बैठाती। जब उसकी मां व पत्नी लंदन आयी तो महारानी ने उन्हें न केवल खाने पर निमंत्रित किया बल्कि उन्हें रुस की राजकुमारी व वेल्स राजपरिवार के सदस्यों से भी मिलवाया। 

जब वह उसे अपने साथ इटली के दौरे पर ले गई तो महारानी से उसकी निकटता देखकर अखबारों ने यह समझ लिया कि वह भारत का कोई राजकुमार है। जब विदेश मंत्रालय का एक आला अफसर भारत के दौरे पर गया तो महारानी ने उससे आगरा जाकर जाने माने सर्जन डा. वजीरुद्दीन से मिलने को कहा। उसने लौट कर उन्हें बताया कि उसका बाप तो वार्डब्वाय था। रानी ने उस पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। उसने महारानी पर दबाव बनवा कर भारत के वायसराय से उसे जमीन देने को कहा। 

महारानी ने उसे ‘सर’ और नवाब का खिताब दिया। उसे आर्डर आफ इंडियन एंपायर प्रदान किया गया और वह सर अब्दुल करीम बन गया। जब 1901 में महारानी का निधन हुआ तो उसके कमरे व भारत स्थित घर पर छापा मारकर महारानी व उसके बीच लिखे गए पत्रों को जब्त करवा कर उन्हें जलवा दिया। उसे वापस भारत भेज दिया। इतना जरुर था कि महारानी को दफनाने के पहले उसे अंतिम बार उनका चेहरा देखने की इजाजत दे दी गई। भारत विभाजन के समय वह पाकिस्तान चला गया जहां उसका निधन हो गया। पते की कुल बात यह कि महारानी ने एक खानसामे को भी उसकी चापलूसी से सर बनाया।

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