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उपवास का भला उपहास क्यों ?

विवेक सक्सेना
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मैंने कभी भी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में उपवास पर बैठे कांग्रेसियों के नाश्ता कर लेने से इतना बड़ा बवाल हो जाएगा। जिस दिन दिल्ली के कांग्रेसी नेता उपवास पर बैठे उस दिन एक तस्वीर वायरल हो गई जिसमें पार्टी के तीन नेताओं अजय माकन, हारुन युसुफ व लवली को उपवास पर बैठने के पहले एक रेस्टोरेंट में छोले-भठूरे खाते हुए दिखाया जा रहा था।

भाजपा ने इसे उपवास का उपहास करार दिया तो कांग्रेसी बगले झांकने लगे। सच कहूं तो कभी खुद व्रत करता आया हूं लेकिन खुद इस विरोध के खिलाफ हूं। वैसे इस दुनिया के हर धर्म में व्रत की काफी अहमियत है। हिंदुओं में तो व्रतों की भरमार है। सालाना नवरात्रि से लेकर पूर्णिमा, एकादशी तक को व्रत रखा जाता है। मंगल व गुरुवार का व्रत तो बहुत आम है।

पहले तो मैं भी मंगलवार को व्रत रखता था पर जब दिल का आपरेशन व डायबिटीज के कारण मैंने व्रत रखना छोड़ दिया तो यह तय कर लिया कि इन दोनों दिनों के अलावा त्यौहार व मंदिर जाने पर नान वैज नहीं खाउंगा। मैं कांग्रेसियों का उपहास उड़ाने के खिलाफ इसलिए भी हूं कि मेरा मानना है कि भूख हर व्यक्ति का एक स्वाभाविक गुण है व उसे रोकना नहीं चाहिए। कुछ साल पहले तक मैं अच्छी तरह से खा लेता था पर अब न तो खाने का मन करता है और न ही भूख लगती है।

मेरी स्पेशलिस्ट डॉक्टर ने इस समस्या का इलाज करने की जगह यह कह दिया कि तुम कौन सा शारीरिक श्रम करते हो जो कि तुम्हें भूख लगेगी। घर में लिफ्ट से आना जाना, नीचे कार में बैठकर सफर करना और फिर नाम मात्र की मेहनत किए दूसरों के दफ्तर तक पहुंच जाना। लेख लिखने में दिमाग खर्च होता है मगर ऊर्जा नहीं। तुम्हारे लिए तो खाने में दो रोटियां पर्याप्त है।

अब मैं उनसे क्या कहता। इसलिए जब प्रेस क्लब में किसी बजुर्ग को मुर्गा खाते व बियर पीते देखता हूं तो उसकी सेहत की तारीफ करते हुए दुनिया में हर किसी को उसके जैसा होने की कामना करता हूं। मुझे भूख नहीं लगती पर मेरे साथियों को लगती है। चूंकि कांग्रेसी लंबे अर्से तक सत्ता में रहे हैं और वह देश की खाने कमाने वाली पार्टी रही है। अतः उसके नेताओं को भूख लगना स्वाभाविक है।

कुछ समय पहले एक कांग्रसेी नेता से जब पूछा कि क्या आप कुछ खाएंगे तो उसने मुस्कुराते हुए कहा कि सच कहूं तो मेरा देश खाने का मन है जो कि बहुत दिन से नहीं खाया। अब रोटी दाल से पेट कहां भरता है। मगर यह कहां मिल रहा है?

मेरा मानना है कि आज कांग्रेस का काम भाजपा कर रही होगी, जो भी सत्ता में होता है वह खाने का काम करता है क्योंकि उसके बिना सरकार नहीं चलती है। जब अरविंद केजरीवाल, अन्ना के साथ भूख हड़ताल पर बैठे थे तब की और आज की उनकी तस्वीर देखिए। तब वे कितने मरगिल्ले थे और आज तो बकरीद का दुबा हो रहे हैं। गर्दन की मोटाई और चेहरे की चमक देखते हुए बनती है।

इसलिए खाने पीने की शौकीन रही कांग्रेस का भाजपा को मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। कौन क्या खाता है यह तो भगवान, किस्मत और राजनीति की देन होती है। जब तक आपका समय अच्छा चल रहा है तब तक आप खाइए मगर किसी के खाने पर नजर मत लगाइए। शायद इसीलिए बुजुर्ग अकेले में खाना खाने पर जोर देते  हैं।

एक बार मैंने देवीलाल के बेटे प्रतापसिंह से नाश्ता करते समय कुछ पूछ लिया तो वे बौखला गए और उन्होंने मुझे लगभग लताड़ते हुए गुस्से से कहा कि आम आदमी को पता है कि खाना खाते हुए कुत्ते तक को छेड़ा नहीं जाता है और आप पत्रकार होने के बावजूद देवीलाल के बेटे से खाना खाते समय सवाल पूछ रहे हैं! अतः मेरा मानना है कि जिनका खुद का खाने पीने का समय चल रहा हो उन्हें अपने विरोधियों के किसी तरह के खाने का जिक्र नहीं करना चाहिए। कांग्रेसियों के लिए छोले भटूरे क्या चीज है वे तो दुनिया की हर अच्छी व स्वादिष्ट चीज का स्वाद चख चुके हैं। याद रहे कि दूसरे के खाने पर नजर नहीं लगायी जाती। भगवान इसका बुरा मानते हैं।

इस दुनिया में चीटों से लेकर इंसान तक हर समय खाने पीने में व्यस्त नजर आता है। कोई रोटी खाता है तो कोई देश। अपना मानना है कि किसी का खाना पीना तो हिंदुओं के लिए धतूरे, अकोवे, भांग व पीपल के पेड़ की तरह महत्व रखता है। सावन में तमाम हिंदू उन्हें मंदिर ले जाकर शिव पर चढ़ाते हैं मगर कोई उसे अपनी क्यारीया घर में लगा कर पानी नहीं देना चाहता। हां, कांग्रेसियों की यह गलती थी कि उन्होंने सार्वजनिक स्थल पर खाया। मुझे लगता है कि वे लोग नेशनल ज्योग्राफी चैनल नहीं देखते हैं। अगर देखते होते तो अपना खाना अकेले में ही खाते।

इस चैनल में जंगल की जो कहानियां दिखाई जाती है उसमें शेर से लेकर लकड़बग्घे व तेंदुए तक को अपना शिकार अकेले में खाते हुए दिखाया जाता है। तेंदुआ तो अपने शिकार को पेड़ पर ले जाता है। यह देखने को मिलता है कि जब तक कोई जानवर कुछ खाता है बाकी उस खाने पर नजर गड़ाए रखते हैं। तभी कहते हैं कि सबके सामने खाने से वह शरीर को नहीं लगता। नजर लग जाती है। घर में मां अपने बच्चों तक को छुपाकर दूध पिलाती है। कुतिया तक अपने पिल्लो का सबके सामने पेट नहीं भरती है।

हर धर्म में उपवास का अलग महत्व है। मुसलमान रमजान में रोजे रखते हैं। जैनी तो भूखा रहकर संथारा करते हैं और अपनी जान तक दे देते हैं। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि दिन में लार तक न गटकने वाले मुसलमान रोजे के दौरान उसे रखने के पहले देर रात अपना पेट भरते हैं। पंजाबी हिंदू महिलाएं तो उनकी तरह देर रात अंधेरे में उठकर सरगी खाती है व फिर सारा दिन भूखे प्यासे रहकर करवा चौथ रखती हैं। खाना तो नितांत एक निजी मामला है।

हिंदू धर्म में ही उत्तर व पश्चिम भारत के ब्राह्मण मांस छूते तक नहीं। कुछ तो लहसून, प्याज तक से परहेज करते हैं। व्रत के दौरान खाने में हमारे जैसे लोग भी इनका इस्तेमाल नहीं करते पर बिहार के मैथिली ब्राम्हण व पहाड़ के ब्राम्हण मांस खाते हैं। हम लोग नवरात्रियों में अन्न तक नहीं खाते मगर जिस मां को पूजा करते हैं उसे पश्चिम बंगाल में मांस व मदिरा चढ़ायी जाती है। हम गाय को पवित्र मां मानते हैं। पर दुनिया में अरब से लेकर अमरीका तक तमाम धनी व संपन्न देशों में गाय खायी जाती है। राम हिंदुओं के सबसे बड़े पूज्य थे मगर उनकी पत्नी सीता इसलिए रावण का शिकार बनी क्योंकि उसने लक्ष्मण को हिरण के शिकार के लिए भेज दिया था। पता नहीं वह मांसाहारी थी या नहीं मगर उसकी जान तो लेना चाहती थी। अतः मेरा मानना है कि उपवास को लेकर एक सर्वदलीय संहिता बनानी चाहिए जिसमें यह तय किया जाए कि लोग खाना खाकर उस पर बैठने के साथ ही पानी-पेशाब को जाते समय भी कुछ न कुछ खा सके।

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