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श्रुति की शादीः शादी हो तो ऐसी!

लंबी छुट्टियों के बाद पाठको के सामने पेश हो रहा हूं। इसके कई कारण रहे। पहले पत्रकारों के एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए इंफाल जाना पड़ा। लौटने पर थोड़ी तबियत ढीली हो गई और फिर हमारी विधि (श्रुति) की शादी करीब आ गई। इसलिए सोचा कि विधि को विदा करने के बाद ही कलम उठाऊंगा, क्योंकि पंडित हरिशंकर व्यास ने तो पूरे सप्ताह भर की तैयारी कर रखी थी!

अब मैंने तय किया है कि व्यासजी को पंडितजी के नाम से संबोधित करूंगा। इसके कई कारण है। उनके व्यक्तित्व के कुछ अनछुए और अनजाने पहलूओं का पिछले दिनों खुलासा हुआ। मैंने पहली बार किसी विवाह का निमंत्रण संस्कृत में देखा। इसके साथ ही अग्रेंजी का भी निमंत्रण कार्ड संलग्न था। शादी में धोती कुर्ता पहने माथे पर टीका लगाए व गले में अंगवस्त्र डाले व्यासजी की शख्यिसत देखते ही बनती थी। मैंने उन्हें आज तक कभी पूजा-पाठ करते या व्रत रखते नहीं देखा। यह सारा विभाग हमारी भाभी राजरानी व्यास संभालती है। 

इसके साथ ही उन्होंने गुजरात चुनाव के दौरान सोमनाथ प्रकरण के बाद भाजपाई हथकंडों का पूरा फायदा उठाते हुए राहुल गांधी को हिंदू पंडित साबित करने का बीड़ा हाथ में उठा लिया। अब उन्होंने पूरा लेखन यह साबित करने में झोंक दिया है कि हिंदुत्व भाजपा की बपौती नहीं है और कांग्रेंस को अपना अतीत याद करते हुए भूल-सुधार कर छाती ठोंक कर खुद को हिंदू मानने से शर्माना या लजाना छोड़ देना चाहिए।

वे जो कुछ लिख व कह रहे हैं उस पर गुजरात चुनाव नतीजे आने के पहले ही बौद्धिक बहस शुरू हो गई है। चूंकि परिवार का कार्यक्रम था व हमें साग्रह सपरिवार आमंत्रित किया गया था अतः जयपुर जाना जरूरी हो जाता था। भाभीजी व पंडितजी का आदेश था कि हर कार्यक्रम में शामिल होना है और समय से पहले पहुंचना है। उन्होंने वहां बाहर से आए लोगों का इंतजाम कर रखा था जोकि सर्दियो के हिसाब से एक मुश्किल काम था। 

श्रुति के ससुराल वाले कश्मीरी ब्राह्मण है और लगता है कि रोशन लाल शर्मा भी व्यासजी की तरह ही दुस्साहसी है। घाटी में आतंकवाद की पराकाष्ठा होने के बाद भी उन्होंने आज तक अपना घर नहीं छोड़ा है और वहां रहने वाले मुट्ठी भर पंडित हिंदुओं में वे शामिल हैं। क्या गजब का संयोग है कि बिटिया ने एक पत्रकार आशीष को ही अपना जीवन साथी चुना। जोकि पत्रकारों के परिवार से आता है। उन्होंने कश्मीरी पंडित पत्रकार रोशन लाल शर्मा के यहां रिश्ता करना बेहतर समझा जोकि खुद भी उनकी ही तरह सीधे से हैं। शादी में मेहमानों को ठहरने के प्रबंध किए गए थे। मगर सच कहता हूं कि चाचा होने के नाते खुद वहां मेहमान की तरह पहुंचना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। 

अतः अपने इंतजाम बहादुर नीरज शर्मा से संपर्क किया तो उसने कहा कि चाचा आप सपरिवार पहुंचे सब कुछ मुझ पर छोड़ दो। वहां पहुंचने पर पता चला कि कुछ सचिव स्तर के अफसरों की मेहमानबाजी भी वहीं कर रहा था। वैसे भी वह कुछ कामों में माहिर है। उसने तो हम लोगों को कुछ ऐसे मनोरंजन स्थलों की सैर करवाई जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। व्यासजी की खासियत यह है कि उनकी पसंद सबसे अलग है व उनके हर कामकाज में विशिष्टता है। वे पैसे या हैसियत का प्रदर्शन करने के बजाए सौम्यता, शालीनता व अपनत्व भरे व्यवहार में विश्वास करते हैं। उनकी व्यवस्था तो सबसे अलग हर एक ऐसी नई पहचान लिए होती है जोकि यादगार बन जाती है।

मुझे यह जानकार बेहद आश्चर्य हुआ कि स्थान से लेकर सजावट, व्यंजनो व विभिन्न कार्यक्रमों की सारी रूप रेखा खुद श्रुति व आशीष ने तैयार की थी। तब समझ में आया कि जब शादी के पहले अक्सर विधि जयपुर जाती थी तो उस दौरान यह तैयारियां की जा रही थी। व्यंजन कितने स्वादिष्ट रहे होंगे इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि श्रुति की एक विदेशी सहेली को मैंने यह कहते सुना कि अगर मुझे अपने देश में भी इतना ही स्वादिष्ट खाना मिले तो मैं ताउम्र शाकाहारी बन जाऊं!

शादी के एक दिन पहले मेहंदी की रस्म वाले दिन राजस्थानी व कश्मीरी भोजन का समन्वय देखा। कश्मीरी पकौड़ो से लेकर कुल्हड में परोसे गए कहवे समेत तमाम ऐसी चीजे थी जोकि दो संस्कृतियों के मिलन को दर्शा रही थी। चूंकि यह परिवारिक समारोह था अतः बहुत ही चुनिंदा लोगों को आमंत्रित किया गया था। डा वेद प्रताप वैदिक, राम बहादुर राय, जगदीश कातिल से लेकर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, सीपी जोशी व श्रुति के करीब दर्जन भर विदेशी मित्र आमंत्रित किए गए। 

मैंने पहली बार राजस्थानी अंदाज में मेहंदी की रस्म होती देखी। दिल्ली में तो मेहंदी की रस्म का सीधा मतलब काकटेल पार्टी होती है। नीरज शर्मा ने तो कई बार कहा कि अपने भाईसाहब विदेशी मेहमानो के साथ ज्यादती कर रहे हैं। बिना काकटेल के कैसी पार्टी? मगर व्यासजी ने हड़का दिया। वहां महिलाएं व लड़कियों के हाथों में बहुत सुंदर मेहंदी लगाई जा रही थी। इसके अलावा चूंडी कंगन, बिंदिया, नेल पालिश के भी स्थल सजे थे। एक कोने मे विश्व प्रसिद्ध जयपुरी जूतियों का स्टाल था। ऐसा लग रहा था कि मानों हम लोग करवा चौथ वाले दिन हनुमान मंदिर में लगने वाले बाजार में पहुंच गए हो। सारा सामान इतना अच्छा था कि देर रात खाना शुरू होने तक वहां लोग आकर अपनी मनपसंद की चीजे छांटते रहे। मैंने पहली बार लोगों को इतना खुश होकर अपनी इच्छा से जूतियां ले जाते हुए देखा। 

जनसत्ता के अपने पूर्व साथी पत्रकार रियाजुद्दीन शेख ने जूतियो के स्थल की जिम्मेदारी संभाली हुई थी। वे जयपुर की 250 साल पुरानी दुकान से जूतियां लाए थे जोकि कभी राजा महाराजाओं को व आज वसुंधरा राजे सरीखी हस्तियो को जूती पहनाते आए हैं। शाम को ममता शर्मा के बन्ना-बन्नी और शास्त्रीय संगीत व संपत सरल के व्यंग पाठ ने तो समां बांध कर रख दिया। दिल्ली में ऐसे मौको पर होने वाले डीजे के शोर की तुलना में यह कार्यक्रम बेहद शालीन मनोरंजन प्रस्तुत करने वाला था। 

शादी का स्थल तो एकदम अनोखा था। ऐतिहासिक कनक वृंदावन में सारा प्रबंध था जो कि पहाड़ों से घिरा हुआ बेहद सुंदर नजारा प्रस्तुत कर रहा था। वहां तमाम केंद्रों से आए नया इंडिया परिवार के सदस्यों से आत्मीय मुलाकात व रात को आने वाले विशिष्ट मेहमानों से बातचीत करने के बाद महसूस हुआ कि इतने वर्षों से लिखा जाना व्यर्थ नहीं गया। लोग ‘नया इंडिया’ तो इतना ज्यादा पसंद करते हैं कि उन्होंने तमाम कॉलम तक संजो कर रखे हुए थे। 

लगता है कि विधि ने बचपन में कढाई में हलवा खाया होगा। तभी दिन में शादी का कार्यक्रम पूरा होने के बाद जैसे ही खाना-पीना समाप्त हुआ वहां जबरदस्त बारिश आई। पहले सारा कार्यक्रम खुले में था। शाम को भी खुले में रिसेप्शन का इंतजात था। मगर रियाज-विधान ने जिस तरह से चंद घंटों के अंदर वहां तंबू गड़वाएं उसे देखकर लगा कि वह इतना बड़ा हो गया है कि अब अपने स्तर पर भी तमाम फैसले व प्रबंध करने में सक्षम हो चुका है। 

भाभीजी का पूजा-पाठ फिर काम आया जब रात्रि भोज समाप्त होते ही पुनः तेज बारिश हुई। शुभ कार्यो में बारिश होना बहुत शुभ माना जाता है। बिना आडंबर, सादगी में विशिष्टता की झलक देने वाले इस आयोजन मे जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वह ग्यारसी लाल व तिवारी की मौजूदगी थी जोकि दशको पहले कभी व्यासजी से जुड़े थे मगर व्यासजी उन्हें नहीं भूले। वैसे संबंधों व रिश्तो को संजोग तो व्यासजी से सीखना चाहिए जिन्होंने इंसान तो क्या अपने उस स्कूटर तक को भीलवाड़ा में संभाल कर रखा हुआ है जिस पर वे दिल्ली आने के शुरुआती दौर मे सवारी किया करते थे।

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