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अपने नेता तो गेंडे की खाल वाले!

विवेक सक्सेना
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दिल्ली आने के बाद दशकों के अपने प्रयास और अनुभव से मैंने जो सीखा है वह यह है कि अक्सर चीजें व व्यक्ति वैसे नहीं होते जैसे कि हमें दिखाई पड़ते हैं। जब दिल्ली प्रेस में था तो एक सहकर्मी बीमार पड़ गया। उसके घर वालों ने एडवांस के लिए आवेदन किया। संयोग से संपादक/मालिक की निजी सचिव व महाप्रबंधक दोनों से ही मेरी मित्रता थी। उन्होंने उसके प्रार्थनापत्र पर संपादक द्वारा लिखी टिप्पणी मुझे दिखायी तो मैं हतप्रभ रह गया।

इस पर उन्होंने लिखा था कि उसके बचने व वापस दफ्तर आने की कितनी संभावना है? उसी के अनुसार लोन दिया जाए। जब जनसत्ता में था तो मेरे एक परिचित स्टिंगर की बमकांड में मौत हेा गई। एक वरिष्ठ पत्रकार ने मेरे घर पर मीटिंग रखी। तब वह काफी बीमार चल रहा था। उन्होंने वहां उसके दुनिया में न रहने की खबर देते हुए कहा कि हम लोग बहुत दुखी है व उसे दूर करने के लिए कुछ करना चाहिए। उन्होंने एक पत्रकार को बोतल लाने व खाने का इंतजाम करने भेज दिया।

पेग लेते हुए उन्होंने बताया कि संपादकजी दिल्ली के बाहर है। उनके वापस आने पर ही उसके निधन की घोषणा की जाएगी। बाद में उन्होंने तमाम पत्रकारों को उसकी याद में पैसा इकट्ठा करने व उसके परिवार को डीडीए का फ्लैट दिलवाने के काम में लगा दिया। मैंने जब यह बात व्यासजी को बतायी तो उन्होंने मुझे डांटते हुए इस काम से दूर रहने को कहा। उनका कहना था कि जिन भाई—भाभियों ने उसे कभी रात को खाना तक नहीं खिलाया व जिन के यहां वह रात को रसोईघर में सोता था, उसके जाने के बाद तुम उन्हें फ्लैट देकर उनके बीच डंडे चलवाना चाहते हो।  उनकी बात में दम था अतः मैंने उसके बाद इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। इसलिए मुझे लगता है कि इस देश में हर व्यक्ति अपने पद, मजबूरी, जरुरत या हालत के हिसाब से ही अगला कदम उठाता है।

इस देश में पिछले कुछ दिनों से लोग कठुआ और उन्नाव की घटनाओं को लेकर बेहद परेशान है। कठुआ में एक आठ वर्षीय मुस्लिम बालिका से सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई व उन्नाव में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई युवती के पिता की पुलिस हिरासत में हत्या होने का आरोप है। दोनों ही जगह सबसे बड़ी समानता यह है कि वहां राजनीतिक दल सक्रिय हो गए है व अपनी-अपनी तरह से बयान दे रहे हैं। उत्तरप्रदेश में भाजपा के विधायक पर ऐसे तमाम इल्जाम है तो एक विधायक ने यह सवाल पूछा है कि भला तीन बच्चों की मां से कौन बलात्कार करेगा?

कठुआ में आरोपियों को बचाने के लिए सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा व वकील एकजुट हुए। अब सरकार में शामिल दो मंत्रियों ने अपने इस्तीफे दे दिए हैं। ऐसा लगता है कि दोनों ही घटनाओं में राजनीतिक दलों में किसी का संवेदना से कुछ लेना देना नहीं और वे अपने फायदे के हिसाब से कदम उठा रहे है।

आगे बढ़ने के पहले मैं बता दूं कि मैं अब इस तरह की घटनाओं को देख सुन कर विचलित नहीं होता हू क्योंकि मुझे लगता है कि इन्हें लेकर चाहे कितने ही हंगामे क्यों न किया जाए सत्तारुढ़ दल या किसी भी राजनीतिक दल पर कोई असर नहीं पड़ता है। वैसे भी हमारे नेताओं की खाल गेंडे की खाल से भी मोटी होती है। वे हर घटना को अपने फायदे या नुकसान के हिसाब से देखते हैं।

मैं किसी दल के प्रति कोई झुकाव नहीं रखता हूं व मेरा मानना है कि दल व नेता तो समोसे की तरह होते हैं जिनकी महक व आकार भले ही अलग होता है मगर सभी मैदा व आलू व घी से तैयार करते हैं व सभी को एक जैसे ही हानि लाभ पहुंचाते हैं। मैंने इस तरह की घटनाओं को बार-बार देखा, अनुभव किया है और नेताओं के प्रतिक्रियाओं से खूब दो चार हुआ हूं।

आज सत्तारुढ़ दल के नेता जो कर रहे हें जम्मू के लोकसभा सांसद व प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री डा. जिंतेन्द्र सिंह जिस तरह से एक बच्ची के बलात्कार व हत्या पर चुप्पी साध गए है इसमें कुछ भी नहीं है। सत्ता तो विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह होती है जिस पर बैठते ही व्यक्ति की भाषा, हावभाव व सोच ही बदल जाती है। सत्ता भी पारस पत्थर नहीं  होती जिसके संपर्क में आने पर व्यक्ति लोहे को सोना बना देता है बल्कि वह तो लिटमस कागज की तरह होती है जो कि यह बताता है कि सामने वाला व्यक्ति व घटना उसके माफिक है या नहीं और वह उसी के अनुसार काम करता है।

इस देश के पहले व सबसे चर्चित प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरु के कार्यकाल में ही देश का पहला सरकारी खरीद कांड जीप घोटाला हुआ था जिसमें ब्रिटेन स्थित भारतीय उच्चायुक्त वी कृष्णामूर्ति लिप्त पाए गए थे। इस मामले को लेकर देश में हंगामा हुआ। जांच समिति बैठी। उसने उन्हें दोषी पाया मगर नेहरु ने उनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर रहा उलटे उन्हे अपना रक्षा मंत्री बना लिया। बाद में उन्हीं की गलतियों के कारण भारत-चीन युद्ध हुआ जिसमें देश को मुंह की खानी पड़ी और वह नेहरु की मौत के पीछे का सदमा भी था। उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ।

इंदिरा गांधी के बारे में तो विपक्षी कहते थे कि भ्रष्टाचार की बेल उनके घर में ही लगी है। उनके कार्यकाल में मेरठ में बलात्कार कांड हुआ। राजीव गांधी ने 1984 के कत्लेआम के बाद कहा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। देवीलाल ने कहा कि पूंजीपतियों को लूटना चाहिए। उत्तरप्रदेश में बलात्कार बढ़ने पर मुलायम सिंह यादव ने कहा कि बच्चे है गलती हो जाती है। कल्याण सिंह ने मंत्री रहते राजस्थान में सती प्रथा का समर्थन किया। जब देश को हिला देने वाला निर्भया कांड हुआ तो कांग्रेस की सरकार थी मगर कांग्रेसी कहां थे? एक महिला पत्रकार के बलात्कार की हत्या के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि लड़कियों को रात में अकेले नहीं निकलना चाहिए। अन्ना की उंगली पकड़कर राजनीति का तंदूर गरम करने वाले केजरीवाल न पिछले दिनों उनके अनशन पर बैठे और न उनका हाल पूछने गए।

जब 1982 में असम में भारी हिंसा के बीच विधानसभा चुनाव हुए तो पहले से ही मीडिया उस दौरान भारी हिंसा की बात कर रहा था। मगर इंदिरा गांधी ने संवैधानिक मजबूरी बताते हुए चुनाव कराना जरुरी बताया। इसमें नेल्ली जिले के सैकड़ों मासूम समेत दर्जनों लोग मारे गए। हर मीडिया में इसकी खबर छपी पर सरकार टस से मस नहीं हुई।

उन्होंने रेलवे का प्लेटफार्म व पटना का गांधी मैदान गिरवी रखने वाले अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाया व उसे बरी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज बहरुल इस्लाम को वे असम से लोकसभा में लायी। राजीव गांधी ने आपरेशन ब्लू स्टार के पहले भिंडरवाला को संत कहा। जब वे प्रधानमंत्री थे तो अपनी अमरीका यात्रा के दौरान नशीली दवाओं की तस्करी में बंद मोहम्मद युनूस के बेटे की जेल से सजा माफ करवा कर छुड़वा लाए। आज हमारे नेता व दल जो कुछ कह-कर रहे हैं उसे देखकर जरा भी अचरज नहीं होना चाहिए।

यह वह देश है जहां भाजपा और पीडीपी सत्ता के लिए जम्मू कश्मीर में साझा सरकार बना सकती है। उत्तरप्रदेश व देश की सत्ता हथियाने के लिए सांप व छूंछदर कहे जाने वाले सपा और बसपा साथ आ सकते हैं। लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले का मामला गरम करने वाले नीतीश कुमार उनके साथ आते हैं और फिर भाजपा के साथ होकर उनकी बुराई करने लगते हैं। सत्ता तो निरंकुश होती है जो अपने पर हावी व्यक्ति को निरंकुश बना देती है।

आज की तारीख में कोई भी नेता किसी भी दल में जा सकता है क्योंकि मूलतः किसी भी दल में कोई बड़ा अंतर नहीं है। इसलिए इस तरह की घटनाओं पर आश्चर्य कैसा यह तो महाभारत और रामायण काल से होती आ रही है। ध्यान रहे कि कौरव व रावण दोनों ही मरने के बाद स्वर्ग गए थे।

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