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रसगुल्ला हुआ मानो कश्मीर!

विवेक सक्सेना
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कुछ समय पहले मेरे एक मित्र ने जोकि केंद्र सरकार के उद्योग मंत्रालय के बड़े अफसर है एक बहुत सटीक उदाहरण देते हुए कहा कि मैं राज्य सरकारों के साथ विभिन्न कार्यक्रमों और परियोजनाओं को लेकर डील करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि जब दो राज्य या केंद्र व राज्य सरकार किसी मुद्दे को लेकर उलझते हैं तो उनका व्यवहार बिलकुल भारत व पाकिस्तान की तरह हो जाता है। दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मनों की तरह बर्ताव करते हैं। 

हाल में जब रसगुल्ले का जीआई टैग पश्चिम बंगाल को मिलने की खबर आई तो उनकी यह बात एकदम सही साबित हो गई क्योंकि पिछले दो सालों में रसगुल्ला-पश्चिम बंगाल व ओडिसा के बीच कश्मीर बन गया था। दोनों ही उसे अपना बता रहे थे व उस पर दावा ठोंक रहे थे। असल में यह विवाद तब खड़ा हुआ जबकि पश्चिम बंगाल ने रसगुल्ले को भौगोलिक पहचान देने के लिए जियोग्राफिकल इंडीकेशन टैग के लिए आवेदन किया। असल में विश्व व्यापार संगठन ने 1999 में एक कानून जियोग्राफिकल इंडीकेशंस ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट) बनाया था। 

इसके तहत किसी स्थान की विशिष्ट वस्तुओं को उनके गुणों व पहचान के कारण उसका पेटेंट किया जाता है जिससे कि उस स्थान का वह सामान तैयार करने वाले की विशिष्ट पहचान बनती है और उसे दुनिया में अच्छे दामों पर आसानी से बेच पाना सरल हो जाता है। हमारे देश में अब तक 533 चीजों के लिए जीआई टैग हासिल किया जा चुका हैं। इनमें दार्जिलिंग की चाय, सलेम की चंदेरी साड़ी, सोलापुर की चादर, गोवा की देसी शराब फैनी, मैसूर की सिल्क साडियां, कांगड़ा की चाय, कूल्लू की शाल, मैसूर के चंदन के उत्पाद, इंदौर के चमड़े के खिलौने, बासमती चावल, लखनऊ का चिकन का काम, बीकानेर की भूजिया से लेकर कानपुर में बनने वाली घोड़े की काठी तक शामिल है। 

रसगुल्ले का विवाद तब शुरू हुआ जबकि 2015 में पश्चिम बंगाल ने इसे जीआई टैग प्रदान करने के लिए आवेदन किया। उसका दावा था कि इसे 1868 में वहां के एक हलवाई नवीन चंद दास ने बनाया था। वहीं उसका अविष्कारक था। इस राज्य ने अपने बेगलार रसोगुल्ला के लिए यह टैग मांगा। इसका ओडिया ने जबरदस्त विरोध करते हुए कहा कि रसगुल्ला तो मूलतः उसकी खोज है। वह तो 13वीं शताब्दी में ही बना लिया गया था। इस राज्य का दावा था कि भगवान जगन्नाथ को यह बेहद प्रिय था और एक बार जब वे भ्रमण के लिए काफी दिनों तक घर से बाहर रहे तो उन्होंने लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें रसगुल्ला खिलाया। 

ओडिसा के एक मंत्री ने तो प्रमाण हासिल करने के लिए तीन समितियां तक गठित कर दी। राज्य के संस्कृति विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय इस पर अपना दावा गठित करने की कोशिश में जुट गए। भुवनेश्वर में रसगुल्ले को लेकर एक प्रदर्शनी आयोजित की गई। रेत के जाने माने कलाकार सुदर्शन पटनायक ने तो पूरी के बीच पर निलादेरी बीजे बना दी जिसमें भगवान जगन्नाथ को लक्ष्मीजी को सरगुल्ला देते हुए दिखाया गया था। इतना ही नहीं निलादेरी बीजे दिवस को रसगुल्ला दिवस घोषित कर दिया गया। 

हालांकि पश्चिम बंगाल ने ओडिसा के दावे का खंडन करते हुए कहा कि भगवान जगन्नाथ को जो 56 भोग चढ़ाया जाता है उसमें रसगुल्ला शामिल ही नहीं होता है। वैसे भी रसगुल्ला छेने से तैयार किया जाता है व छेना दूध को फाड़ कर तैयार किया जाता है। हिंदू धर्म में फटे हुए दूध को अशुभ माना जाता है अतः इसका भगवान के लिए उपयोग किए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। इसके बावजूद ओडिसा ने रसगुल्ले पर अपना दावा हासिल करने के लिए सोशल कैंपेन छेड़ दिया। वहां के जाने-माने अखबार ‘संवाद’ व एफएम रेडियो ने उसके समर्थन में अभियान चलाना शुरू कर दिया मगर जो काम करना चाहिए था वो नहीं किया। 

इस राज्य ने उन लोगों के सामने कोई दावा पेश नहीं किया जिन्हें यह टैग प्रदान करना था। अंततः इस संगठन ने रसगुल्ले पर पश्चिम बंगाल के दावे को मान लिया क्योंकि किसी और ने उस पर दावा ही नही किया था। अब ओडिसा सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि हम इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। वहां अपना दावा पेश करेंगे। मगर पहले कुछ क्यों नहीं किया, इस पर सब चुप्पी साधे जा रहे हैं। 

वैसे पश्चिम बंगाल व ओडिसा के रसगुल्ले में काफी अंतर है। जहां बंगाली रसगुल्ला एकदम सफेद रंग का होता है वहीं ओडिसा रसगुल्ला भूरे रंग का होता है। उनका दावा है कि उडिया के कुछ रसोइए काफी पहले पश्चिम बंगाल में बंगालियों के यहां नौकरी करते थे। उनसे ही बंगालियो ने रसगुल्ला बनाना सीखा और अब इसे अपनी खोज बता रहे हैं। 

वैसे सच्चाई यह है कि रसगुल्ला छेने (पनीर) से बनता है और वह भारत की खोज नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि पुर्तगाली अपने साथ पनीर लेकर भारत आए थे वे उसे दूध फाड कर बनाते थे। हमने उनसे ही पनीर बनाना सीखा। इसलिए हमारी किसी मिठाई या धर्मग्रंथ में पनीर के इस्तेमाल का जिक्र नहीं मिलता है। सबसे पहले नवीन चंद्र दास ने कलकत्ता में इसे बनाया और फिर उनकी पीढियो ने इसे दुनिया के तमाम हिस्सो तक पहुंचाया। 

उनके बेटे किशन चंद्र दास ने 1930 में वैक्यूम पैकिंग करना शुरू की जिससे यह लंबी अवधि तक बिना खराब हुए यह उपयोग करने लायक बना। आज उनकी केसी दास एंड कंपनी इसको बेच रही है। बंगालियो का मछली की तरह ही रसगुल्ले से काफी लगाव रहता आया है। बताते है कि टैगोर को भी रसगुल्ला बहुत पसंद था। उनके एक परिचित डाक्टर पशुपति भट्टाचार्य एक बार उनके घर जा रहे थे तो उन्होंने रसगुल्ला खरीदने की सोची। संयोग से उस दिन केसी दास की दुकान पर रसगुल्ले खत्म हो गए थे। उन्होंने कहीं और से रसगुल्ले खरीदे। जब भट्टाचार्य ने गुरूदेव टैगोर को उन्हें दिया तो वे उसे चखते ही बोले कि क्या यह केसी दास के यहां से नहीं लिया था। 

कांग्रेंस अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को भी रसगुल्ला काफी पसंद था। वैसे उनकी पसंद कुछ खास हुआ करती थी जिसे लेकर तमाम किस्से प्रचलित है। एक बार जब कुछ पत्रकार उनके कमरे में मिलने गए तो नेपाली पत्रकार युवराज घिमरे को देखकर वे मुस्कराने लगे और उसका हाथ पकड़ कर अपने पास खीच लिया। यह देखकर वहां मौजूद एक महिला पत्रकार ने कहा कि उसे देखकर चचा के चेहरे पर वही भाव आए जोकि रसगुल्ला देखकर बंगालियो के चेहरे पर आते हैं।

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