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आरटीआई से भी खोजी पत्रकारिता!

श्या‍म लाल यादव ने मेरे सामने जनसत्ता से अपनी पत्रकारिता शुरू की थी। वह प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में 1990 के दशक में आया था। स्वभाव से बेहद विनम्र और अपने वरिष्ठो की इज्जत करने वाला मुस्कुराता हुआ चेहरा। इस व्यक्तित्व की खासियत यह कि वह पड़ोस में रहने वाले उस किशोर की तरह लगता था जो कि अपने से बुजुर्ग लोगों को देखते ही उनका मुस्कुराते हुए अभिवादन करता था। जनसत्ता के बाद वह अमर उजाला में गया फिर हिंदी इंडिया टुडे में और फिर इंडियन एक्सप्रेस में। वहां उसने पत्रकारिता में एक नई विधा की शुरुआत की जिसे उसने खुद आरटीआई जर्नलिज्म नाम दिया। 

वैसे इंडियन एक्सप्रेस ने ही भारत में कभी खोजी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। भागलपुर का आंख फोड़वा कांड रहा हो या अश्विनी सरीन द्वारा भैंस से भी कम कीमत पर कमला का खरीदना अथवा जेल पर रिपोर्टिंग करने के लिए झुठा झगड़ा फसाद करके पुलिस द्वारा बंद कर दिए जाने पर तिहाड़ जाना और वहां रह कर जेल के हालात की रिपोर्टिंग करना। मगर श्याम लाल ने तो नया कमाल कर दिखाया। उसने साबित कर दिया कि जो जानकारी 10 रुपए के पोस्टल आर्डर से हासिल की जा सकती है उसके लिए कमला खरीदने या जेल जाने की जरूरत नहीं है। उसने आरटीआई के जरिए तमाम जानकारियां हासिल की और उनके आधार पर ऐसी रिपोर्ट तैयार की जिनका सरकार खंडन ही नहीं कर सकती थी क्योंकि यह सब उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर ही आधारित होती थी।

श्याम लाल की प्रगति बेहद उल्लेखनीय रही। उसने 12वीं तक ही अंग्रेंजी विषय के रूप में पढ़ी थी। बाद में स्नातक पत्रकारिता की पढ़ाई की। हिंदी इंडिया टूडे में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार नौकरी की शुरुआत की। वहां डेस्क पर रहते हुए दोनों भाषाओं में काम किया। अंग्रेंजी पर हाथ साफ किया। परिणाम यह निकाला कि वह राजकमल झा और उन्नी राजन शंकर की नजरों में आ गया जोकि उसे इंडियन एक्सप्रेस में ले आए। उन्होंने उसका आत्मविश्वास जगाने के लिए कहा कि तुम सारा ध्यान खबर पर दो और भाषा कि चिंता मत करो। हालांकि तब तक अंग्रेंजी भाषा पर उसका पूरा अधिकार हो चुका था। 

सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इंडियन एक्सप्रेस में उसके सहयोगियों या संपादकों ने उसे बाहरी आदमी नहीं समझा। यह बहुत बड़ी बात थी। मेरा अनुभव रहा है कि हिंदू समाज के बाद अगर कहीं सबसे ज्यादा जाति व्यवस्था हावी है तो वह हमारे देश की पत्रकारिता में है। अंग्रेंजी के तमाम पत्रकार गर्व से कहते हैं कि उन्हें हिंदी नहीं आती। अंग्रेंजी अखबार का संपादक शायद ही कभी हिंदी का अखबार पढ़ता हो। मगर आप अंग्रेंजी का ज्ञान रखे बिना हिंदी पत्रकारिता में सफल नहीं हो सकते हैं क्योंकि अधिकांश प्रेस रिलीज अंग्रेंजी में ही आती है। 

हम हिंदी वाले सबसे पहले अंग्रेंजी का अखबार खोलते हैं। यह जानने के लिए कि हमसे कौन-सी खबर छूट गई। वैसे मैंने देखा कि जब कोई अंग्रेंजी का पत्रकार हिंदी पत्रकारिता में आता है तो हम उसे बड़े सम्मान की दृष्टि से देखते हैं मगर जब कोई हिंदी पत्रकार अंग्रेंजी में लिखता है तो उसकी गलतियां निकालने अथवा उसका उपहास उड़ाने की कोशिश करते हैं। 

इसकी खास वजह हम हिंदी वालों में हीन भावना का कूट-कूट कर भरा होना है। मुझे याद है कि जब इंडियन एक्सप्रेस में हड़ताल हुई थी तो एक बार प्रभाषजी ने हम लोगों से कहा था कि हमारे व एक्सप्रेस के संपादक के वेतन में कितना अंतर है। जब हम लोग इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर के साथ कहीं बाहर रिपोर्टिंग पर जाते थे तो वह बिसलेरी की बोतल खरीद कर पानी पीता था व हम लोग किसी रेस्टोरेंट या नेता के यहां अपनी प्यास बुझाते थे। 

हालांकि शेखर गुप्ता के समय में एक अच्छी परंपरा यह शुरू हुई कि उन्होंने जनसत्ता की तमाम अच्छी खबरों को इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्टर के नाम के साथ छापना शुरू कर दिया।

श्याम लाल यादव ने तो कमाल कर दिखाया। उसने यह साबित कर दिया कि किसी पत्रकार के लिए आरटीआई कितना बड़ा हथियार साबित हो सकता है। उसने इसके जरिए ऐसी सूचनाएं हासिल कर खुलासे किए जोकि महीनों की दौड़-भाग व खोजी पत्रकारिता के जरिए भी हासिल नहीं किए जा सकते थे। उसने आरटीआई के जरिए मनमोहन मंत्रिमंडल के मंत्रियों की विदेश यात्राओं के बारे में जानकारी हासिल करने से लेकर तमाम सरकारी योजनाओं में पनप रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया। बताते है कि उसने अपनी पुस्तक में युवा पत्रकारों को सलाह दी है कि वे कैसे आरटीआई के जरिए तमाम सूचनाएं हासिल करके आम लोगों तक पहुंचा सकते हैं। 

सच कहे तो श्याम लाल यादव ने आरटीआई के जरिए खोजी पत्रकारिता की परिभाषा ही बदल डाली। दीवानों की तरह काम करना उसका शगल है। आम पत्रकारों की तरह वह भी प्रेस कलब आता है मगर न तो धूम्रपान करता है और न ही शराब पीता है। मीट मच्छी खाना तो बहुत दूर की बात है। पिछले आठ सालों में उसने 6000 आरटीआई फाइल करके तमाम जानकारियां हासिल की। इनमें राष्ट्रपति भवन से लेकर जिला स्तर तक के कार्यालयों से हासिल की गई जानकारी हासिल है। उसे नेताओं, अफसरों से मिलना जुलना पसंद है। उसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह संघ से संबद्ध रख चुका है। बावजूद इसके उन्होने संघ के बारे में दांतों तले दबा लेने वाली खबरें दी। भाजपा को भी नहीं बख्शा। मतलब उसकी रिपोर्टिंग में कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वह संघ की पृष्ठभूमि से आता है। 

उसे पत्रकारिता व आरटीआई के क्षेत्र में तमाम पुरुस्कार मिले। उसे यूनेस्को द्वारा विश्व की 28 सबसे खोजी पत्रकारिता करने वाली रिपोर्ट लिखने के लिए पुरुस्कृत किया गया। उसने इस संबंध में तमाम अंर्तराष्ट्रीय संगठन से सम्मान हासिल किए। इनकी सूची इतनी लंबी है कि एक का जिक्र कर पाना संभव नहीं है। हाल ही में वह अपनी पुस्तक ‘जर्नलिज्म थ्रू आरटीआईः इनफोर्मेशन, इंनवेस्टीगेशन इंपैक्ट’ के कारण सुर्खियों में है। 

यह पुस्तक मैंने पढ़ना तो दूर रहा उसे देखा तक नहीं है क्योंकि रिटायर होने के बाद पौने छह सौ रुपए कीमत वाली इस पुस्तक को खरीद पाना मेरे लिए संभव नहीं है। अपनी जिदंगी में पहली बार मैं किसी पुस्तक को पढ़े बिना ही उसके लेखक के बारे में लिख रहा हूं। मेरा मानना है कि मैं श्यालाल की समीक्षा कर रहा हूं उसकी किताब की नहीं क्योंकि जो उसे जानते हैं उन्हें पता है कि उसने उसमें क्या लिखा होगा। वैसे श्याम लाल को एक सुझाव है क्यों न प्रकाशकों को भी आरटीआई के दायरे में लाया जाए ताकि महज 10 रुपए खर्च करके हम भी उनसे किसी किताब में संजोई जानकारी हासिल कर सके।

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