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गर्मियां हमेशा कष्टदायक रहीं

विवेक सक्सेना
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अभी गर्मियों की शुरुआत हुई नहीं कि मुझे बेचैनी होने लगी। आज घर, कार से लेकर जिन जगहों पर मैं जाता हूं वे सभी वातानुकूलित है इसके बावजूद गर्मी से डर लगने लगा है। मैं भूल चुका हूं कि एक वह भी समय था जबकि कानपुर की धुल व अंधड़ भरी दोपहर में ऊंचे तापमान के बीच हम लोग दूसरों के घरों से अमरूद सरीखे फल तोड़ते थे। जब बड़ा हुआ और साईकिल मिली तो तेज गर्मी व उल्टी हवा में साईकिल चलाना बेहद मुश्किल हो जाता था पर साईकिल चलाते थे। दिल्ली आने तक घर में न कूलर था और न ही कार। कार खरीदने के दशक बाद एसी कार खरीदी। 

ऐसे में लगता है कि जो व्यक्ति इतने गर्म राज्य का नागरिक रहा हो व जिसकी आधी जिदंगी जबरदस्त गर्मी में बीती है वो इससे इतना ज्यादा घबराता है तो जो लोग ठंडे देशों में जीते है उनकी क्या हालत होती होगी? अरब देशों की 50-55 सेंटीग्रेड गर्मी में ज्यादातर अहम प्रोजेक्टो पर यूरोप सरीखे ठंडे देशों से आए लोग काम कर रहे हैं। पिछले दिनों अंग्रेजों पर लिखी एक पुस्तक पढ़ने को मिली। उसे पढ़कर महसूस हुआ कि उनके बारे में जो कहा जाता है कि महारानी का सूर्य कभी अस्त नहीं होता है, उसकी वजह यह रही कि ठंडे देशों में पैसे होने के बावजूद उन्होंने गर्म से गर्म देश में काम करने को अपनी खुशकिस्मती माना। 

ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म होने के बाद ज्यादातर जिन लोगों को ब्रिटिश सरकार का सबसे बड़ा अफसर व प्रतिनिधि बनाकर भारत भेजा जाता था वे गवर्नर-जनरल कहलाते थे। बाद में उन्हें वायसराय कहा जाने लगा। उनकी बीवियो को वाइसरीन कहते थे। ये सभी लोग ज्यादातर इंग्लैंड व यूरोप के शाही परिवार के होते थे और एक बहुत अहम पद व वेतन के लालच में यहां आते थे। उनके साथ उनकी पत्नी भी होती थी। वे यूरोप के उस मौसम में रहने के आदि हो चुके होते थे जहां अक्सर बर्फ पड़ती थी। 

सच कहे तो उनमें व गुलामी के दौर में खेती के लिए मारीशस ले जाए गए भारतीय गरीब किसानों व मजदूरों को जिस तरह के मौसम का सामना करना पड़ता था उसमें कोई खास अंतर नहीं होता था। पहले भारत की राजधानी कलकत्ता थी। अंग्रेंज पानी के जहाज से मुंबई आते व फिर वहां से कलकत्ता पहुंचते जहां जबरदस्त गर्मी पड़ने के साथ ही धुल भरी आंधियां चलती थी। कलकत्ता में गवर्नर जनरल को जिस भवन में ठहराया जाता था उसकी दुर्दशा देखते ही बनती थी। 

उन दिनों देश में बिजली नहीं होती थी। घर के दरवाजे व खिड़कियां ठीक से बंद नहीं होती थी। एक अंग्रेंज ने तो यहां तक कहा कि भारत में जिंदगी सूरज के समय के हिसाब से चलती है। उन दिनों सुबह साढ़े सात बजे के बाद से ही लू चलने लगती थी व घर के बाहर निकलना संभव नहीं होता था। खिड़कियों और दरवाजों को सुबह ही बंद कर दिया जाता व शाम को सूरज ढलने के बाद ही उन्हें खोला जाता। रविवार को चर्च जाने वाले अंग्रेंज सारा दिन खुद को वहीं कैद करके रखते थे ताकि लू न लग जाए।

अंग्रेंजो ने शरबत का नाम व उपयोग यहीं सीखा। घरों में बिजली न होने के कारण पंखें नहीं होते थे। मुगलों की देखा-देखी अंग्रेंजों ने छत से लटकने वाले पंखे लगवाए जिन्हें पहले कमरे के अंदर बैठा व बाद में बाहर बैठा मजूदर रस्सी से खींचता था। वह अक्सर रस्सी को पैर से बांध लेता था ताकि थक न जाए। वाइसरीन लेंडी कैनिंग को इन मजदूरों पर काफी दया आती थी अतः वह मजदूरो की ड्यूटी बदलती रहती थी। 

एक बार उसने बिना मजदूर द्वारा चलाए गए पंखे में सोना चाहा मगर उसे नींद नहीं आई। जब वाइसरीन लेडी एल्गिन एक बार सो रही थी तो बड़े जोर का अंधड़ आया। पलंग के रखा फानूस गिर गया व शीशा टूट गया। उन्हें डर लगा कि कहीं उसकी जलती लौ से घर में आग न लग जाए। उन्होंने पंखा रूकवाने के लिए जोर-जोर से घंटी बजाना शुरू कर दिया। मजदूर यह समझा कि उन्हें गर्मी लग रही है अतः उसने तेजी से पंखा चलाना शुरू कर दिया था। 

उन दिनों फ्लश, टायलेट नहीं होते थे। शौचालय में बल्टियां रखी जाती थी जिनके भर जाने पर एक जाति विशेष के लोग उन्हें साफ करके रख देते थे। नहाने के लिए उन्हें लकड़ी के बने हरे टबों का इस्तेमाल करना पड़ता था। राजभवन में 1870 में बिजली आई व 1872 में पीने के पानी की लाइन बिछी। तब गवर्नर हाउस में संगमरर की जगह सीपियो को पीसकर उनका पलस्तर करवाया गया था ताकि वे उसके जैसा दिखे। इस भवन में तो अतिथियों के लिए महज दो कमरे थे व रसोईघर खाना खाने वाली जगह से 200 मीटर की दूरी पर था। एक वायसराय ने तो यहां तक कहा था कि यहां घर जैसी कोई चीज नहीं है। 

अंग्रेंजो ने 1864 में शिमला जाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही वे गर्मी से बचने के लिए मसूरी, नैनीताल, देहरादून व दार्जिलिंग जाने लगे। उन्हें शिमला जाने में बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि अंबाला तक ही रेल जाती थी। वे कालका तक गाड़ी में जाते व बैलगाड़ी या पालकी से 57 मील दूर स्थित शिमला जाने में तीन दिन लगते थे जबकि घोड़े से 12 घंटे में यह सफर तय किया जा सकता। अंग्रेंज गैरिजन अफसर मेजर चार्ल्स पैरट ने जब शिमला में निर्माण करवाएं तो दिल्ली का राष्ट्रपति भवन बनाने वाले वास्तुकार एडविन लुटियन ने कहा था कि वह तो किसी बंदर की कलाकृति लगता है। अगर अगली बार बंदर शिमला बनाना चाहे तो उसे तुरंत रोक देना चाहिए। 

अंग्रेंजो ने बाद में शिमला को अपनी गर्मी की राजधानी बनाया जो कि द्वितीय विश्व युद्ध तक राजधानी बनी रही। देश के मौसम ने उसकी राजधानी बदल दी। आज देश में महाराष्ट्र व जम्मू कश्मीर की राजधानियां बदलती है। महाराष्ट्र में मुंबई से राजधानी नागपुर चली जाती है तो जम्मू कश्मीर में जम्मू। वैसे जब इस देश में आज भी हिंदू व मुस्लिम के नाम पर बलात्कार सरीखे अपराधों पर पढ़े-लिखे लोगों को बंटा हुआ देखते हैं तो लगता है कि एडविन लुटियन बहुत समझदार थे तभी उन्होंने राष्ट्रपति भवन को हिंदू व मुस्लिम शैली की जगह, व्रद्ध शैली में बनाकर वहां स्तूप बनाए वरना ताजमहल की तरह आज इसे लेकर भी विवाद हो रहा होता।

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