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जनता के पैसे पर आजीवन मौज!

विवेक सक्सेना
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हमारा देश कुछ मामलों बहुत अजीब है। यहां जो जितना ज्यादा संपन्न होता है उसे संविधान उतना ही कम खर्च करने का प्रावधान करता है। लोगों का पैसा लुटने वाले लोगों को सरकारी खर्च पर सुरक्षा मिलती है। देश के सबसे अहम पदो पर नियुक्त राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तक को अपने रिटायर होने के बाद मरने तक मुफ्त में रहने के लिए कई एकड़ में फैला सरकारी आवास, निजी स्टाफ, मुफ्त यात्राएं, फोन व बिजली का बिल सरकार द्वारा चुकाए जाने की सुविधाएं मिलती हैं वह भी तब जब कि उनकी पेंशन बहुत मोटी होती है। जबकि उन्होंने अपनी पूरी जिदंगी मोटी रकम कमाई होती है। 

हाल में देश के सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित किए गए सरकारी आवासों को रद्द करने का जो फैसला लिया है वह चौकाने वाला है। हालांकि न तो ऐसा करने में राज्य सरकार की कोई रूचि है और न ही इससे प्रभावित होने वाले लोग चाहते हैं कि उन्हें मुफ्त में मिले ये मकान छीने जाए। सुनने में आया है कि वे लोग व राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ कार्रवाई करने का तरीका ढूढ़ने में जुट गए हैं। यह प्रकरण बताता है कि किस तरह से हमारे जन प्रतिनिधि आम गरीब जनता के खर्च पर ऐश करते हैं और सरकारी संपत्ति को अपनी संपत्ति समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में छह पूर्व मुख्यमंत्रियों नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, मायावती, राजनाथ सिंह व अखिलेश यादव द्वारा लखनऊ के शाही इलाके में काबिज सरकारी संपत्तियों को खाली करने का आदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि देश के संविधान में अनुच्छेद 14 के तहत जिस तरह से बराबरी के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है उसका मनमाने ढंग से पालन किया जा रहा है। जब कोई मुख्यमंत्री अपने पद पर नहीं रहता है तो वह आम आदमी सरीखा हो जाता है। उसे सुरक्षा देने की बात तो समझ में आती है मगर उसे जीवन पर्यंत रहने के लिए मुफ्त में घर दिए जाने की बात गले नहीं उतरती है। 

मालूम हो कि पूर्व मुख्यमंत्रियेां के सरकारी बंगला देने की शुरुआत 1986 में गरीबो के स्वयंभू मसीहा दिवंगत वीपी सिंह ने की थी। खुद को भ्रष्टाचार का पर्याय मानने वाले इस नेता ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था तो यह नारा लगा था कि राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है। उन्होंने तब मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को माल एवेन्यू में एक बंगला आवंटित किया था। वे वही नेता है जिन पर बुढापे में एक महिला ने अपना पति व लड़के के बाप होने का दावा कर दिया था। इसे उन्होंने लंबी लड़ाई के बाद स्वीकार किया और आंध्र प्रदेश के राजभवन में अपने बैडरूम पर पलंग पोली खेले जाने की कुछ तस्वीरे सार्वजनिक होने से अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 

आजकल वे वाजपेयी, जार्ज व मदनलाल खुराना जैसी हालात में हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके बाद कानून बनाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए आजीवन आवास की व्यवस्था कर दी। इस हैसियत से वीर बहादुर सिंह, राम नरेश यादव, श्रीपति मिश्रा व राम प्रकाश गुप्ता को भी सरकारी मकान मिल गया। हालांकि इन सभी को मरने के बाद संपत्ति विभाग ने सरकार की सहमति से इन बंगलों को खाली करवा लिया। हालांकि वीरबहादुर सिंह के बेटे फतेह बहादुर सिंह ने पिता की याद में संस्था बनाकर बंगला आवंटित करवा लिया। 

मध्यप्रदेश का राज्यपाल रहने के बावजूद रामनरेश यादव ने मरने तक अपना घर नहीं छोड़ा। इसी तरह राज्यपाल बने कल्याण सिंह ने भी अपना बंगला नहीं छोड़ा है। मायावती ने तो सभी मुख्यमंत्रियों को पछाड़ते हुए मुख्यमंत्री रहते हुए अपने लिए 13 माल एवेन्यू का विशाल बंगला आवंटित करवा कर उस पर 114 करोड़ रुपए खर्च किए थे ताकि बाद में वहां आराम से रह सके। इसे तैयार करने के लिए विदेशों से भी सामान मंगवाया गया। अखिलेश यादव ने पद पर रहते हुए 4 विक्रमादित्य मार्ग आवंटित करवा कर इस बंगले के हॉल पर ही एक करोड़ रुपए खर्च करवा दिए थे। 

लखनऊ के पॉश विक्रमादित्य मार्ग, कालीदास मार्ग व माल एवेन्यू में स्थित इन बंगलों का आकार करीब 20,000 वर्ग फुट है व उनमें 15 से 20 कमरे हैं। इनका मासिक किराया मात्र 4600 रुपए है जो कि कुछ अर्थो में एकदम मुफ्त है क्योंकि इतने में तो वहां शौचालय भी नहीं मिलता। राज्य सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में भी फैसला दिया था मगर उसे सरकार ने निष्प्रभावी बना दिया। 

यह सब पढ़कर लगता है कि कांशीराम सही कहते थे कि अगर मेरे हाथ में सत्ता आई तो मैं दिल्ली के राजघाट व शांतिवन के इलाकों में झुग्गियां पड़वा दूंगा। जिंदा लोगों के रहने के लिए झुग्गी तक नहीं है व मुरदे सैकड़ो एकड़ में सो रहे हैं। मालूम हो कि हमारे जनप्रतिनिध हर तरह की सुख सुविधाएं हासिल करते हैं। जब चाहे खुद अपना वेतन बढ़ा लेते हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को रिटायर होने के बाद भी न केवल विशाल बंगले बल्कि मोटी पेंशन व दूसरी सुख-सुविधाएं मिलती हैं जिन्हें देखकर सोचना पड़ जाता है कि आखिर यह लोग अपना पैसा व पेंशन कहां खर्च करते होंगे? 

ब्रिटेन व अमेरिका जैसे देशों में रिटायर प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को सरकारी घर देने का प्रावधान नहीं है। ब्रिटेन में तो हाउस ऑफ कामंस में सभी सांसदों के लिए बैठने तक की भी व्यवस्था नहीं है। उसकी क्षमता 650 विधायको की है जबकि बैठने के लिए सिर्फ 437 लोगों की व्यवस्था है। मकान तो दूर रहा वे तो पहले आओ पहले पाओ के आधार पर सदन में बैठने का मौका बनता हैं। मगर इस देश में नेता अपना घर होते हुए भी सरकारी बंगलों पर कब्जा रखते हैं। उनके मरने पर उनके परिवार वाले चाहते हैं कि उनके अंतिम संस्कार में इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी व हवन सामग्री तक का खर्च सरकार उठाए।

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