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करूणानिधि ने ऱाज खूब किया लेकिन..

विवेक सक्सेना
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जब 1980 के दशक में दिल्ली में पत्रकारिता शुरू की थी तो तत्कालीन संपादक ने मुझे बताया था कि कभी किसी घटना को एक ही पहलू से नहीं देखना चाहिए। खास तौर से उस नजरिए से तो बिलकुल भी नहीं देखना चाहिए जिससे कि सब लोग देख रहे हों वरना तुम्हारे देखने व अन्य के उस बारे में सोचने व देखने में क्या अंतर रह जाएगा। अतः जब मैंने देश के जाने-माने बुजर्ग द्रमुक नेता एम करूणानिधि के निधन के बारे में देखा व खबरें पढ़ी तो सब उसकी शख्सियत, व्यक्तित्व व राजनीतिक योगदान की चर्चा कर रहे थे। यह सब देख, सुन कर मुझे सोचने के लिए बाध्य हो जाना पड़ा कि आखिर इस नेता में ऐसी क्या खासियत थी जिसने तमिलनाडु की राजनीति को ही बदल कर रख दिया। उन्होंने व उनके दल ने जो काम 1937 में किया था उसका आज तक कोई तोड़ नहीं निकला। 

हालांकि जब कुछ दशक पूर्व बसपा ने उत्तर प्रदेश में तिलक, तराजू और तलवार, इनके मारो जूत चार के नारे के साथ अपनी राजनीति शुरू की थी तब मुझे इस बात का भरोसा नहीं था कि विरोध व नफरत की राजनीति इतनी असरदार साबित हो सकती है। जबकि यही रास्ता अपना कर करूणानिधि व उनके दल ने देश की सबसे पुरानी और सबसे घाघ व सबसे ज्यादा समय तक केंद्र में सत्ता में रहने वाली पार्टी कांग्रेंस का तमिलनाडु से ऐसा सूपड़ा साफ किया कि उसके बाद वह वहां कभी सत्ता में ही नहीं आई। 

वहां गैर-द्रविड पार्टियों का जनाधार साफ हो गया और आज तक राष्ट्रीय दल चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेंस वहां चुनाव में अपनी नैया पार लगाने के लिए किसी-न-किसी क्षेत्रीय द्रविड दल के साथ गठबंधन करती है।  उसे कभी द्रमुक की जी-हजूरी करनी पड़ी तो कभी अन्ना द्रमुक की। वहां उत्तर भारत, हिंदी, ब्राह्मणों व हिंदुओं के खिलाफ इतना जहर घोला गया कि वहां की राजनीति ही बदल गई।

ध्यान रहे कि तमिलनाडु, देश का पहला व एकमात्र ऐसा राज्य है जहां ब्राह्मण का शादी करवाना जरूरी नहीं है। तमिलनाडु को पहले मद्रास स्टेट कहा जाता था। जब आजादी के पहले वहां सी़ राजगोपालाचारी के अध्यक्षता में कांग्रेंस सरकार बनी तो उन्होंने देश में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन व हिंदी भाषी नेताओं की इच्छा को देखते हुए राज्य में हिंदी को अनिवार्य करने की पहल की। इसके विरोध में समाज के हर वर्ग ने आंदोलन शुरू कर दिया। 

ईएस नायकर व अन्नादुरै सरीखे नेताओं ने इसका विरोध किया। एम करूणानिधि इन दोनों के चेले थे। पेरियार की जस्टिस पार्टी ने, जोकि बाद में द्रविड कडगम बनी तीस साल तक इस आंदोलन को चलाया। बाद में वहां हालात काफी खराब हुए। दो लोग मारे गए व 1198 लोग गिरफ्तार किए गए जिनमें औरते व बच्चे शामिल थे। अंततः कांग्रेंस सरकार ने इस्तीफा दिया व 1937 में मद्रास के तत्कालीन अंग्रेंज-गवर्नर ने यह आदेश वापस ले लिया। 

इसके बाद केंद्र सरकार की अनेक कोशिशों व तमिलो व दक्षिण भारतीयो के विरोध के कारण हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं बन सकी व राज भाषा बनकर रह गई और जिस अंग्रेंजी को हटाया जाना था वह मुखर हो गई। इसमें करूणानिधि के राजनीतिक गुरू पेरियार की अहम भूमिका रही। वे वैश्य समाज से थे और शुरू में पूजा-पाठ करते थे। एक बार वे बनारस स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर गए जहां उन्होंने देखा कि पुजारी उन्हें खाना नहीं दे रहे थे। पुजारी ब्राह्मणों का खाना अलग बनता था जबकि पैसे वाले दक्षिण भारतीय कहीं कुछ भी खा सकते थे। उस घटना के बाद वे जाति प्रथा व ब्राह्मणों से काफी नाराज हो गए। हालांकि तब सुब्रमण्यम भारती सी, राजगोपालाचारी, जी सुब्रह्मण्यम अय्यर सरीखे ब्राह्मण नेता राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेंजो का विरोध करते हुए हिंदी के खिलाफ नहीं थे। 

बताते है कि राज्य में द्रविड़ो व आर्यो को बांटने में तत्कालीन ब्रिटिश शासकों की अहम भूमिका रही। वे उत्तर भारत में शुरू किए गए आजादी के आंदोलन की गिरफ्त में दक्षिण भारत को आने से रोकना चाहते थे। पेरियार व्यापारी थे व व्यापार के कारण उनके अंग्रेंजो से अच्छे संबंध थे। अतः उन्होंने भी दक्षिण में द्रविड पार्टी की जड़े जमाने में अपनी जीत समझी। चूकिं वहां के ब्राह्मण तमिल के साथ संस्कृत का भी इस्तेमाल करते थे व उनके व द्रविडो के रंग में अंतर था। अंतः यह बात कहीं जाने लगी कि उन लोगों पर हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। 

इस पूरे मामले को हमें कुछ इस तरह से समझाया जाता रहा है  कि भारतीय समाज मूलतः आर्य और द्रविड के आधार पर विभाजित है। इस थीसिस के मुताबिक करीब 72 फीसदी भारतीय आर्य है जबकि 28 फीसदी द्रविड है। उत्तर भारत के लोग आर्यो के वंशज है जबकि दक्षिण भारतीयों के पूर्वज द्रविड है। दक्षिण भारत के राज्यों में बोली जाने वाली भाषाएं द्रविड भाषाएं कहीं जाती है जबकि उत्तर भारत की भाषाएं आर्य भाषाएं कहीं जाती है। आर्य व द्रविड भाषाओं की लिपियां भी अलग-अलग है। ऐसा माना जाता है कि 1500 ईसा पूर्व आर्य ईरान और रूस से भारत आए थे जबकि द्रविड यहां के मूल निवासी थे। आर्यो ने तत्कालीन संस्कृति की अनदेखी कर उत्तर भारत पर कब्जा जमाना शुरू किया व यहां रहने वाले मूल निवासियों को दक्षिण में खदेड़ दिया जहां वे लोग जंगलों और पर्वतो में रहने लगे। 

थीसिस अनुसार आर्य व द्रविडो के मिलन के बाद जाति व्यवस्था स्थापित हुई। गोरे आर्यो ने पूजा पाठ का काम किया और उन्होंने खुद को ब्राह्मण कहा। राजाओं को क्षत्रिय व व्यापारियों को वैश्य बुलाया जाने लगा जबकि बाकि लोग शूद्र कहलाए। हालांकि यह दावा किया जाता है कि महाभारत 7000 साल पुरानी है। आर्य शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका मतलब होता है शुद्ध। बहुत से लोग आर्यो को जर्मन मानते हैं क्योंकि उनका स्वास्तिक चिन्ह व हिंदुओं का स्वास्तिक एक जैसा है। शायद यहीं वजह है कि हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को दक्षिण भारत में अहमियत नहीं दी जाती है। दक्षिण भारत में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। कंब रामायण के मुताबिक सीता को रावण बहुत सम्मान के साथ ले जाता 

आजादी बाद वहां हिंदी, ब्राह्मणों व उत्तर भारत के विरोध ने जोर पकड़ा। इसका परिणाम इतना घातक निकला कि द्रमुक पार्टी तमिलनाडु पर छा गई। हालांकि उसके विभाजन के बाद अन्ना द्रमुक सत्ता में आई। जब 1967 में वहां विधानसभा चुनाव हुए तो तत्कालीन मुख्यमंत्री एम भक्तवत्सलम व कांग्रेंस के किंग मेकर कहे जाने वाले कामराज दोनों ही चुनाव हार गए। उसके बाद कांग्रेंस ने कभी वहां सरकार नहीं बनाई। पेरियार कहा करते थे कि हिटलर ने कहा था कि यहूदी सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं। उनकी तुलना ब्राह्मणों से की जा सकती है जिनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं और फिर भी वे शासकों को जेब में रखकर राज करते हैं। 

इन्होंने राज्य में राम की मूर्ति को जूते की मालाएं पहनाई। हिंदू भगवानों के बारे में काफी आपत्तिजनक बाते कहीं। ब्राह्मण पढ़े लिखे होने के कारण सरकारी नौकरियों में काफी आगे थे। उन्होंने इसे मुद्दा बनाया व देश में सबसे पहले 1927 में जातीय आधार पर तमिलनाडु में आरक्षण लागू किया गया। उसी विरासत में करूणानिधी ने तमिलनाडु की जनता पर जमकर राज किया। मगर अपने परिवार में अपने बच्चों के बीच में झगडों को नहीं निपटा पाए। उनके परिवार ने जमकर अपना व्यवसाय चमकाया। उनकी बेटी कनिमोई को 2जी घोटाले में जेल जाना पड़ा। पिछले आम चुनाव से पहले उन्होंने तत्कालीन यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया व बाद में भाजपा को समर्थन नहीं दिया व उनकी पार्टी सड़क पर आ गई। उन्होंने लिट्टे का समर्थन किया। जैन आयोग ने राजीव गांधी हत्याकांड में उनकी भूमिका को संदिग्ध माना। उनका पूरा जीवन झगड़ों व विवादों में बीता। यह संयोग ही होगा कि उनके निधन के बाद भी मरीना बीच पर उनकी समाधि बनाने के मुद्दे पर उनके समर्थकों को कोर्ट में जाना पड़ा।

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