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कमल हसन राजनीति के राजेश खन्ना?

तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 2019 में होने वाले है मगर अभी से वहां राजनीतिक सक्रियता काफी बढ़ गई है। एक बार फिर वहां के दो जाने-माने तमिल अभिनेता रजनीकांत व कमल हसन को लेकर अटकलों और अपवादों का बाजार गर्म हो गया है। सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या यह दोनों सितारे वहां राजनीति में प्रवेश करके दशको से द्रमुक व अन्नाद्रमुक के बीच चले आ रहे सत्ता के संघर्ष को भी प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यदि हां तो वे इन दोनों में से किस के साथ जाना पसंद करेंगे अथवा किसी और के साथ मिलकर कोई तीसरा पक्ष तैयार करेंगे। 

दिवंगत प्रमोद महाजन ने एक बार कहा था कि दक्षिण व देश के बाकी हिस्सों की राजनीति में एक बहुत बड़ा अंतर यह है कि जहां दक्षिण की राजनीति को फिल्मी सितारे बहुत प्रभावित करते आए हैं वहीं उत्तर व पश्चिम भारत की राजनीति में एकाध अपवादों को छोड़कर फिल्मी सितारों को देखने के लिए चुनावी सभाओं में भीड़ तो इकट्ठा हो जाती है मगर वे इसे वोटों में तब्दील नहीं कर पाते हैं। 

जयललिता के निधन के बाद से ही यह सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या रजनीकांत सक्रिय राजनीति में आएंगे? वैसे वे कई दशकों से यह संकेत देते आए हैं कि वे राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं। मालूम हो कि तमिलनाडु में फिल्मों और राजनीति का संबंध बहुत पुराना है। रजनीकांत को तो दक्षिण का अमिताभ बच्चन माना जाता है। एक समय तो उनका मेहनताना, अमिताभ से भी ज्यादा हो गया था। 

जयललिता समेत इस राज्य के चार मुख्यमंत्री फिल्मों के जरिए राजनीति में आए थे। ये है सीएन अन्नदूरै, एम करूणानिधि (द्रमुक) एमजी रामचंद्रन व जयललिता (दोनों अन्नाद्रमुक)। पिछले 50 वर्षो से यह सिलसिला चला आ रहा है। कभी द्रमुक सत्ता में आती है तो कभी अन्नाद्रमुक। इनके अलावा इस राज्य ने नेपोलियन, वैजयंती माला सरीखे नेता दिए जोकि फिल्मो से राजनीति में आए थे। 

आंध्रप्रदेश भी कहां पीछे रहने वाला था। एनटी रामाराव ने तो 1982 में अरविंद केजरीवाल की तरह आंध्र में कांग्रेंस का सूपड़ा साफ कर तेलगू देशम सरीखी नई पार्टी को सत्ता में ला दिया था। मोहन बाबू, दसारी नारायनराव, चिरंजीवी, जयप्रदा भी इसी राज्य की अभिनेता है जिन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई थी, वह कर्नाटक में अंबरीश व पूनमा सरीखे अभिनेताओं ने राजनीति में प्रवेश किया। तमिलनाडु में द्रविड आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा व 1967 में कांग्रेंस को सत्ता से बाहर होने के बाद द्रविड आंदोलन ही सत्ता पर काबिज होता रहा। 

इससे तमिलनाडु से तो ब्राह्मणों के प्रभुत्व का एकदम सफाया ही हो गया। जयललिता एक अपवाद थी जोकि कर्नाटक की ब्राह्मण होने के बावजूद, एमजी रामचंद्रन की हीरोइन रहने के कारण न केवल उनके न रहने पर उनकी राजनीतिक वारिस बनी बल्कि उनका जादू वहीं की द्रविड राजनीति पर इतना हावी रहा कि कभी किसी ने उनके ब्राह्मण होने का मुद्दा ही नहीं उठाया। तमिल फिल्मों के हीरो अपनी फिल्मों में गरीब समर्थक छवि को प्रस्तुत करते रहे और चुनावों में उन्हें इसका पूरा फायदा मिलता रहा। 

अब जयललिता इस दुनिया में नहीं है और द्रमुक प्रमुख करूणानिधि की आयु बहुत ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में रजनीकांत और कमल हसन की और सबकी निगाहें टिक गई हैं। इससे पहले 1996 में रजनीकांत ने पहली बार राजनीतिक बयान देते हुए कहा था कि अगर जयललिता सत्ता में आई तो भगवान भी तमिलनाडु को बचा नहीं पाएगा। उस चुनाव में रजनीकांत ने हिस्सा नहीं लिया था। पर जयललिता, विरोधी उनकी बयानबाजी का इतना असर जरूर हुआ था कि वे सत्ता के बाहर हो गई व राज्य में द्रमुक की सरकार बन गई थी।

लंबे अरसे से रजनीकांत के सक्रिय राजनीति में आने की अटकले लगती रही है। कुछ साल पहले रजनीकांत ने कहा कि वैसे तो उनकी राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं है मगर अगर वे राजनीति में आए तो तमाम पैसे के लोभी लोगों को बाहर का रास्ता दिखा देंगे। अभी तक जो संकेत मिले है उनसे तो यही लगता है कि वे भाजपा के करीब जा रहे हैं। वे जब तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते रहते हैँ। भाजपा के पास भी तमिलनाडु में मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं है। वह उन्हें इस पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर सकती है। 

उधर दूसरी और जाने मानें फिल्म अभिनेता कमल हसन भी काफी सक्रिय होने लगे है। हाल में उनकी अरविंद केजरीवाल व केरल के मुख्यमंत्री पिनारी विजयन से हुई मुलाकातों को लेकर तरह-तरह के अर्थ निकाले जा रहे हैं। वेसे इस नास्तिक अभिनेता का झुकाव वामपंथ की और रहता आया है। इस 63 वर्षीय अभिनेता ने निर्देशन से लेकर पार्श्व गायक तक के रूप में शोहरत हासिल की। तमिल व तेलगू के साथ-साथ हिंदी फिल्मों तक में अभिनय कर अपनी विशिष्ट जगह बनाई। 

कमल हसन तमिल आयंगर ब्राह्मण है। हालांकि उनका नाम मुसलमानों जैसा है। इसे लेकर कुछ किवदंतियां है। कहा जाता है कि उनके पिता के एक मुस्लिम दोस्त है जिन्होंने आजादी की लड़ाई में उनके पिता के साथ हिस्सा लिया था। उनका नाम याकूब हसन था। अपने इस दोस्त की याद में उनके पिता ने उनका नाम कमल हसन रख दिया। हालांकि अब वे यह कहने लगे है कि उनका नाम संस्कृत में हास्य शब्द से लिया गया है। 

कमल हसन के भी तमिलनाडु में अपने प्रशंसको के क्लब है। वे अकेले ऐसे अभिनेता है जोकि किसी उत्पाद का प्रचार नहीं करते हैं। पहली बार उन्होंने तमिलनाडु के जाने-माने वस्त्र ब्रांड पोथी के लिए माडलिंग का काम किया और बताते है कि उससे मिलने वाली 15 करोड़ की धनराशि एड्स के रोगियों के लिए काम करने वाली एक संस्था को दान में दे दिया। 

अभी तक वे हिंदू विरोधी बयान देते आए हैं। जैसे कि उनका कहना है कि महाभारत का कोई महत्व ही नहीं है। इससे तो एक ही परिवार के सदस्य एक औरत के लिए आपस में भिड़ लड़ मरे थे। दो साल पहले विश्व हिंदू परिषद ने उनकी फिल्म उत्तमा विलेन के खिलाफ प्रदर्शन किया था। क्योंकि उसका आरोप था कि इसमें भगवान विष्णु का अपमान किया गया था। जब वे पिनारी विजयन से मिले तो बाद में उन्होंने कहा कि भगवा मेरा नेता नहीं। जब केजरीवाल चेन्नई गए तो उनकी बेटी अक्षम उनकी अगवानी करने के लिए हवाई अड्डे पर पहुंची। पर आप की तमिलनाडु में वही हैसियत है जोकि द्रमुक की दिल्ली में। दोनों में महज इतनी ही समानता है कि दिल्ली व तमिलनाडु दोनों की सत्ता व राजनीति से राष्ट्रीय दल बाहर हो चुके हैं। 

कमल हसन की राजनीति में सबसे बड़ी बाधक उनकी जाति बन सकती है। दक्षिण की राजनीति की एक बड़ी खासियत यह रही कि चाहे आंध्रप्रदेश रहा हो अथवा तमिलनाडु यहां विचारधारा नहीं है। जगह शख्सियत व राज्य की अस्मिता को ज्यादा महत्व दिया गया। एनटी रामाराव ने भी इसी का फायदा उठाया था। मगर यह दावा नहीं किया जा सकता है कि हर अभिनेता राजनीति में सफल ही साबित हुआ हो। पहले शिवाजी गणेशन राजनीति में पिटे और फिर विजयकांत की पार्टी डीएमडीके का बहुत बुरा हश्र हुआ। रजनीकांत को जहां दक्षिण का अमिताभ बच्चन कहा जाता है वहीं कमल हसन का दशकों तक यहां वैसा ही रूतबा रहा जोकि कभी 1970-80 के दशक में राजेश खन्ना का हुआ करता था। अमिताभ व राजेश खन्ना दोनों ने ही राजनीति में कदम रखा और कुछ खास हासिल नहीं कर पाए। देखना यह है कि वे दोनों के अनुभवों से क्या सबक लेते हैं।

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