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टैटू याकि गोदने का अजब मामला

विवेक सक्सेना
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मुझे डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफी सरीखे अमेरिकी चैनल देखने का काफी शौक है। ये न केवल बेहद जानकारी वाले होते हैं बल्कि हिंदी में उनकी डबिंग भी गजब की होती है। ऐसा लगता ही नहीं है कि आप कोई बाहरी गैर- हिंदी का चैनल देख रहे हैं। इन सभी चैनलों में ज्यादातर लोगों के शरीर पर बड़ी तादाद में गोदने गुदे हुए होते हैं। 

जब हम बच्चे थे तो आमतौर पर इस तरह के गोदने भारतीय लोगों पर बहुत सीमित मात्रा में गुदे हुए देखे जाते थे। तब सिर्फ नीले रंग के ये होते थे व ज्यादातर अनपढ़ लोग अपने हाथ पर अपना नाम या ‘राम’ आदि शब्द गुदवाते थे। कुछ लोग भगवान के चित्र बनवा लेते थे। 

तब हम लोगों के लिए इनका महत्व दाहिनी बांह पर लगाए गए चेचक के टीके से ज्यादा नहीं होता था। भारतीय लोग बहुत सीमित हिस्से पर ही इन्हें गुदवाते थे। तब ज्यादातर मेलों में एक छोटी सी मशीन से इन्हें शरीर पर गोदा जाता था व बैटरी से चलने वाली इस मशीन के जरिए उसमें एक छोटी सुई के जरिए नीली इंक भरी जाती थी। 

मगर अब तो विदेशी लोग दो-तिहाई हिस्सा तक गुदवा लेते हैं। इन्हें अंग्रेंजी में टैटू कहा जाता है। बाहर की देखा-देखी तमाम भारतीय लोग भी अपने शरीर पर गोदने गुदवा रहे हैं जिस तरह से आज तमाम लोग अजीबो गरीब बाल कटवा लेते हैं। इनकी याद इसलिए आ गई क्योंकि चंद दिन पहले यह खबर पढ़ने को मिली कि विदेश में कहीं एक हजारों साल पुरानी ममी मिली जिसने 18 स्थानों पर गुदवाया था। यह ममी करीब 3000 साल ईसा पूर्व की थी। इससे पहले आल्पस पर्वतो में काफी पहले ही 3250 साल ईसा पूर्व की टैटू गुदे ममी मिल चुकी है।

हालांकि दुनिया में उसके प्रचलित होने की कहानी कुछे सौ वर्ष पुरानी ही है। आज इसे आमतौर पर लोग एक फैशन के तहत बनाते हैं। इसकी वजह खुद को सुंदर दिखाना है। कुछ रोगों के ईलाज के लिए शरीर पर दोहे लिखवाना या पक्षियो तक की रंगीन तस्वीरे बनवाना शामिल होता है। इनमें तमाम निर्देश व प्रतीक खुदवाए जाते हैं। 

आज यह दुनिया में काफी लोकप्रिय होता जा रहा है। मगर पश्चिम के ज्यादातर देशों में ऐसा करना अच्छा नहीं माना जाता है। बताते हैं कि जाने-माने नाविक व खोजकर्ता कैप्टन कुक 1769 में अपने साथ न्यूजीलैंड से एक व्यक्ति को अमेरिका लेकर आए थे जोकि टैटवा नामक चित्र बनाता था। इसी से टैटू शब्द ईजाद हुआ। अमेरिका में सिविल वार के दौरान उसने टैटू बनाने की अपनी दुकान खोली जोकि काफी लोकप्रिय हो गई। 

उसने इन्हें बनाने वाली बिजली की मशीन खुद ही ईजाद की थी। उन दिनों गृह युद्ध में शामिल होने वाले तमाम टुकडियो के सैनिक अपने शरीर पर इन्हें बनवाते थे। इससे पहले भी दुनिया के विभिन्न देशों में इन्हें विभिन्न कारणों से बनाया जा रहा था। ओटोमन शासन के दौरान बॉलकान में इस्लाम धर्म में जबरन परिवर्तित किए जाने से बचने के लिए तमाम बोसगई औरते व बच्चें अपने शरीर पर ईसाई धर्म के टैटू बनवाने लगे ताकि पकड़े जाने पर उन्हें जबरन मुसलमान न बनाया जाए। 

यहां बताना चाहता हूं कि दुनिया में एकमात्र इस्लाम धर्म ही ऐसा है जिसमें टैटू बनाने को हराम करार दिया गया है। हदीथ में इस पर रोक लगाई गई है। सुन्नी मुसलमान इसे नहीं बनाते। हालांकि कुछ मामलों में शिया मुसलमानों को सीमित तादाद में इसे बनवाते देखा गया है। हिंदू, ईसाई, यहूदी, सिख, जैन, पारसी आदि धर्मों में टैटू बनवाने पर कोई रोक नहीं है। 

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तो कुछ जासूसों ने एक नया तरीका ईजाद किया था। वे अपने सिर के सारे बाल मुंडवा कर उन पर टैटू के जरिए दुश्मन के इलाके के नक्शे बनवा लेते थे व बाल बड़े हो जाने पर उन्हें लेकर अपने देश चले जाते व वहां पहुंच कर बाल मुंडवा कर सारी सूचनाएं दे दिया करते थे। शुरू में तो इन्हें गन पाउडर, कोयले के चूने आदि से बनाया जाता था। 

जेलों में कैदी तो पेशाब में पुरानी ग्रीस आदि मिलाकर उन्हें गुदवा लेते थे क्योंकि इसे बहुत बहादुरी का काम माना जाता था। रोमन शासन के दौरान शासक अपने गुलाम ग्लेडिएटरो के शरीर पर गोदने गुदवा देते थे जिन पर लिखा होता था कि मैं अपराधी हूं व पकड़ सको तो मुझे पकड़ो। बाद में रोमन शासक ने अपने सैनिको को भी गुदवाना शुरू कर दिया ताकि वे लोग सेना छोड़कर फरार न हो जाए। बाद में गुलामों को उनकी पहचान के लिए गुदवाने का फैशन शुरू हुआ। 

जब पासपोर्ट अस्तित्व में नहीं आया था तो अनेक देशों के नागरिकों ने अपनी पहचान बताने के लिए अपना नाम, देश का नाम व जगह आदि गुदवाना शुरू कर दिया था ताकि पकड़े जाने पर दूसरे देश वाले उन्हें कैदी न बना ले व उनकी पहचान की जा सके। इसलिए शुरुआत में ज्यादातर टैटू नाविक लोग ही खुदवाते थे। हिटलर ने सत्ता में आने पर यहूदियों की पहचान के लिए अपने देश की आशविट्ज यातना शिविर में रखे गए यहूदियों पर जैड अक्षर गुदवाना शुरू कर दिया हालांकि इसे 20,000 कैदियों पर ही गोदा गया। 

वहां जैड का मतलब जिरसी होता था। उन पर अलग नंबर गोदे जाने लगे। हिटलर की जासूसी सेना एसएस के जवानों ने तो इसे इसलिए गुदवाया था ताकि वे लोग साबित कर सके कि उनका खून एकदम शुद्ध है। हालांकि हिटलर के पतन के बाद पकड़े व यातना दिए जाने के डर से उन्होंने खुद को गोली से उड़ा लिया। दुनिया में घोड़ों, भैंस, गायो, बकरियों व सुअरों पर नंबर डालने के लिए टैटू करने का सिलसिला काफी पुराना है। अमेरिका व ब्रिटेन में आज भी शरीर के तमाम निशान छुपाने के लिए टैटू बनवाए जाते हैं। 

एलजाइमर के मरीजो पर भी उनका नाम खोद दिया जाता है ताकि उनकी पहचान की जा सके। जापान में 1900 में 70 साल के लिए इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। पिछले दिनों ओसाका शहर के अफसर द्वारा एक बच्ची को धमकाने के लिए अपना टैटू दिखाने के बाद इसे न बनाने की सलाह जारी की गई है। चीन में इस पर प्रतिबंध है क्योंकि जापान, चीन, अमेरिका व रूस में अपराधी गिरोह के सदस्य अपनी पहचान बनाने के लिए इन्हें बनवाते हैं व उन्हें देखकर यह पता चलता है कि उसने कितनी हत्याएं की थीं व उसे क्या सजा मिली थी। 

पंजाब में तो पुलिस वालों ने एक महिला के माथे पर गुदवा दिया था कि मैं जेबकतरी हूं। जब लेनिन व स्टालिन जीवित थे तो सरकार विरोधी लोग अपनी छाती पर उनके टैटू बनावा लेते थे ताकि पुलिस वाले उन्हें वहां गोली न मारे। अमेरिका में तो कुछ कंपिनयो ने अपने विज्ञापन के लिए लोगों को अपने टैटू बनवाने का लालच दिया। कुल मिलाकर इनसे बीमारी व छुआछूत फैलाने का डर रहता है। मेरा मानना है कि यह तो अपनी निजता समाप्त करने के लिए उठाया गया कदम है।

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