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कर्ण का कानपुर से लेना-देना!

जब तक हम लोकतंत्र नहीं बने थे तब तक जब कभी देश में सत्ता परिवर्तन होता था तो नया शासक अपने नाम के सिक्के ढलवाता व चलवाता था। बहुत कम शासक ऐसे थे जिन्हें अपने काम के कारण याद किया जाता है। इनमें शेरशाह सूरी का नाम सबसे आगे आता है जिसने ग्रांडट्रेक रोड़ तैयार करवा कर आम लोगों के लिए इस देश में यात्रा सरल बनाई थी। आजादी के बाद लंबे अरसे तक देश व राज्यों में कांग्रेंस का राज रहा। कांग्रेंस ने देश की तमाम परियोजनाएं, हवाई अड्डे, अस्पताल जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के नाम पर रखे। यहां तक कि कनाट प्लेस का नाम भी बदल कर राजीव चौक कर दिया ।

ऐसा लगता है कि अब भाजपा के पास बदलने के लिए कुछ ज्यादा बचा नहीं है। इसलिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार वाराणसी के पास स्थित मुगलसराय का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय नगर कर रही है। सुनने में तो यहां तक आया है कि कानपुर का नाम बदलकर कर्णपुर करने की तैयारी है क्योंकि संघी इतिहासकारो या जानकारों का मानना है कि यह नाम महाभारत के योद्धा कर्ण के नाम पर पड़ा था!

जब से मैंने होश संभाला, तब से लेकर जवान होने तक मैं कानपुर में ही रहा। मैंने नर्सरी से लेकर एमए तक की पढ़ाई वहीं की मगर कभी कहीं यह नहीं सुना कि कानपुर नाम के पीछे कर्ण की कोई भूमिका रही। फिर भी लगा कि मैं अज्ञानी हूं अतः हो सकता है कि मुझे इतिहास व तथ्यों की पूरी जानकारी न हो। अतः पत्रकार मित्र विनोद अग्निहोत्री को फोन किया तो उन्होंने कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज के हतिहास विभागध्यक्ष डा प्रताप सिंह से बात करने की सलाह दी।

मैं खुद भी उसी कॉलेज का पढ़ा हूं। डा सिंह की गिनती कानपुर में सबसे ज्यादा जानने वाले इतिहासकारों में होती है। अतः उन्हें फोन करके यह पता लगाया कि कानपुर और कर्ण में क्या रिश्ता था? उन्होंने बताया कि कानपुर और महाभारत के पात्र कर्ण का कानपुर ms दूर-दूर तक आपस में कुछ लेना देना नहीं है। क्योंकि महाभारत का युद्ध तो कुरूक्षेत्र में हुआ था। कुछ लोग वैसे ही कह देते हैं कि कानपुर में ही भीष्म पितामह तीरों से बिंध जाने के बाद जहां लेटे थे वह जगह गंगा नदी के किनारे सतसैया घाट कहलाती है।

सबसे प्रामाणिक तथ्य यह माना जाता है कि 1207 में कानपुर के निकट स्थिट सचेंडी के राज्य कान्हदेव ने अपने नाम पर जो शहर बसाया था उसे कानपुर के नाम से जाना जाने लगा। वे चंदेल राजा था। तब से लेकर अब तक करीब 23 बार इस शहर के नाम में थोड़ा बहुत बदलाव होता आया है। असली बदलाव तो अंग्रेंजी में लिखे जाने वाले KANPUR  के अक्षरों में किया गया। पहले इसकी स्पेलिंग CAWNPOR  हुआ करती थी। यह तो मुझे भी याद है कि जब मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में था तब यही लिखा जाता था व मेरे सामने ही इस शब्द पर पेंट पोत कर KANPUR  लिखा गया।

वैसे अगर कानपुर को किसी धार्मिक मामले से जोड़ना हो तो इसके लिए यह दलील दी जाती है कि जब राम ने सीता को निकाल दिया था तो वे उस समय ब्रम्हावर्त में जाकर रहने लगी थी। वहीं उन्होंने लव व कुश को जन्म दिया था। जब राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया और अपना घोड़ा छोड़ा तो उसे बिठूर में लव कुश ने पकड़कर एक पेड़ से बांध दिया था। अगर आप बिठूर जाएं तो आज भी वहां यह पेड़ दिखाया जाता है। एक व्यक्ति के पास पीतल के ही काफी भारी तीर के अगले हिस्से हैं। उसका दावा है कि यह तो लव कुश के है।

मान्यता है कि सीता ने कानपुर में एक मंदिर में अपने बच्चों की सुरक्षा व अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए पूजा की थी। उसे आज तजेश्वरी देवी के मंदिर के नाम से जाना जाता है। मगर यह तो तय है कि महाभारत के उस कर्ण से इस शहर का कुछ लेना-देना नहीं है जिसके ऊपर यहां का नाम बदलने की बात कहीं जा रही है। वास्तविकता तो यह है कि कानपुर का रामायण या महाभारत काल के पात्रों की तुलना में आजादी के संघर्ष में हिस्सा लेने वाले सेनानियों के साथ गहरा संबंध रहा।

ईस्ट इंडिया कंपनी का जब 1765 में यहां के जाजमऊ इलाके में अवध के नवाब शुजाऊद्दौला के साथ टकराव हुआ तो उन्हें इसकी अहमियत का पता चला। उन्होंने 1770 में यहां कब्जा किया व 24 मार्च 1803 को इसे जिला घोषित किया। जब बाजीराव पेशवा द्वितीय अंग्रेंजो के हाथ पूना में हारा तो ईस्ट इंडिया कंपनी के पास उन्हें वहां से निकालने के चंद विकल्प थे। अगर वह उन्हें कैद करती तो उनके समर्थक सैनिक विद्रोह कर सकते थे। उनके पास 5,000 घुड़सवार व 6000 पैदल सैनिक थे। अतः काफी सोच-विचार करने के बाद उसने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा कि वे पूना छोड़ दे तो वो उसको आठ लाख रुपए सालाना पेंशन देगी व उनके बाद उनके वंशज को भी वहीं सुविधाएं देगी जोकि उन्हें उपलब्ध थी।

उन्होंने अंतिम पेशवा धोंदोपंत नाना साहब को गोद लिया था। उन्हें बिठूर में बसा दिया गया जोकि कानपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। मगर बाजीराव के मारने के बाद अंग्रेंजों ने नाना साबह को पेशवा मानने से इंकार कर दिया। उनकी पेंशन बंद कर दी गई व उन्हें तोपों की सलामी दिए जाने पर भी रोक लगा दी। उन्होंने अपने विश्वासपात्र सलाहकार अजीमुल्ला को अपने मामले की पैरवी करने के लिए महारानी के दरबार में लंदन भेजा मगर वह भी निराश लोटा। तात्या टोपे उनके सेनापति होते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह काम रानी लक्ष्मी बाई के साथ भी किया और उनके बेटे को भी वारिस मानने से इंकार कर दिया।

इस बीच कलकत्ता की बैटकपुर छावनी में बड़ी रोचक घटना घटी। एक सफाईकर्मी वहां से झाडू लेकर  गुजर रहा था। यह वह समय था जबकि सवर्ण लोग दलितो की छाया तक से बचते थे। एक ब्राह्मण सैनिक ने उससे कहा कि जरा दूर होकर निकलो कहीं तुम्हारी छाया न पड़ जाए। उस समय वह सैनिक अपने मुस्लिम साथी के साथ बैठा बंदूक साफ कर रहा था। सफाईकर्मी ने उस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यहां तो मेरी छाया से भी बचते हो मगर क्या तुम्हे पता है कि जो नई कारतूस आ रही है उसमें सुअर व गाय की चर्बी लगाई जा रही है जिसे तुम लोगों को अपने मुंह से खोलना पड़ेगा।

यह सुनते ही उन दोनों के कान खड़े हो गए और उन्होंने कारतूस फैक्टरी में अपने सूत्रों से इस की पुष्टि की तो पता चला कि उसकी बात सही थी। नतीजतन विद्रोह की चिंगारी सुलगनी शुरू हुई। जब 1857 का विद्रोह हुआ तो नाना साहब ने खुद को कानपुर का शासक घोषित कर दिया। यह सामरिक दृष्टि से बेहद अहम शहर था क्योंकि यहा तो अंग्रेंजो के गैरिजन में हजारों सैनिक थे। उनके सैनिको ने अंग्रेंजो को घेर लिया। हालांकि 28 दिन तक लडाई चली। इस घेराबंदी के बाद 25 जून को कुछ अंग्रेंजो को इलाहाबाद जाने की इजाजत दे दी। जब करीब 450 ब्रिटिश पुरूष, महिलाएं व बच्चे वहां के सतीचौटा घाट पर नावों पर चढ़ रहे थे तभी किसी बात पर बागी सैनिको के साथ उनका टकराव हो गया जिसमें बड़ी तादाद में वे लोग मारे गए।

इससे सतीचौटा घाट का नाम मैसेकर (मैजेकर-घाट) पड़ गया। शहर में जबरदस्त हिंसा व आगजनी हुई। भीड़ ने टेलीफोन दफ्तर, पोस्ट ऑफिस, जेल, अदालतें फूंक डाले। अंग्रेंज समर्थक बूने नवाब का घोड़ा छीन कर उसे टहू पर बैठाकर शहर में घुमाया गया। कुछ दिन बाद जनरल हैवलव ने कानपुर शहर पर दोबारा कब्जा कर जबरदस्त कत्लेआम किया। नाना साहब, नेपाल भाग गए और फिर उनका कुछ पता नहीं चला।

सो अगर आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने वाले किसी योद्धा के नाम पर नाम बदला जा रहा होता तब भी समझ में आता। कानपुर में तो ऐसा नाम भी नहीं जिसमें गुलामी की बू आती हो मगर यहां तो सभी शासक मायावती, ममता बनर्जी और सिद्धारमैया को पछाड़ने में लगे हैं।

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