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राजा बांटे अशर्फियां

राजा-महाराजाओं या शासको द्वारा अपने दरबारियों को ईनाम और सम्मान से नवाजने की परंपरा काफी पुरानी रही है। उसी के चलते राजाओं बादशाहों के यहां नवरत्न हुआ करते थे। लोगो को राष्ट्रकवि व राजवैद्य घोषित किया जाता था। अंग्रेंज अपने समर्थक और चंपुओं को सर, राय बहादुर की पदवी प्रदान करते थे। जब दुनिया में महारानी का शासन था जिसके बारे में कहा जाता था कि उनके राज में सूरज नहीं डूबता था तब वे तो राजा-महाराजा तक को सम्मान की रेवड़ी बांटती थी। उन्हें तोपों की सलामी का ओहदा देकर सम्मानित किया जाता था। 

अंग्रेज अपने राज दरबार में हैसियत उसे मिलने वाली तोपों की सलामी देकर तय करते थे। जैसे कुछ को पांच तोपों की सलामी दी जाती थी तो कुछ को 11 या 21 की। राजा अपने दरबारी से खुश होने पर उसे अशर्फी या गिन्नी देते थे। अंग्रेंजो ने तो अपना साथ देने वाले तमाम सिख बिल्डरो को लंबी चौड़ी जमीने बांटी। उन्हें सरकारी ठेके दिए। जैसे कि अंगूठा छाप सर शोभा सिंह को यह उपाधि व करोड़ों रुपए के ठेके महज इसलिए दिए गए थे क्योंकि उन्होंने भगतसिंह के खिलाफ संसद में बम फेंकने के मामले में गवाही दी थी और उसकी गवाही के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों की फांसी पर लटका दिया। 

देश के आजाद होने के बाद भी यह परंपरा समाप्त नहीं हुई बल्कि बड़ी तेजी से पनपी। हाल ही में जब आरटीआई केसरी पत्रकार श्यामलाल यादव द्वारा हासिल की गई जानकारी का खुलासा हुआ तो पता चला कि उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान पिछले साल किन-किन लोगों को सम्मान के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान के नाम पर पुरुस्कार प्रदान किए गए। 

इसकी शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा की गई थी। कोई उनके बारे में कुछ भी कहता रहे पर सच्चाई यह है कि वे सच्चे अर्थो में समाजवादी थे। उन्होंने जो कमाया उसे बांटा भी। पत्रकारों पर तो वे खासे मेहरबान थे। उनके कार्यकाल में पत्रकारों ने सरकारी खर्च पर विदेश भ्रमण किया। राजनीति में नैतिकता की दुहाई देने वाले वरिष्ठ पत्रकारों को उन्होंने सरकारी कोष से लाखों करोड़ों रुपए उपलब्ध करवाए जोकि गंगा सफाई अभियान पर खर्च होने वाली सरकारी राशि की तरह कहां गायब हो गया किसी को कुछ नहीं पता। 

एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो इसका अहसान चुकाने के लिए उनके ऊपर किताब ही लिख डाली। उस समय वे रक्षा मंत्री थे। जब मायावती मुख्यमंत्री बनी तो उन्होंने यह सूची जारी करने की धमकी दी मगर औपचारिक रूप से वह सूची कभी जारी नहीं की गई क्योंकि नैतिकता की दुहाई देने और सामाजिक जीवन में बढ़ी  बातें करने वाले सम्मानित पत्रकारों ने राम रहीम की तरह उनके चरणों में नतमस्तक होते हुए गुहार लगाई कि मैडम हमारे अंदर तो रीढ़ की हड्डी ही नहीं हैं। हम लोग तो खानदानी दरबारी है। जिसका राज होता है उसकी प्रशंसा में कलम चलाते हैं। 

वे उनकी सफाई से संतुष्ट हो गई और यह सूची कभी बाहर नहीं आई। मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में जहां अमिताभ बच्चन, हरिवंश राय बच्चन से लेकर जानी मानी सिनेमा हस्तियों व उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाली खेल, साहित्य व लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट स्थान बनाने वालों को पुरुस्कृत किया गया वहीं उनके बेटे व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ज्यादा उदार और स्पष्टवादी निकले। उन पर जातिवादी होने के आरोप लगते आए थे। मगर यश भारती पुरस्कार बांटते समय कहीं भी उनकी जातिवादी नीति की झलक नहीं मिलती है। 

यह भी क्या संयोग है कि जिस मुलायम सिंह यादव को देश का आम यादव अपनी आशा और उम्मीद के रूप में देखता है उन्हीं के यश भारती ईनाम का खुलासा करने वाले पत्रकार श्याम लाल खुद भी यादव हैं। वे अपनी निष्पक्षता, निर्भीकता और भय व प्रभाव मुक्त पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। उन्हें जो जानकारी दी गई वह तो चौकाने वाली है। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 2016-17 में दिए गए यश भारती पुरुस्कारों के विजेता को 11 लाख रुपए की राशि व आजीवन 50,000 रुपए की पेंशन दिए जाने का प्रावधान था। आमतौर पर चंपुओं का चयन एक चयन समिति द्वारा किया जाता है मगर अखिलेश यादव तो इतने उदार थे कि उन्होंने खुद उसे मांगने वालों तक को उपकृत कर दिया। ऐसा करते समय उसकी योग्यता, क्षमता, उम्र, योगदान सभी को दरकिनार कर दिया। उनका दिल बेहद उदार था।

यश भारती पाने वालो की पूरी सूची अजब लोगों से भरी हुई है। जैसे कि एक पूर्व वरिष्ठ आईएएस अफसर की 90 वर्षीय मां को तो महज इस आधार पर यश भारती पुरुस्कार थमा दिया गया क्योंकि उनके सभी बच्चे सरकारों में बहुत अच्छे पदों पर थे। कहीं आला अफसरों की बीवियों और बच्चो को इससे नवाजा गया तो कहीं पत्रकार की सिफारिश पर लोगों को इस सूची में शामिल किया गया। एक ईनाम प्राप्तकर्ता तो महज 20-21 साल की है। एक महिला को इसलिए पुरस्कार प्रदान किया गया क्योंकि वह मंच का संचालन करती आई थी। 

अखिलेश की उदारता की हद तो तब हो गई जबकि इस कार्यक्रम को कवरेज करने आई महिला ने मंच से ही उनके पास अपना नाम लिखवा दिया। उसको यह ईनाम दिए जाने का आधार यह बताया गया कि दूरदर्शन में रहते हुए उसने मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव के तमाम सरकारी कार्यक्रमों की कवरेज की थी। ऐसे लोगों की सूची बहुत लंबी है। 

मेरा मानना है कि अखिलेश से बड़ा सत्यवादी और व्यवहारिक नेता और हो ही नहीं सकता है। जब सत्तारूढ भाजपा ने यश भारती इनामों पर रोक लगाने और अब तक प्रदान किए गए आवंटियो के मामले की जांच पड़ताल करवाने का ऐलान किया तो अखिलेश की प्रतिक्रिया बहुत सटीक थी। उन्होंने कहा कि हमने अपने दरबारियों को ईनाम बांटे। आप अपने दरबारियों को इससे भी ज्यादा ईनाम बांटे आपको कौन रोकता है?

उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। इससे जहां एक और उन्होंने यह साबित किया कि ईनाम व खैरात हासिल करने वाले उनके दरबारी थे वहीं उन्होंने भावी विजेताओं को भी दरबारी घोषित कर दिया। अब कोई भी व्यक्ति यह ईनाम लेने के पहले कई बार सोचेगा। ध्यान कि लालू यादव ने भी अपनी प्रशंसा में लालू चालीसा तैयार करने वाले एक भांड कवि को राज्यसभा का सदस्य बना दिया था। उप-प्रधानमंत्री रहते हुए जब देवी लाल ने अपने रिश्तेदारों को अहम पदों पर नियुक्त किया तो उन्होंने आलोचना के जवाब में सिर्फ इतना ही कहा था कि सत्ता आने पर अपने नहीं तो क्या गैरो को फायदा पहुंचेगा।  अंधे बांटे रेवड़ी भर-भर अपनो को दे यह कहावत सदियो से चली आ रही है। अखिलेश ने जो किया उसके बाद इसमें बदला कर कहना होगा कि राजा बांट अशर्फियां, भर-भर दरबारियों को दे। अखिलेश तो चश्मा तक नहीं लगाते हैं।

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