Loading... Please wait...

कनाडा में क्रिसमस व मंदिर दर्शन

विवेक सक्सेना
ALSO READ

क्रिसमस का त्यौहार मुझे बचपन से ही बहुत अच्छा लगता है। अपना एक ईसाई दोस्त था। जब मैं क्रिसमस पर उसके घर जाता तो वह घर को काफी सजाता था। तरह-तरह के पकवान मुझे खिलाता था और चलते समय उपहार भी देता। मैं जब कनाड़ा के लिए चला तो मन में 25 दिसंबर को होने वाले क्रिसमस को लेकर उत्साह था। सोच रहा था कि इस बार दुनिया के इस ईसाई बाहुल्य देश में जाकर देखूंगा कि विकसित देश के अमीर लोग इस पर्व को कैसे मनाते हैं? 

जब बेटे के घर वेंकूवर पहुंचा तो पाया कि तमाम घरों के बाहर रंगीन बिजली की लाइटे लगी थी। कुछ लोगों ने अपने दालान में सांता क्लॉज के पुतले भी रखे थे। मैं जब घूमने जाता तो कई बार घर के बाहर अंग्रेंज लोग मिल जाते। वे मुस्कुरा कर हैलो तो कहते मगर उसके आगे कोई बात नहीं करते। मुझे लगता था कि कम से कम मेरा पड़ोसी या सामने के घर का मालिक तो मुझे जरूर अपने घर में होने वाले समारोह में शामिल करेगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

क्रिसमस के दिन बेटे की छुट्टी थी। अतः हम लोगों ने घूमने का फैसला किया। मगर बेटे ने बताया कि आज हम लोग बाहर खाना खाना तो दूर रहा चाय कॉफी तक नहीं पी सकते हैं। वजह यह कि क्रिसमस वाले दिन कनाड़ा में राष्ट्रीय अवकाश होता है और सभी दुकाने व रेस्टोरेंट बंद रहते हैं। वहां मुहल्लों में स्थित ड्रिस्टिक सेंटर एकदम खाली रहते हैं। अन्यथा वहां हर रोज हजारों की तादाद में शापिंग करने आए ग्राहकों की गाडि़या खड़ी होती है। 

जबकि मुझे लग रहा था कि आज कुछ नया खाने को मिलेगा। सारा दिन घर पर बिताने के बाद शाम को बेटे ने कहा कि हम लोग घूमने जा रहे हैं। घर से करीब 30 किलोमीटर दूर हम लोग लफ्फाजे लेक गए। वहां जाते समय रास्ते में काफी भीड़भाड़ थी। क्रिसमस का दिन होने के कारण बड़ी तादाद में लोग सपरिवार घूमने निकले थे। इस झील के थोड़ा पहले सड़क पर किनारे के साथ कारें खड़ी थी। बेटे ने बताया कि यहां मीटर में एंट्री करके हम लोग एक से छह डालर/घंटे की दर के वहां गाड़ी पार्क कर सकते हैं। 

हम लोग झील के इलाके में घुस गए जहां कई एकड़ में निःशुल्क पार्किंग का प्रबंध था। करीब डेढ़ एकड़ में फैली यह झील चारों तरफ से बेहद सुंदरता के साथ सजाई गई थी। वहां रंगीन लाइटो के अलावा बिजली के रेंडिपर बने थे। पेड़ तक सजाए गए थे। बीच झील में बिजली के सुंदर हंस व दूसरे जानवर तैर रहे थे। पहले यहां खाना हुआ करता था मगर 1970 में सरकार ने इस झील को शहर को सौंपने का फैसला किया व वहां लाइटे लगाने व पार्किंग का प्रबंध किया गया। 

झील 4 से 12 मीटर तक गहराई वाली है। हर साल 24 नवंबर को यह आयोजन शुरू होता है और 30 जनवरी तक चलता है। वहां काफी तादाद में परिवार आए थे। कुछ लोग तो अपने कुत्तो को भी ले आए थे। झील के चारों और काफी ठंड थी और मफलर लपेट लेने के बाद भी उसे महसूस कर सकते थे। रास्ते में कई जगह पर सर्दी से बचाव के लिए गरम वैट बने थे जिनसे गरम हवा आ रही थी। मेरी बहुत इच्छा थी कि एक कप गरम-गरम चाय कॉफी या सूप मिल सके। मगर पूरे रास्ते में ऐसी एक भी दुकान नहीं मिली। 

मेरी समझ में यह नहीं आया कि जब वहां गरम शिविर स्थापित किए जा सकते हैं तो गरम चाय, काफी के स्टाल क्यों नहीं लगाए जा सकते? अधिकांश लोग अपने परिवार के साथ फोटो खिचवाने में व्यस्त थे। करीब घंटा भर टहलने के बाद वापस लौटने के लिए गाड़ी में बैठते ही काफी सुकून मिला क्योंकि एसी के कारण वहा अंदर काफी गर्म थी। लौटते समय बेटे ने कहा कि हम लोग मंदिर जा रहे हैं। आज मंगलवार है। वापस डेल्टा लौटने पर वह हमें एक मंदिर में ले गया जोकि काफी विशाल था। 

मंदिर को रंगीन लाइटों द्वारा सजाया गया था। वहां पार्किंग का बहुत अच्छा इंतजाम था। करीब 500 कारें खड़ी की जा सकती थी। हम लोग उतर कर सीढि़या चढ़ कर मंदिर की पहली मंजिल पर पहुंचे। वहां एक बहुत बड़ा हाल था व बाई और बाहर जूते चप्पल रखने के लिए खाने बने हुए थे। पास में ही हाथ धोने के लिए वॉशरूम था। हम लोग दरवाजा खोलकर कर अंदर गए जोकि करीब पौने एकड़ का वातानुकूलित हाल था व दूसरे हाल में कालीन बिछा हुआ था। करीब 500 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। किनारे कुछ कुर्सिया भी रखी थी। सामने कुछ ऊंचे चबूतरे पर भगवान की मूर्तियां रखी हुई थी व दाहिनी ओर भगवा कपड़े पहने एक सज्जन धार्मिक भाषण दे रहे थे। 

चबूतरे के बाएं और दो पंडित बैठे थे जोकि भक्तो को गंगाजल व प्रसाद देते थे। सामने हनुमानजी की मूर्ति नजर आ गई। उसके सामने ही हनुमान चालीसा नजर आ गई। मैंने लपक कर उसे पढ़ना शुरू कर दिया। आस-पास किसी भी मूर्ति पर एक फूल तक नहीं चढ़ा था। इस बीच कुछ लोग वहां लड्डू व जलेबी के डब्बे लेकर आए व चढ़ा कर चले गए। मैं पूजा कर बाहर आया तो बेटे ने नीचे चलने को कहा। जब हम नीचे हाल में गए तो वहां बड़ी तादाद में कुर्सिया व मेजे लगी थी। एक जगह साफ थालियां व चम्मच रखे थे। हमने उन्हें उठाया व खाने के काउंटर पर पहुंचे। कुछ युवक कटोरियां बनी इन थालियो में खाना परोस रहे थे। 

मैंने उनसे बहुत कम सामान डालने का अनुरोध किया। उन्होंने दाल मखनी, शाही पनीर, आल गोभी की सब्जी परोस दी। वे गरम रोटियां व पूरी भी परोस रहे थे। रायते, खीर का भी प्रबंध था। सामने एक मेज पर सलाद, लड्डू व नमकपारे भी रखे थे। थोड़ी दूर पर फीकी चाय का प्रबंध था व उसके साथ एक डोंगी में चीनी  रखी थी। देखते ही देखते अनेक परिवार वहां आने लगे जोकि या तो अधेड़ थे अथवा बुजुर्ग। बड़ी तादाद में सिख भी आए थे। गरम-गरम खाना वास्तव में काफी स्वादिष्ट था। हम सपरिवार चाय पीकर वहां से निकले। और क्रिसमस के दिन मंदिर दर्शन भी हो गए।

234 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech