Loading... Please wait...

आबोहवा में ताजगी और वक्त

विवेक सक्सेना
ALSO READ

समय का इन दिनों भान नहीं रहता। पत्नी ने उठाया और कहा उठ जाओ चाय तैयार है तो मन नहीं हुआ। मैं उस समय गुदगुदी गर्म रजाई में लिपटा हुआ सो रहा था। बाहर अंधेरा था। मैं समय का अंदाजा नहीं लगा पाया। मैंने चाय पीने के बाद पूछा कि क्या टाइम है? जवाब मिला कि सात बज रहे हैं। मैं तय नहीं कर पाया कि शाम के सात बजे हैं या सुबह के हैं। कारण यह है कि जब मैं सोने के लिए बिस्तर में घुसा था तब दोपहर के दो बजे थे। एक बार भी मेरी नींद नहीं टूटी। 

कनाडा में समय व तारीख का तो वैसे भी अंदाजा नहीं रह पा रहा है। जब से कनाड़ा आया हूं तब से ज्यादातर समय सोने में ही बिता रहा हूं। मैं कितना सोता हूं यह बता ही नहीं सकता। फिर भी नींद आ जाती है। जब दिल्ली से चला था तब सुबह थी व मुंह अंधेरा था और विमान के उड़ने के आधे घंटे बाद ही जब मैंने खिड़की के बाहर झांका तो आसमान में अंधेरा नजर आया। जब 14 घंटे बाद वेंकूवर पहुंचा तब वहां सुबह के 9.30 बज रहे थे मगर बारिश हो रही थी व रोशनी बहुत कम थी। 

यहां सुबह 7.30 बजे सूरज निकलता है और शाम को 4 बजे डूब जाता है। बाकी समय अंधेरा छाया रहता है। घर हाईवे पर है मगर जरा सी भी आवाज नहीं आती है। मेरी समझ में नहीं आया कि हमने तो बचपन में पढ़ा था कि ब्रिटिश राज में कहा जाता है कि अंग्रेंजो के शासन में सूरज नहीं डूबता है। कहावत के मुताबिक पूरी दुनिया में उनका शासन इतने ज्यादा देशों में फैला हुआ था कि अगर एक देश में रात हो जाती तो तब तक दूसरे किसी और देश में सुबह हो चुकी होती। 

कनाड़ा भी अंग्रेंजो के शासन में रह चुका था। मगर मुझे यह बात गलत होती नजर आई। आज भी इस देश की शासनाध्यक्ष ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ही हैं। मैं तो अभी तक वेंकूवर में ही बहुत थोड़ा सा घूमा हूं पर वह बेहद साफ-सुथरा व हरा-भरा है। चारों और चीड़ व देवहार के वृक्ष हैं। कुछ वृक्ष तो मेरी दिल्ली स्थित 7वीं  मंजली सोसायटी से भी ज्यादा ऊंचे हैं। 

यहां लकड़ी बहुत होती है व उतना ही ज्यादा उसका उपयोग किया जाता है। घर बहुत सुंदर है जिनकी छत ढलान वाली है। ज्यादातर घर दो मंजिले है। हालांकि एकाध बहुमंजली इमारते भी नजर आई। घरों के बाहर बाउंड्री  वाल नहीं होती है। घर की दीवार से सड़क तक सुंदर घास के मैदान होते हैं। किसी भी घर में लोहे की ग्रिल नहीं होती है। मैंने कुछ नए बन रहे घरों को देखा जोकि लकड़ी से तैयार किए जा रहे थे। लोगों के घर के बाहर लगे पेड़ो पर रंगीन लाइटे व आंगन में खिलौने लगे थे। 

याद रहे कि क्रिसमिस की तैयारियां चल रही थीं। मुझे आए 4-5 दिन हो गए मगर मैंने इस बीच एक भी इंसान को सड़क के किनारे फुटपाथ पर टहलते हुए नहीं देखा। कोई वाहन चालक हार्न नहीं बजाता है। दोपहिया वाहन जैसे स्कूटर व मोटर साईकिल तो देखने तक को नहीं मिले। आज जब बेटे के साथ सामान लेने के लिए निकला तो रास्ते में एक एयर कंडीशनर कार में पोस्टमैन चिट्टिया बांटता हुआ नजर आया। दिल्ली में तो अब वह दिखाई ही नहीं देता है। 

लंबी-चौडी साफ सड़के और हरियाली मन को मोह लेती है। हवा बेहद साफ व ठंडी है। जब सांस लेता हूं तो अंदर तक बहुत अच्छा महसूस होता है। अंतः जब भी सांस लेता हूं तो दिल्ली मे हर दिन अखबरों में छपने वाले वायु प्रदूषण के आंकड़ो की याद आ जाती है। यहां के बाजार बहुत बड़े और व्यवस्थित हैं। वे कई-कई किलोमीटर में फैले हुए हैं। ज्यादातर एक मंजिला दुकाने हैं। बेटे ने कार अग्रवाल स्वीट्स के सामने रोकी और वहां से समोसे और जलेबी लेकर आया। ज्यादातर दुकानों पर भारतीय नाम ही थे। जैसे रूपकला ज्वैलर्स, ढिल्लो, संधू फर्नीचर, ग्रेवाल इलेक्ट्रानिक्स आदि। 

गाड़ी चलाने से लेकर पार्क करने तक बहुत ध्यान रखना पड़ता है। कार पार्क करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि वह जमीन से खींची गई दो लाइनों के बीचो-बीच खड़ी रहे व उसका व साथ वाली कार के दरवाजे खोलते समय वे आपस में ना टकराएं। बाहर काफी ठंड थी। हालांकि तापमान महज 8 डिग्री सेटीग्रेड ही था। वह भी तब जब टीवी पर बताया जा रहा था कि दिल्ली में यहां से कही कम तापमान हैं। यहां बाजार बहुत साफ सुथरे व बड़े हैं। कहीं भी भीड़-भाड़ नहीं दिखाई पड़ती है। 

संयोग से बेटा एक इलेक्ट्रानिक की दुकान से मेरे लिए सेटटॉप बॉक्स व कुछ दूसरा सामान लेने गया था। उसने मेरे लिए एक काफी बड़ा टीवी खरीदा था ताकि मैं अपना समय काट सकूं। हम भारतीय लोगों की आदत है कि किसी भी वस्तु के गुणों से ज्यादा उसके दामों व उससे होने वाली किफायत में रूचि लेते हैं। इसे लेकर एक विज्ञापन भी बना था जिसमें एक महंगी याट्च (स्वचालित नौका) खरीदते समय खरीददार सेल्समैन से पूछता है कि यह कितना माइलेज देती है। हालांकि व्यासजी ने चलने के पहले ही आगाह कर दिया था कि कुछ भी खरीदते समय उसके दामों को रुपए में परिवर्तित मत करना। 

मालूम हो कि कनाड़ा में डालर चलता है जिसकी कीमत करीब 55 रुपए है। सारी चीजों के दाम डालर व सेंट में ही होते हैं। सच कहूं तो मैं अपनी आदत से मजबूर खुद ही तमाम चीजों के दामों को 55 से गुणा कर लेता था। इसकी वजह यह जानने के लिए मेरा कौतुहूल था कि उसके यहां व भारत के दामों में कितना अंतर है। मैंने पाया कि हम भारतीयों की समस्या यह है जब हम अपने खर्च को डालर में बदलते हैं तो वह काम आमदनी के साथ नहीं करते हैं। क्योंकि यहां आय भी उसी के अनुरूप नहीं होती है व सरकार चाहती है कि लोग अपना अच्छा जीवन  जीने के लिएखुलकर खर्च करें। हालांकि यहां रिश्वत जैसी कोई चीज नहीं है। और जान ले कि जुगाड़ और जान-पहचान से काम नहीं निकलता है।

248 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech