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अपनो ने ही तख्ता पलटा मुगाबे का

विवेक सक्सेना
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अपना मानना रहा है कि शरीर से आत्मा, पर्स से पैसे व सत्ता से नेता बहुत मुश्किल से निकलते हैं। जिंबाब्वे के शासक राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे इसका जीता-जागता उदाहरण है। वे 93 साल के हो चुके हैं और अपनी ही सेना द्वारा अपदस्थ किए जाने व महल में कैद किए जाने के बाद भी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं है। वहां की जनता उनके खिलाफ सड़कों पर उतर आई हैं व उनके खिलाफ प्रदर्शन जारी है। 

यह नौबत उनकी ही पार्टी के उपराष्ट्रपति एमर्सन म्नांगागवा व उनकी पत्नी ग्रेस जिसे कि वहां डिसग्रेस के नाम से बुलाया जाता है उनके बीच चल रहे सत्ता संघर्ष को लेकर पैदा हुई है। ग्रेस चाहती है कि उनके 93 वर्षीय पति अपने जीवन काल में ही उनके हक में अपना पद छोड़ कर उन्हें देश का नया राष्ट्रपति घोषित कर दें। राबर्ट मुगाबे पहले ही उन्हें अपनी पार्टी जिंबाब्वे, अफ्रीकन नेशनल यूनियन या जानू की महिला इकाई का अध्यक्ष बना चुके हैं। 

सपा की तरह उनकी पार्टी भी युवा व बुजुर्ग नेताओं के बीच बंट चुकी है। उनकी गिनती दुनिया के सनकी तानाशाहों में होती हैं। वे दुनिया में एकमात्र ऐसे नेता है जिसे ब्रिटेन की महारानी ने 1994 में नाइटहुड से सम्मानित किया व उनकी हरकतों और करतूतों को देखते हुए 2008 में इस सम्मान को वापस ले लिया। ऐसा ही कुछ एडिनबर्ग विश्वविद्यालय ने भी किया। उसने डाक्टरेट की मानद उपधि दी व बाद में उसे वापस लेने का ऐलान किया। शैतान का अवतार कहलाने वाले इस शासक ने अपने चार दशक के शासन में अपने देश को इतनी बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया। कुछ साल पहले तो लोगों को पेट भरने के लिए वहां सौ हाथियों को मारना पड़ा था।

राबर्ट मुगाबे एक वामपंथी गुरिल्ला थे। वे पहले एक शिक्षक थे और फिर बाद में उन्होंने अपने देश रोडेशिया (जिंबाब्वे) को ब्रिटिश शासन से मुक्त करवाने के लिए गुरिल्ला युद्ध छेड़ा। वे गिरफ्तार हुए और जेल में कैद कर रखे गए। अंततः 1980 में वे चुनाव के जरिए सत्ता में आए और इस ब्रिटिश उपनिवेश के प्रधानमंत्री बने। शुरुआत में उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की बात कहीं और दावा किया कि वे वहां के गोरों के साथ मिलकर इसे एक नया देश बनवाएंगे। 

शुरुआत में उनका रवैया काफी अच्छा रहा। उन्होंने अपने देश का नाम जिंबाब्वे कर दिया और वहां की राजधानी सैलिसबरी को बदल कर उसे हरारे कर दिया। मगर कुछ वर्षों बाद उनकी कार्यप्रणाली बदल गई। जब उन्होंने सत्ता संभाली थी तो यह देश सोने ही नहीं हीरे की खान कहा जाता था। वहां बहुमूल्य धातुओं व खनिजो के भंडार थे। वहां के कृषि उत्पादन पूरी दुनिया में निर्यात किए जाते थे। मगर समय के साथ-साथ वे अंग्रेंज गोरो के खिलाफ होते चले गए। उन्होंने 1987 में अपने देश का संविधान बदलकर खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। वे अंग्रेंजो को देश का सबसे बड़ा दुश्मन कहने लगे। 

पहले ब्रिटेन, अमेरिका व यूरोपियन यूनियन भी इस देश की खासी आर्थिक मदद करता था। बाद में उन्होंने अपने देशवासियों को गोरो की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए उकसाया। पहले कहा कि अंग्रेंज अपनी इच्छा से किसी भी अफ्रीकी को अपने खेत बेच सकते हैं। उन पर अपने साथी गुरिल्लो का दबाव पड़ रहा था जोकि जीवनयापन के लिए पेंशन चाहते थे। उन्होंने पेंशन जुटाने के लिए जब कर बढाने चाहे तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ। अतः उनकी सरकार ने कानून बनाकर किसी भी गोरे की संपत्ति जब्त कर लेने का अधिकार हासिल कर लिया। गुरिल्ला रहे इन बेरोजगारों को गोरों की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए उकसाया गया। उनकी आड़ में उनकी पत्नी से लेकर सेना के आला अफसरों तक ने हजारों एकड़ उपजाऊ जमीनों पर कब्जा कर लिया। 

मगर उन लोगों का खेती से कुछ लेना-देना नहीं था। अतः फसले चौपट होने लगी। उद्योग व्यापार बंद होने लगे क्योंकि यह सब गोरे ही संचालित कर रहे थे। उन्होंने गोरों के दिलो में दहशत पैदा की और बड़ी संख्या में वे लोग देश छोड़कर जाने लगे। इसका असर यह हुआ कि इस देश में खाद्यान्न का उत्पादन बहुत तेजी से घटा। जहां कभी 200 मिलिमटन मक्का होती थी वह घटकर 4.50 लाख टन रह गई। देश को अपनी जरूरत का 75 फीसदी अनाज आयात करने की नौबत आ गई। वहां दो तिहाई लोग बेरोजगार है। सिर्फ 20 फीसदी बच्चे ही स्कूल जाते हैं। महिलाओं की औसत आयु घट कर 64 साल व पुरुषों की 53 साल रह गई है। मुद्रास्फीति की दर 7600 फीसदी है। 

वहां की मुद्रा की कीमत का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि भरपेट खाना खाने के लिए जरूरी एक ब्रेड खरीदने में एक दिन की दिहाड़ी का तीसरा हिस्सा खर्च हो जाता है। मुगाबे ने लगातार सत्ता में बने रहने के लिए अपने विरोधियों का दमन किया। अपने ही अश्वेत विरोधी को क्रूर यातनाएं दी। उन्हें तो जिंबाब्वे का गद्दाफी या सद्दाम हुसैन कहा जाता है। जब उन्होंने गोरो को निशाना बनाया तो ब्रिटेन, अमेरिका यूरोपियन यूनियन व आईएमएफ ने उनके देश को दी जाने वाली आर्थिक मदद बंद करने के साथ दुनिया भर में उनके खाते जब्त करके उनकी विदेश यात्राओं पर प्रतिबंध लगा दिया। 

उत्तरी कोरिया की तरह सिर्फ चीन व रूस ही उसके साथी रह गए हैं जोकि अपने वीटो का उसके पक्ष में इस्तेमाल करते रहते हैं। राबर्ट मुगाबे ने अपनी टाइपिस्ट ग्रेस से दूसरी शादी कर ली जोकि उम्र में उनसे 40 साल छोटी है। उनकी पहली पत्नी सैली हैफरान बहुत अच्छी महिला थी मगर मुगाबे का अपनी टाइपिस्ट के साथ ईश्क शुरू होने पर 1992 में उनकी पत्नी का निधन हो गया और 1996 में उन्होंने ग्रेस से शादी कर ली जिससे उनके शादी के पहले ही दो बच्चे हो चुके थे। 

कभी गांव में मुर्गे बेचने वाली उनकी यह दूसरी पत्नी माओ की तीसरी पत्नी जिंग फियांग सरीखी थी जोकि उनके दफ्तर में टाइपिस्ट थी व उनसे काफी छोटी थी। उसने सत्ता का केंद्र बनने की कोशिश की व माओ के मरने के बाद उसे उसके भ्रष्टाचार के कारण मौत की सजा दी गई थी जिसे बाद में जेल कैद में बदल दिया गया। बाद में उसने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। 

ग्रेस को गुक्की ग्रेस के नाम से बुलाया जाता है क्योंकि वह इंटरनेशनल ब्रांड गुक्की की बहुत शौकीन है उसने अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान एक दिन में 75,000 पौंड की शॉपिंग की थी। वह बेहद बदतमीज है व हांगकांग, मलेशिया, ब्रिटेन आदि में फोटोग्राफरों, माडलों के साथ मारपीट कर चुकी है। उसने दुनिया के तमाम शहरों में अपनी संपत्ति खरीदी है। मुगाबे ने उसे पार्टी की महिला विंग का अध्यक्ष बना दिया और उसने अपने दल में जी-40 (ग्रुप-40) तैयार किया जोकि युवा नेताओं का समूह है जो कि पार्टी  बुजुर्ग नेताओं के खिलाफ है। 

वह तो मुगाबे के न रहने पर राष्ट्रपति बनने के सपने देख रही थी। हाल में उसने एक रैली में कहा था कि मैं राष्ट्रपति क्यों नहीं बन सकती? क्या मैं जिंबाब्वे की नागरिक नहीं हूं। उसने ब्रिटेन के लंदन विश्वविद्यालय से पत्राचार कोर्स करना चाहा मगर पहले सिमेस्टर में महज 7 फीसदी अंक हासिल होने के बाद उसे इससे बाहर कर दिया गया। इस आठवीं पास महिला को जिंबाब्वे विश्वविद्यालय ने डाक्टरेट की डिग्री प्रदान की है क्योंकि राबर्ट मुगाबे इस विश्वविद्यालय के चांसलर थे। मगर अब उन्हें राष्ट्रपति पद भी छोड़ना पड़ा है।

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