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राहुल ने उतारा है मोदी का खुमार!

श्रुति व्यास
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चाहे तो इसे लोगों की सदइच्छा से राहुल गांधी का उठाव माने। इसलिए कि ऐसा चाहने वाले लोग अब असंख्य है कि राहुल गांधी और दमखम से मुकाबला करें। यों 2014 में भी नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुकाबला था। लेकिन उस मुकाबले में बुरी हार के बाद आगे के प्रदेशों के चुनाव में नरेंद्र मोदी बनाम कोई नहीं हो गया था। 2016 में वह माहौल कुछ बदला। मुकाबला नरेंद्र मोदी बनाम अन्य याकि पूरे विपक्ष के बीच में तब्दील हुआ। लेकिन 2018 के जाते-जाते अनहोनी है। 2019 और आम चुनाव का वक्त शुरू होने वाला है। उस नाते साल का आश्चर्य जो हिंदी पट्टी के प्रदेशों सहित गुजरात (आंशिक रूप से) ने हवा बदली। तभी फिर से अखाड़े में आमने-सामने नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी है।

ऐसा कैसे?  वजह है चारों तरफ हवा का बदलना। लोगों का मनोभाव बदलाव के संकल्प की धारणाओं में सोच-विचार करने लगा है। 

गांव था निंभी। जयपुर से कोई तीस किलोमीटर दूर। लोग मतदान के लिए कतार में खड़े थे। कुछ लोग जिनमें बूढ़े, नौजवान सभी थे, वोट डालने के बाद मतदान केंद्र के पास ही बड़े दालान में बैठे राजनीति पर चर्चा कर रहे थे। बात  चल रही थी कि कौन अच्छा मुख्यमंत्री- अशोक गहलोत या वसुंधरा राजे?  लोगों को सुनते हुए मैंने अचानक पूछ लिया- “प्रधानमंत्री को ले कर क्या सोच रहे है?  कौन होना चाहिए? ” एक कौने से जवाब मिला-“ राहुल गांधी। हम लोग राहुल गांधी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं।”

मैं अचंभित, ठिठक गई! सोचा नहीं था ऐसा जवाब मिलेगा। 

भला राहुल गांधी! संभावित प्रधानमंत्री के रूप में! एक गांव में! आम तौर पर यह बात सुनाई नहीं दी थी। अभी तक तो कभी नहीं, किसी भी आधार पर नहीं।

क्या अजब बात!  कुछ समय पहले तक तो, खुद उनकी पार्टी से निकली गपशप से उन्हे भारतीय राजनीति का   पप्पू बताया जा रहा था और आज उनको लेकर बदलता विचार!  वक्त था जब राहुल के समकक्षों ने भी उनकी टांग-खिंचाई में कसर नहीं छोड़ी थी। जहां उनकी पार्टी के लोग ही उनसे कन्नी काटते नजर आते थे, वही विरोधी पार्टियों के लोग जमकर खिल्ली उड़ाते थे। उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी थी जिसकी नियति में सर्वाधिक पुरानी, बूढ़ी कांग्रेस पार्टी का राजनैतिक खात्मा है। लेकिन पांच साल बाद आज अपने दो बडे अस्त्र धैर्य और वक्त से वे हालातों को बदलाते दिख रहे है। सबको राहुल गांधी का प्रदर्शन बेजोड़ दिख रहा है, शायद इसलिए भी कि उनसे उम्मीद ही नहीं थी। वे नाउम्मीदों के बीच उम्मीद में खरे उतर रहे है। वह भी सैद्धांतिकता के साथ और सहजता से मजे लेते हुए। 

एक वक्त था जब मीडिया ने उनका गुस्सैल, अंहकारी रूप दिखाया था। तब उन्होने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठों द्वारा तैयार अध्यादेश की प्रति फाड़ डाली थी। तब उसे बेवकूफी और नादानी जैसा कदम बताया गया और  माना गया कि वे किसी ऊंचे ओहदे के लायक नहीं हैं। 

लेकिन आज सब कुछ बदला हुआ है। वे मीडिया के कवर है। उसकी स्टोरी है। मीडिया में पेश हुई ताजा तस्वीर की ये कुछ बानगी है- ए चेलेंजर इज बोर्न (ओपन मैगजीन), द राहुल रिबूट (इंडिया टुडे), गेम ऑन (आउटलुक)। इतना ही नहीं, लंदन के  इकॉनोमिस्ट ने लिखा है - “उपहास के पात्र ने बड़ी चुनौती दे डाली“(‘derided princeling into a credible challenger’)

सो गांधी नामदार को जनता से प्राप्त हो रहे है विस्मरणीय क्षण! आखिरकार एक प्रतीकात्मक जीत हासिल ऐसी हुई कि उन्होंने अपने बारे में फैले सभी भ्रम दूर कर दिए। विरोधियों की जुबान बंद हो गई। राहुल बाबा कहना बंद हो गया। तीन हिंदी राज्यों की जीत ने दिखा दिया है कि राहुल गांधी आखिरकार वह राजनीतिक समझ लिए हुए है या हासिल कर चुके है जिसे लोग उनमें देखना चाहते हैं।

लेकिन जीत का श्रेय राहुल गांधी की काबलियत व  उनकी समझ को ही नहीं जाता है!  

असली वजह पांच साल का घटनाक्रम है जिसने राहुल गांधी को पप्पू से पोलिटिकल कंपीटिटर बनाया है और इसकी जिम्मेवार वजह नरेंद्र मोदी का जनता की उम्मीदों में फेल होना है। राहुल का अभ्युदय इसलिए है क्योंकि नरेंद्र मोदी का डाउनफॉल है। लोगों की उम्मीदों के शहनशांह बन नरेंद्र मोदी ने लोकप्रियता की जो पूंजी बनाई थी उसे उन्होने पांच सालों में धीरे-धीरे जैसे गंवाया है उसने राहुल गांधी को उभारा है। मोदी की लोकप्रियता धीरे ही सही क्रमशः राहुल की तरफ शिफ्ट हुई है। चुनावी राज्यों की सभा हो या प्रयागराज का ताजा जमावड़ा उसमें मोदी के लिए आई भीड़ सिमटी दिखी है तो उत्साह भांप की तरह उड़ा हुआ और लोगों का रूख उदासीन। यही नहीं कई जगह तो यह खौफ भी झलका कि लोग अपनी बैचेनी, निराशा, हताशा को जाहिर करें या न करें। लोगों का यह वह मनोभाव है जिसमें राहुल गांधी ने चुपचाप प्रवेश किया और अपनी जगह बनाते हुए जनता के दिल को छूने का मजा लेने लगे। 

हां, इस एक साल में, खासतौर से कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के बाद राहुल की चाल-ढाल, बातचीत, तौर-तरीकों में जहां गजब का बदलाव है तो जनता की चाहत में भी वे फिट हुए है। 

मैं हाल के चुनावों के दौरान मध्यप्रदेश और राजस्थान में राहुल गांधी की रैलियों में गई थी। मध्यप्रदेश के मंडीद्वीप और राजस्थान में भीलवाड़ा में उनकी जनसभाएं देखी। लोगों का मूड देखने, समझने लायक था। उनमें देखने, ध्यान से सुनने में दिलचस्पी थी तो राहुल भी इसमें बराबर की दिलचस्पी लिए हुए थे कि लोग उन्हें सुनें। उन्हें देखने-सुनने के लिए भीड खुद ब खुद पहुंचती हुई भी दिखी। लोगों का स्वंयस्फूर्त हुजूम कम नहीं था। भीलवाड़ा (जो कि भाजपा का गढ़ माना जाता है) तक में राहुल गांधी की सभा में जबर्दस्त भीड़ थी। गए वे दिन जब राहुल गांधी बोलते हुए बेगाने, बेतरीब, अराजनैतिक दिखते थे। बोलने के वाक्य और जुमलों का टोटा होता था। वे अब भाषण करना जान गए है। दोनों जगह उन्होने लगभग 45 मिनट भाषण दिया। और जैसे नरेंद्र मोदी जनता से कनेक्ट बनाया करते थे (इन दिनों बनाने की कोशिश करते है) वैसे राहुल गांधी भी अब पूछते है, बताओं, चौकीदार.....! 

हां, चौकीदार चोर है का जुमला इतना लोकप्रिय हो गया है कि राहुल गांधी भी चौकीदार बोलते हुए उल्लसित भाव मुस्कराते है तो जनता भी इंतजारी में होती है चोर है बोल कर वाक्य पूरा करने को। सचमुच राहुल गांधी को सुनने, चाहने वाली जनता मिल गई है! अब पप्पू को हूट करने वाले नहीं है बल्कि उन्हे चाहने वाले, उनकी हिम्मत की दाद देने वाले लोग है।  

राहुल का यह उदय नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों के नशे की खुमारी का उतार है तो खम ठोंक बतौर कंपीटीटर पप्पू का अखाड़े में उतर आना भी है, वह भी जनता के हुंकारे के साथ!  

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