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चीन से संबंध सुधार का प्रयास!

श्रुति व्यास
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चीन को लेकर भारत की कूटनीति कभी नरम नरम, कभी गरम गरम वाली दिख रही है। पिछले साल गर्मियों में दोनों देशों के बीच ढाई महीने तक कूटनीतिक और सामरिक गतिरोध बना हुआ था। दोनों देशों की सेनाओं सिक्किम सेक्टर के डोकलाम में आमने सामने अड़ी थीं। तब तनाव इतना बढ़ गया था कि सेना प्रमुख ने ढाई मोर्चे पर एक साथ लड़ाई के लिए तैयार रहने की बात कही थी। पर जब से डोकलाम का गतिरोध खत्म हुआ है तब से भारत के तेवर बदल गए हैं। 

खासतौर से नए विदेश सचिव विजय गोखले के कमान संभालने के बाद पिछले दो महीने में भारत की कूटनीति में बड़ा बदलाव आया है। विजय गोखले और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने चीन की यात्रा की है और दो वरिष्ठ मंत्रियों सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण ने चीन जाकर दोपक्षीय वार्ता की है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन जा रहे हैं और 27-28 जुलाई को दिन तक चीन के राष्ट्रपति से बातचीत करेंगे। 

यह वार्ता बहुत दिलचस्प है क्योंकि इसके अंत में न तो कोई करार होगा और न कोई साझा बयान जारी होगा। यह शिष्टाचार शिखर वार्ता है, जिसमें सभी मसलों पर खुल कर, दिल से बात होगी और गलतफहमियों को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। किसी एजेंडे के बगैर बातचीत होती है तो उससे संबंधों को मजबूत किया जा सकता है। इस सोच के साथ यह वार्ता हो रही है। 

चीन के साथ संबंध सुधार के लिए भारत की ओर से कई तरह की पहल की जा रही है। भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार चला रहे तिब्बतियों से दूरी बनाई है। आधिकारिक रूप से मंत्रियों और अधिकारियों को तिब्बत की निर्वासित सरकार के 60 साल पूरे होने के जश्न से दूर रहने को कहा गया है। इतना ही नहीं ऐसा निर्देश देने के बाद भारत ने चीन को इसकी सूचना भी दी है। 

इसी तरह पाकिस्तान सहित भारतीय उप महाद्वीप के दूसरे देशों में चीन के बढ़ते दखल पर भी भारत ने एक तरह से चुप्पी साधी है। चीन के खिलाफ बयानबाजी बंद की गई है और डोकलाम में चीन के सड़क और हेलीपैड बनाने की सेटेलाइट तस्वीरें सामने आने के बाद भी भारत ने इसे टकराव का बड़ा मुद्दा नहीं बनाया। जाहिर है कि भारत ने अपनी ओर से चीन के साथ संबंध सुधार की पहल की है। 

इसके लिए भारत अपनी विदेश नीति के पुराने मान्य सिद्धांतों से आगे बढ़ कर दोस्ती दिखा रहा है। पर सवाल है कि क्या चीन भी इसी किस्म की प्रतिक्रिया दे रहा है? क्या चीन विवाद को सारे मुद्दों को सुलझाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का साथ देने को तैयार है?

भारत के साथ संबंधों पर चीन की प्रतिक्रिया बहुत सधी हुई है। उसने किसी मामले में खुल कर कोई वादा नहीं किया है। वह पाकिस्तान के आतंकवादी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में डालने के संयुक्त राष्ट्र में लाए भारत के प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ने दे रहा है। वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध कर रहा है और भारत को पाकिस्तान के बराबर खड़ा कर दिया है। वह पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारा बना रहा है, जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरेगा। 

भारत के लिए यह सामरिक रूप से बड़ा खतरा है। आर्थिक रूप से दुनिया के अनेक देश इसे लेकर चिंतित हैं और यूरोपीय देशों ने इस पर आपत्ति की है। अब चीन चाहता है कि भारत और नेपाल को मिला कर तीन पक्षीय कारीडोर बनाया जाए। भारत इसके लिए तैयार नहीं है। मालदीव के मामले में चीन ने भारत को वहां घुसने से रोक रखा है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और लद्दाख तक में चीन ने भारत को धमकाना बंद नहीं किया है। तभी ऐसा लग रहा है कि भारत का चीन के प्रति प्रेम एकतरफा है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चौथी बार चीन की यात्रा पर जा रहे हैं। तभी कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर वे बार बार चीन क्यों जा रहे हैं? यह भी सवाल पूछा जा रहा है कि चीन के साथ संबंध सुधार के लिए साबरमती के किनारे शी जिनफिंग के साथ झूला झूलने से लेकर अब वुहान में होने वाली वार्ता से आखिरी क्या हासिल हुआ है या क्या हासिल होना है? 

चीन ने अपनी सामरिक ताकत पहले ही काफी बढ़ा ली है और अब वह आर्थिक ताकत बनने के लिए काम कर रहा है। उसमें भारत का बड़ा बाजार उसकी जरूरत है। ध्यान रहे पिछले कुछ समय से चीन अपनी रक्षा तैयारियों पर बहुत ज्यादा खर्च नहीं कर रहा है, बल्कि आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए काम कर रहा है। इसलिए वह डोकलाम में अपनी सैन्य ताकत दिखाता है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी के साथ वार्ता भी करता है। उसकी इस रणनीति को समझ कर ही भारत को अपनी कूटनीति करनी चाहिए। तभी उसके साथ सामरिक और सीमा विवाद के मुद्दों के साथ साथ व्यापार संतुलन के मुद्दे पर भी भारत को सख्ती से बात करनी चाहिए। 

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