झालावाड़: राजे का जलवा जस का तस

श्रुति व्यास
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झालरापाटन। जिले की सीमा में ज्योंहि प्रवेश हुआ तो साइनबोर्ड ‘ऐतिहासिक जिला झालावाड़ में आपका स्वागत है‘ से ऐतिहासिकता को बतलाता हुआ। विचार बना कि कुछ भी हो यह जिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए तो ऐतिहासिकता लिए हुए है! तीस से अधिक वर्ष की राजनीति में यह जिला लगातार उनका सुरक्षित गढ़ रहा है!  सांसद का चुनाव रहा हो या विधायक का, पक्ष में हो या विपक्ष में, इस जिले से लगातार जीतते जाना वसुंधरा राजे की शान है तो झालावाड़ की भी। भला तब उनके आगे नए, नौजवान चेहरे मानवेंद्रसिंह का चुनाव लड़ना क्या कोई मतलब बना पा रहा हैं? 

संदेह नहीं भाजपा से कांग्रेस में आए, प्रदेश के नामी चिंहित राजपूत परिवारों में से एक जसवंतसिंह के बेटे का वसुंधरा राजे के खिलाफ बतौर उम्मीदवार ख़डा होना अनहोनी बात है। इलाके के राजपूत मतदाताओं से ले कर भाजपाई वोटों के लिए भी मैसेज बनता है। उस नाते 2018 का यह चुनाव इलाके के लिए दिलचस्प है तो रंग-रंगीला भी। झालावाड पहली बार चुनावी लड़ाई में देश-प्रदेश के मीडिया में कौतुकपूर्ण बना। मुकाबले का माहौल झालावाड में प्रवेश के साथ ही दो बडे हार्डिग्स से झलका। प्रदेश में जैसे दूसरे शहरों में दिखाई दिया वैसे ही हार्डिग्स में अकेले वसुंधरा राजे का आदमकद फोटो। बगल में उनके बेटे दुष्यंत और प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी तो कोने में नरेंद्र मोदी, अमित शाह डाक टिकट साइज में। उधर हार्डिग्स के बीचोबीच कांग्रेस उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह और साइड में अशोक गहलौत व सचिन पायलट।  हार्डिग्स  में चेहरों का कंपीटिशन मानों बराबर की लड़ाई। झालावाड़ शहर के केंद्र में बस स्टेंड के पास मानवेंद्र सिंह अपनी उपस्थिति दर्शाते हुए। कोई पांच, छह सौ लोगों की भीड़। लेकिन बिना ‘अपनेपन’ के। उनमें शायद कई लोग नवजोतसिंह सिद्वू को देखने के लिए आए थे जो घोषणा के बावजूद समय न बचे होने के कारण पहुंच नहीं पाएं।    

लोगों के बीच पहुंचने का संकट मानवेंद्र सिंह का भी है। वे प्रदेश के दूसरे कोने मारवाड़ में बाडमेर के जसौल और शिव के विधायक जबकि हाडौती का यह इलाका दूसरे कोने में। तभी झालरापाटन में भला उनका क्या मतलब? झालावाड़ से झालरापाटन जाते हुए मैंने उनसे पूछा क्या वे यहां से उम्मीदवार बनने से खुश है? उनके जवाब का अंदाज बहुत कुछ बताने वाला था। लगा मानों उन्हे कहा कुछ इस तरह गया कि उनके लिए इंकार करना संभव नहीं था। अपनी जगह यह हकीकत अलग है कि वसुंधरा राजे की कार्यशैली को उन्होने अपनी तह कम मुद्दा नहीं बनाया। 

बहरहाल मानवेंद्र सिंह दो सप्ताह से झालरपाटन में डेरा डाले हुए है। कोई 340 गांवों में से 240 गांव घूम चुके है। क्या है मुख्य मुद्दा यहां का? उनकी माने तो ‘भय’ के माहौल में लोग घुटे हुए है। भय दुष्यंत राजे से ज्यादा न कि वसुंधरा राजे से!

मैंने इस बात की लोगों से हकीकत बूझनी चाही।  क्या सचमुच लोगों में कोई डर है? लोगों से पूछते-पूछते यह मुद्दा जमा नहीं। उलटे समझ आया कि लोग खुश है, संतुष्ट है वसुंधरा राजे से। प्रदेश में बाकि जगह घूमने के बाद यही एक इलाका लगा जहां लोग शिकायत करते कम मिले। शायद राजे से बहुत पुराने नाते के कारण या मानवेंद्रसिंह के बाहरी होने के कारण लोगों में ऐसा सोचना है। कुछ ने कहा कि यदि इलाके के परिचित चेहरे जैसे शैलेंद्र यादव को कांग्रेस खड़ा करती तो बात अलग होती। एनजीओ चलाने वाले और भाजपा के कट्टर समर्थक शिव प्रसाद त्रिपाठी बदलाव का झंडा उठाने के मूड में थे लेकिन आखिरी वक्त तक टालमटूल और फिर अचानक कांग्रेस के मानवेंद्र सिंह को उम्मीदवार बना देने से वे फिर भगवाई रंग में रंग गए। 

यही औसत मूड है। वसुंधरा राजे के तीस साल और भाजपा से नाखुश लोग भी जो है वे इस बात से अधिक आहत है कि कांग्रेस को क्यों बाहरी और दूर के मानवेंद्र सिंह को ला कर खड़ा करने की जरूरत हुई?

कुल मिला कर वसुंधरा राजे का आभामंडल, उनकी राजनैतिक धमक झालावाड़ और झालरपाटन में बहुत मुखर है मगर उस अनुपात में विकास नहीं दिखा। जयपुर से कोटा सरपट रास्ता तो कोटा से झालावाड का रोड खराब। 70 किलोमीटर का सफर दो-ढाई घंटे में। मगर हां शहर का लघु सचिवालय यह बताता मिलेगा कि आप महत्वपूर्ण इलाके में प्रवेश कर रहे है। महत्व का अहसास स्थानिय लोगों में पैठा है। वसुंधरा राजे के चलते उनका जिला देश के नक्शे में अंहमियत प्राप्त है इसे समझाते हुए एक बुजुर्ग ने कहा – पहले जब मैं जयपुर जाता था तो कोई झालावाड़ नहीं जानता था.. आज मैडम की वजह से सब जानते है.. आप भी हमसे इसीलिए मिलने आई है।‘

कही यह डर तो नहीं बोल रहा? क्या मानवेंद्रसिंह तीस साल से चले आ रहे वर्चस्व को तोड़ पाएगें? जमीनी हकीकत में, लोगों से बातचीत में ऐसा नहीं लगा। अब चाहे दिमाग में डर हो या उपलब्धि व राजनीति का कोई अहसान हो या विकल्प ही नहीं जैसी मनोदशा। जो भी हो, झालावाड़ में वसुंधरा राजे की कुल मिला कर पुण्यता ऐसी है कि 2018 भी उनके लिए रूटीन का चुनाव है। 

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