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जहां महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं

कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की पुरुष हॉकी टीम ने जो उम्मीद बंधाई थी वह फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने उधेड़ कर रख दी। हमारी टीम ऑस्ट्रेलिया के सामने एकदम असहाय थी और वह मैच देखना भारतीयों के लिए किसी यातना से गुजरने से कम नहीं था। मैच जब 7-0 पर समाप्त हुआ तो लोगों को किसी दुस्वप्न से बाहर आने जैसी राहत महसूस हुई। हॉकी को लेकर हम कितने भी गुमान पाल लें, मगर भारत को ऑस्ट्रेलिया से मुकाबले के लिए जबरदस्त मेहनत करनी होगी। हालांकि पुरुष टीम को सिल्वर मेडल मिला और महिला टीम को ब्रॉन्ज, मगर पूरे टूर्नामेंट को देखें तो महिलाओं का प्रदर्शन पुरुषों से कहीं बेहतर था। वे भी ऑस्ट्रेलिया से हारीं, पर पेनल्टी शूटआउट में, जहां जाकर कोई भी हार सकता है, वहां हारीं। अन्यथा वे तो 1-1 से बराबरी पर थीं। फिर जब हमारी लड़कियों ने ब्रॉन्ज के लिए न्यूज़ीलैंड को हराया तो एक अजीब दृश्य सामने था। न्यूज़ीलैंड की लड़कियां हार कर रो रही थीं और भारतीय टीम जीत कर रो रही थी। नीदरलैंड्स की जैनेक शॉपमैन को इस प्रदर्शन का श्रेय दिया जा सकता है जो हमारी महिला हॉकी की कोच हैं।

इसी तरह सिल्वर मेडल जीतने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम को भी भविष्य में ज्यादा दर्शक मिलने वाले हैं। यहां भी हमारी हार फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों हुई। अगर कैप्टन हरमनप्रीत कौर ने एक गैरजरूरी शॉट खेल कर अपना विकेट नहीं गंवाया होता तो नतीजा बदल भी सकता था। लेकिन जब सामने कोई तगड़ी टीम हो तो ऐसे ही गलतियां हुआ करती हैं। ऑस्ट्रेलिया का मामला कुछ ऐसा है कि बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में जिस भी खेल में ऑस्ट्रेलिया भाग ले रहा था, उसके खिलाड़ी इस कॉन्फिडेंस के साथ उतरते थे मानो वही तो जीतेंगे। वे कई खेलों में हार भी गए, लेकिन उनके खिलाड़ियों के इस भाव में कोई कमी नहीं आई। उनके इस स्थायी भाव को भारत की पुरुषों की क्रिकेट टीम ने तो सालों पहले तोड़ दिया है, लेकिन महिलाओं की क्रिकेट और पुरुषों की हॉकी में इसे तोड़ना बाकी है।

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