जेएमएम को ऐसे होगा नुकसान

झारखंड में टकराव की राजनीति शुरू हो गई है। दो महीने पहले चुनाव जीतने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा, जेएमएम के नेता हेमंत सोरेन ने ऐसा दिखाया था कि वे टकराव और बदले की राजनीति नहीं करेंगे। पर अब वे दोनों काम कर रहे हैं। वे बदला भी निकाल कर रहे हैं और भाजपा से टकराव भी कर रहे हैं। इसमें उनकी पार्टी का तात्कालिक नुकसान दिख रहा है। बाबूलाल मरांडी को विधिवत भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिए जाने के बाद भी उनको नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं देकर सरकार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। ध्यान रहे मरांडी की पार्टी का विभाजन हुआ है और दो विधायक कांग्रेस में चले गए हैं। इससे जो तकनीकी विवाद खड़ा हुआ है उसका फैसला स्पीकर को करना है। पिछली विधानसभा में भी यह विवाद हुआ था और मरांडी की पार्टी से भाजपा में शामिल हुए विधायक अपने पद पर बने रहे थे और स्पीकर का फैसला टलता रहा था।

अगर इस आधार पर स्पीकर मरांडी की सदस्यता खत्म करते हैं तो भाजपा की बजाय जेएमएम को एक सीट का नुकसान होगा। इस विवाद के बाद कहा जा रहा है कि मरांडी दुमका की खाली हुई सीट से चुनाव लड़ेंगे। यह सीट हेमंत सोरेन के इस्तीफे से खाली हुई है। वे दो सीटों- बरहेट और दुमका से जीते थे। पहली गलती उन्होंने दुमका सीट छोड़ कर की। इस सीट से वे खुद दो बार चुनाव हार चुके हैं। उनके पिता और झारखंड के सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन इस सीट पर लोकसभा का चुनाव हारे हुए हैं। एक बार बाबूलाल मरांडी भी इस सीट पर शिबू सोरेन को हरा चुके हैं। सो, अगर मरांडी इस सीट से लड़ते हैं तो उनकी जीत की प्रबल संभावना है। वे फिलहाल कोडरमा लोकसभा की राज धनवार सीट से विधायक हैं। फिर उस सीट पर भी उपचुनाव होगा। वहां चाहे कोई भी जीते जेएमएम नहीं जीतेगी। अगर भाजपा जीत जाती है तो उसे मरांडी के आने से दो सीटों का फायदा हो जाएगा और उसके व जेएमएम के बीच का अंतर सिर्फ दो सीटों का रह जाएगा।

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